Bangladeshi Trafficking Racket: अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने मानव तस्करी, अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ, नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और संगठित देह व्यापार के खिलाफ बड़ी सफलता हासिल करते हुए एक ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है, जिसने रोजगार का झांसा देकर बांग्लादेश से महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को भारत लाकर उनका शोषण किया. इस पूरे मामले में अहमदाबाद की विशेष POCSO कोर्ट ने घटना के लगभग एक वर्ष के भीतर दोनों आरोपियों को दोषी करार देते हुए कड़ी सजा सुनाई है. समयबद्ध जांच, मजबूत साक्ष्य और लगातार कानूनी फॉलोअप के चलते मिली यह दोषसिद्धि अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है.
नौकरी का झांसा देकर फंसाते थे लड़कियां
यह मामला वर्ष 2024 में उस समय सामने आया, जब अहमदाबाद क्राइम ब्रांच को गुप्त सूचना मिली कि शहर के वास्ट्राल क्षेत्र स्थित एक फ्लैट में बांग्लादेश से अवैध रूप से लाई गई महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को रखा गया है. सूचना बेहद संवेदनशील थी, इसलिए क्राइम ब्रांच ने पूरी गोपनीयता के साथ कार्रवाई की योजना बनाई. बंगाली भाषा के दुभाषिए और पंच गवाहों की मौजूदगी में टीम ने फ्लैट पर छापा मारा. कार्रवाई के दौरान मौके से दो नाबालिग लड़कियां, उनकी मां तथा एक अन्य महिला को सुरक्षित बरामद किया गया. प्रारंभिक पूछताछ में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने जांच एजेंसियों को भी चौंका दिया. पीड़िताओं ने बताया कि उन्हें रोजगार दिलाने और बेहतर जीवन का सपना दिखाकर बांग्लादेश से भारत लाया गया था. अवैध रूप से सीमा पार कराने के बाद उन्हें अहमदाबाद में रखा गया और फिर देह व्यापार के धंधे में धकेल दिया गया. नाबालिग लड़कियों तक को ग्राहकों के पास भेजा जाता था और उनके साथ लगातार यौन शोषण किया जाता था. जांच में यह भी सामने आया कि पूरा नेटवर्क संगठित तरीके से काम कर रहा था और इसके तार मानव तस्करी के बड़े गिरोह से जुड़े हुए थे. क्राइम ब्रांच की जांच आगे बढ़ी तो कई गंभीर तथ्य सामने आए.
POCSO कोर्ट ने आरोपियों को दोषी करार दिया
अदालत में पेश किए गए रिकॉर्ड के अनुसार मुख्य आरोपी सागर मिलन मंडल ने एक नाबालिग पीड़िता के साथ कई बार दुष्कर्म किया. वहीं दूसरा आरोपी मोहम्मद फारूक उर्फ हारून मंडल महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को ग्राहकों तक पहुंचाने, मानव तस्करी और देह व्यापार के संचालन में सक्रिय भूमिका निभा रहा था. दोनों आरोपी आर्थिक लाभ के लिए महिलाओं और बच्चियों का लगातार शोषण कर रहे थे. मामले की जांच के दौरान पुलिस ने केवल पीड़िताओं के बयान पर निर्भर रहने के बजाय वैज्ञानिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का मजबूत आधार तैयार किया. जांच टीम ने मेडिकल रिपोर्ट, जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल रिकॉर्ड, ऑसिफिकेशन टेस्ट, पंचनामे, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और अन्य दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए. इन सभी सबूतों ने यह साबित किया कि दोनों पीड़िताएं घटना के समय नाबालिग थीं और आरोपियों द्वारा उनके साथ गंभीर अपराध किए गए थे. अभियोजन पक्ष ने क्रमबद्ध तरीके से सभी साक्ष्य अदालत के समक्ष रखे, जिसके आधार पर विशेष POCSO कोर्ट ने आरोपियों को दोषी करार दिया.
