India Oil Reserved: पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने भारत के साथ दुनिया के कई देशों की एनर्जी सप्लाई और इस क्षेत्र को काफी प्रभावित किया है. ईरान और अमेरिका के बीच जारी इस संघर्ष ने विश्व की एनर्जी सप्लाई के लिए अहम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बाधित कर दिया है. यह समुद्री रास्ता जब खुला करता था तब हर रोज करीब 135 से 140 तेल, गैस आदि लदे जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरते थे. लेकिन अब इसके बाधित हो जाने से दुनिया की जरूरत का 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई नहीं हो पा रही है. कच्चे तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होने से इनके दामों में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है. कच्चे तेल का भाव फिलहाल 111 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल हो गया है. इसके बढ़ने से भारत समेत दुनिया के कई देशों ने भी अपने यहां पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में इजाफा किया है.
भारत के साथ दुनिया के तमाम देश चाह रहे हैं कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का यह संघर्ष जल्द ही खत्म हो, ताकि पहले की तरह एनर्जी की सप्लाई हो सके, लेकिन अगर यह तनाव कुछ और महीने तक खिंचता है तो भारत समेत दुनिया के कई देशों पर तेल-गैस का संकट आने की आशंका है, जिसके कारण इनके दामों में और बढ़ोतरी हो सकती है. हाल ही में भारत में लगातार दो बार पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाई गईं हैं. पहले तीन-तीन रुपये और उसके बाद 97 व 98 पैसे. हालांकि, ईरान भारत के कुछ जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पार करके आने दे रहा है, लेकिन यह उतना काफी नहीं है कि पहले की तरह देश की ईंधन आपूर्ति की भरपाई कर सके. एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत को हर रोज करीब 55 लाख बैरल कच्चे तेल की जरूरत होती है. हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील ने लोगों के बीच बचत को लेकर जागरूकता जरूर फैला दी है. बता दें कि बीते दिनों पीएम मोदी ने देश के नागरिकों से कुल 7 अपीलें की थी, जिनमें से एक था पेट्रोल-डीजल का कम से कम प्रयोग. इसकी जगह पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट, ईवी गाड़ियां, मेट्रो, बस आदि का प्रयोग करने पर जोर देने की बात कही गई थी. इसका असर देश के लोगों पर भी दिखा.
वहीं, पश्चिम एशिया संकट के बीच दुनिया में तेल को लेकर टेंशन बढ़ गई है. अब सभी की निगाहें इसपर हैं कि किस देश के पास कितना अधिक तेल भंडार करने की क्षमता है. जिसके पास जितनी अधिक तेल भंडार करने की क्षमता होगी, वह उतने अधिक दिनों तक पश्चिम एशिया के इस प्रभाव का मुकाबला कर सकेगा. हम यहां चीन और अमेरिका के मुकाबले भारत के पास तेल भंडार की क्षमता पर नजर डालेंगे. हम अमेरिका और चीन से भारत की तुलना इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि पश्चिम एशिया संकट से चीन और अमेरिका पर तेल को लेकर कोई फर्क पड़ता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है. आइए अब इसके बारे में जानते हैं. लेकिन हम इसकी शुरुआत ईरान पर अमेरिका के हमले, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की अहमियत के साथ करेंगे.
28 फरवरी को ईरान पर हुआ था हमला
बीते 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इजरायल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला बोल दिया था. इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर सैयद अली हुसैनी खामनेई की मौत हो गई थी. अपने सुप्रीम लीडर की मौत से बौखलाए ईरान ने इजरायल सहित दुनिया के कई देशों में बनाए गए अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला शुरू कर दिया. उसने मिसाइल और ड्रोन की मदद से यूएई, सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, ओमान समेत अन्य देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जोरदार हमला किया. इसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू हो गया.

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अमेरिका ने ईरान पर क्यों किया हमला?
अमेरिका और इजरायल यह कभी नहीं चाहते कि ईरान के पास अपना परमाणु हथियार हो. ईरान कई सशस्त्र समूहों और संगठनों का सहयोग करता है, जो अमेरिका और इजरायल समेत दुनिया के कई देशों के लिए आतंकी संगठन हैं. इनमें हिजबुल्लाह, हूती, हमास समेत अन्य ग्रुप हैं. अमेरिका इन्हें दुनिया के लिए खतरा बताता है. अगर ईरान के पास परमाणु हथियार हो गया तो यह इजरायल, अमेरिका के साथ-साथ उसके सहयोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है. अमेरिका ने ईरान को कुछ घातक मिसाइलों को भी न बनाने की सलाह दी थी, लेकिन ईरान परमाणु बम और मिसाइल बनाने की अपनी बात पर अड़ा रहा. इसके अलावा, ईरान में सत्ता परिवर्तन कराने को लेकर भी अमेरिका ने हमला किया था.
अमेरिका ने ईरान में प्रदर्शनकारियों के ऊपर हमले, दमन और क्षेत्रीय अशांति को देखते हुए भी तेहरान पर अटैक किया था. वहीं, मध्य पूर्व एशिया में ईरान की बढ़ते ताकत को कम करना भी इस हमले की एक वजह बताई जा रही है. जानकार बताते हैं कि ईरान के तेल कुंओं पर अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप कब्जा चाहते हैं. कई मामले में इस हमले को तेल के लिए भी बताया जा रहा है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की खासियत
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की बात करें तो यह दुनिया का बहुत ही महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. यह जब से ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव में युद्ध का केंद्र बना है, तब से इसने दुनिया की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया है. फारस और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला यह समुद्री मार्ग 33 किमी चौड़ा और करीब 167 किमी लंबा है. विश्व की एनर्जी सप्लाई इस रास्ते पर बहुत ही अधिक निर्भर है. रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया का करीब 20 से 25 फीसदी तेल और गैस का व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होता है. यह रास्ता एशियाई बाजारों तक करीब 80 फीसदी से अधिक तेल की सप्लाई का माध्यम है. भारत के लिए भी यह रास्ता बहुत ही खास है क्योंकि यहां से वह 30 से 50 फीसदी तक कच्चे तेल और गैस का आयात करता है. भारत इसी समुद्री मार्ग से ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात समेत अन्य देशों से तेल का आयात करता है.