एक साल के अंदर दोषसिद्धि सुनिश्चित
इस पूरे ऑपरेशन की सबसे बड़ी विशेषता केवल आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं रही, बल्कि अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने इस केस को संगठित अपराध के पूरे नेटवर्क तक पहुंचने का माध्यम बनाया. जांच के दौरान अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ, मानव तस्करी और देह व्यापार से जुड़े प्रमुख एजेंटों की पहचान की गई. पुलिस ने इन एजेंटों को गिरफ्तार किया और इसी केस से मिले इनपुट के आधार पर छह अन्य अलग-अलग आपराधिक मामले दर्ज किए. इन मामलों में लगातार कार्रवाई करते हुए पूरे अवैध नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया गया. इस प्रकार एक केस की जांच ने मानव तस्करी और अवैध घुसपैठ के बड़े रैकेट का खुलासा कर दिया. क्राइम ब्रांच के अधिकारियों के अनुसार यदि शुरुआती कार्रवाई केवल फ्लैट पर छापेमारी तक सीमित रहती, तो संभव है कि पूरा नेटवर्क सक्रिय बना रहता. लेकिन जांच अधिकारियों ने प्रत्येक कड़ी को जोड़ते हुए एजेंटों, संपर्क सूत्रों, अवैध घुसपैठ कराने वालों और देह व्यापार संचालित करने वाले लोगों तक पहुंच बनाई.
इसी रणनीति के कारण पूरे गिरोह का सफाया संभव हो सका. इस चुनौतीपूर्ण जांच में इंस्पेक्टर एस.जे. जडेजा, इंस्पेक्टर आई.एन. घासुरा तथा उनकी टीमों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बैकग्राउंड इंटेलिजेंस तैयार करने से लेकर तकनीकी जांच, दस्तावेजी साक्ष्य जुटाने, पीड़िताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने, कानूनी प्रक्रिया का पालन करने और नियमित कोर्ट फॉलोअप तक पूरी टीम ने लगातार काम किया. इसी व्यवस्थित और पेशेवर जांच के कारण घटना के लगभग एक वर्ष के भीतर अदालत से दोषसिद्धि सुनिश्चित हो सकी.
कोर्ट ने दी 20 साल जेल की सजा
विशेष POCSO कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध साक्ष्य, पीड़िताओं की गवाही, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज यह साबित करते हैं कि आरोपियों ने नाबालिग लड़कियों को अवैध रूप से भारत लाकर उनका यौन शोषण किया तथा आर्थिक लाभ के लिए उनका इस्तेमाल किया. अदालत ने दोनों आरोपियों को विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत दोषी ठहराया. मुख्य आरोपी सागर मिलन मंडल को विभिन्न धाराओं में दोषी मानते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास तथा 20 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई. वहीं दूसरे आरोपी मोहम्मद फारूक उर्फ हारून मंडल को मानव तस्करी और अनैतिक देह व्यापार से संबंधित विभिन्न धाराओं में दोषी करार दिया गया. अदालत ने यह भी आदेश दिया कि विभिन्न धाराओं में दी गई सजाएं साथ-साथ चलेंगी. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि घटना के लगभग एक वर्ष के भीतर दोषसिद्धि होना अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है. सामान्य तौर पर ऐसे मामलों में जांच, गवाहों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया में कई वर्ष लग जाते हैं, लेकिन अहमदाबाद क्राइम ब्रांच की लगातार निगरानी, अभियोजन पक्ष की तैयारी और समय पर प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों के कारण अदालत शीघ्र निर्णय तक पहुंच सकी.
पूरा नेटवर्क ध्वस्त
यह मामला केवल दो आरोपियों को सजा दिलाने तक सीमित नहीं है. इस कार्रवाई ने यह भी साबित किया कि यदि जांच एजेंसियां शुरुआती केस से आगे बढ़कर पूरे नेटवर्क की जांच करें, तो मानव तस्करी, अवैध घुसपैठ और संगठित देह व्यापार जैसे अपराधों की जड़ तक पहुंचा जा सकता है. छह नए मामलों का दर्ज होना और पूरे नेटवर्क का ध्वस्त होना इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. अहमदाबाद क्राइम ब्रांच की यह सफलता भविष्य में मानव तस्करी, अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ, नाबालिगों के यौन शोषण और संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई के लिए एक मजबूत उदाहरण मानी जा रही है. समयबद्ध जांच, वैज्ञानिक साक्ष्य, पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण और प्रभावी अभियोजन के जरिए यह साबित हुआ है कि यदि जांच पेशेवर तरीके से की जाए तो संगठित अपराधों के खिलाफ भी कम समय में दोषसिद्धि हासिल की जा सकती है. यही कारण है कि इस पूरे ऑपरेशन को अहमदाबाद क्राइम ब्रांच की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक माना जा रहा है.
News Source: PTI