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चीन और अमेरिका के पास तेल भंडार की कितनी क्षमता?
दुनिया में सबसे अधिक रणनीतिक तेल भंडारण की क्षमता चीन के पास है. जी हां, U.S. Energy Information Administration, Short-Term Energy Outlook (STEO), March 2026 के आंकड़ों के अनुसार, चीन के पास 1397 मिलियन बैरल तेल भंडार करने की क्षमता है. मतलब कि चीन के पास करीब 139.7 करोड़ बैरल तेल को भंडार करने की शक्ति है. बता दें कि अमेरिका के द्वारा भारी प्रतिबंधों के बावजूद भी चीन, ईरान से करीब 90 फीसदी कच्चे तेल का आयात कर रहा है.
अब बात अमेरिका की करते हैं. दुनिया में अमेरिका खुद ही एक बहुत ही बड़ा कच्चे तेल का उत्पादक देश है. हालांकि, तेल भंडारण के मामले में यह चीन से पीछे है. अमेरिका के पास अभी 413 मिलियन डॉलर तेल भंडार करने की क्षमता है.
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भारत के पास 21 मिलियन बैरल भंडारण की क्षमता
अब बात भारत की करते हैं. भारत के पास जितनी तेल भंडार करने की क्षमता है, उसके हिसाब से यह मात्र 10 दिनों की जरूरत को ही पूरा कर सकता है. उसके बाद इसे फिर से भरना होगा या बाहर से सप्लाई करनी पड़ेगी. हालांकि, भारत सरकार का कहना है कि देश के पास 74 दिनों की जरूरत के लिए तेल उपलब्ध है. मतलब कि जो आंकड़ें हैं, उससे कई गुना अधिक.
U.S. Energy Information Administration, Short-Term Energy Outlook (STEO), March 2026 के मुताबिक, भारत के पास अभी 21 मिलियन बैरल तेल भंडारण की क्षमता है. मतलब कि देश के पास 2.1 करोड़ बैरल तेल को इकट्ठा करने की क्षमता है.
इनमें कर्नाटक के मंगलुरू में 15 लाख मीट्रिग टन और पडूर में 25 लाख मीट्रिग टन तेल भंडारण की क्षमता है. इसके अलावा आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में 13.3 लाख मीट्रिक टन तेल भंडारण की क्षमता है. बता दें कि भारत अपने इस्तेमाल का करीब 90 फीसदी तेल बाहर से मंगाता है. हालांकि, हालिया पश्चिम एशिया चुनौती को देखते हुए भारत सरकार अपने रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता को और अधिक बढ़ाने की कोशिश कर रही है.

रणनीतिक तेल भंडारण
रणनीतिक तेल भंडारण की बात करें तो यह किसी भी देश को आपातकाल की स्थिति के लिए होता है. जी हां, किसी भी आपातकालीन स्थिति जैसे युद्ध, ग्लोबल सप्लाई चैन बाधित होना, प्राकृतिक आपदा समेत अन्य परेशानी की स्थिति में किसी भी देश की सरकार रणनीतिक तेल भंडारण का इस्तेमाल करती है. इस भंडारण का मुख्य उद्देश्य किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को बाहरी चुनौतियों, संकटों और संघर्षों से बचाना है.
बता दें कि भारत में इसके लिए सरकार ने इंडियन स्ट्रैटिजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) की स्थापना की हुई है. इसे जून 2004 में बनाया गया. इसके पास ही देश में रणनीतिक तेल भंडारण को विकसित करने एवं इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2019 में ISPRL के कई भंडारण केंद्रों को देश को समर्पित किया था. हाल ही में पीएम मोदी ने अपनी यूएई यात्रा के दौरान ISPRL और अबू धाबी राष्ट्रीय तेल कंपनी के साथ एक नई डील की. इसके तहत यूएई भारत के रणनीतिक तेल भंडार में अपनी भागीदारी तीन करोड़ बैरल तेल तक बढ़ाएगा.

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भारत में कितना कच्चे तेल का उत्पादन?
बता दें कि भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 89-90% कच्चे तेल की आयात करता है. आज से करीब दो दशक पहले देश की आयात पर निर्भरता केवल 75% थी. देश के पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2011-12 में भारत का घरेलू कच्चा तेल उत्पादन 3.81 करोड़ टन था, जो 2020-21 में घटकर करीब 3.05 करोड़ टन हो गया. 2024-25 में यह 2.87 करोड़ टन और 2025-26 में लगभग 2.8 करोड़ टन तक पहुंच गया है. इसमें करीब 26 फीसदी तक की गिरावट देखी गई है.
