West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक अप्रत्याशित और बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. जो ममता बनर्जी पिछले चुनावों के दौरान राज्य में कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन (I.N.D.I.A) से लगातार दूरी बनाए हुए थीं और अकेले चुनाव लड़ने पर अड़ी थीं, वे अब अचानक कांग्रेस को अपनी ‘बहन पार्टी’ और ‘स्वाभाविक सहयोगी’ बताने लगी हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस बदले रुख के पीछे बंगाल में हाल ही में बदली गंभीर राजनीतिक परिस्थितियां और ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संगठनात्मक संकट है.
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सत्ता से बेदखली और पार्टी में आंतरिक बगावत
साल 2026 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा, जिससे ममता बनर्जी सत्ता से बाहर हो गईं. सत्ता गंवाने के बाद उनकी पार्टी के भीतर एक बड़ी बगावत खड़ी हो गई, जिसमें लगभग तीन-चौथाई विधायकों और सांसदों ने उनके तथा उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह कर दिया. इस बड़े राजनीतिक विभाजन ने उन्हें बेहद कमजोर स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया.
चुनाव आयोग का झटका: नाम और सिंबल फ्रीज
ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा संकट तब खड़ा हुआ जब चुनाव आयोग (ECI) ने अंदरूनी विवाद के चलते तृणमूल कांग्रेस के पारंपरिक नाम और ‘दो फूल’ वाले सिंबल को फ्रीज कर दिया. पार्टी की पहचान छिन जाने के बाद आगामी 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनावों के ठीक पहले ममता बनर्जी का धड़ा संगठनात्मक रूप से बेहद दबाव में आ गया.
नंदीग्राम में TMC उम्मीदवार का नामांकन वापस लेना
इस बदले रुख का तात्कालिक कारण नंदीग्राम उपचुनाव बना. ममता गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद अचानक अपना नाम वापस ले लिया. मैदान में अपना कोई उम्मीदवार न होने और विरोधी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए ममता बनर्जी ने मजबूरी और रणनीति के तहत वहां कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को खुला समर्थन देने का ऐलान कर दिया.

कांग्रेस नेतृत्व का मिला साथ
जब चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी की पार्टी का सिंबल फ्रीज किया, तब राहुल गांधी समेत कांग्रेस के शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व ने उनके प्रति एकजुटता दिखाई और इस कदम को लोकतंत्र के लिए काला दिन बताया. इस सहानुभूति ने ममता बनर्जी को दिल्ली के स्तर पर कांग्रेस के करीब आने का एक बड़ा राजनीतिक जरिया दे दिया.
राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिकता की तलाश
विश्लेषकों के मुताबिक, राज्य में अपनी जमीन खिसकने और चौतरफा घिरने के बाद ममता बनर्जी अब खुद को केवल एक क्षेत्रीय गुट के नेता के रूप में सीमित नहीं रखना चाहतीं. कांग्रेस की तारीफ करके और I.N.D.I.A ब्लॉक की एकजुटता का नारा बुलंद करके वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता को बचाए रखने और भाजपा के खिलाफ एक बड़े सेक्युलर मोर्चे की आड़ में अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही हैं.
कांग्रेस को समर्थन राजनीतिक दुश्मनी खत्म करने की कोशिश
नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का समर्थन दशकों पुरानी राजनीतिक दुश्मनी में एक बड़ा बदलाव है. यह राज्य में विपक्षी राजनीति के नए सिरे से गठन का संकेत हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब TMC अपने सबसे गहरे संगठनात्मक संकट से जूझ रही है. कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन करने का बनर्जी का फ़ैसला उनके गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे के चुनाव से हटने के कुछ घंटों बाद आया. संचिता ने कोलकाता में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से मुलाक़ात के बाद अपना नाम वापस ले लिया था.
ममता ने कांग्रेस को बताया ‘स्वाभाविक सहयोगी’
18 सितंबर को कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान के लिए समर्थन की घोषणा करते हुए बनर्जी ने कांग्रेस को ‘बहन पार्टी’ और ‘स्वाभाविक सहयोगी’ बताया था. उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला देश के व्यापक हित में और I.N.D.I.A ब्लॉक को मज़बूत करने के लिए लिया गया है. बनर्जी ने यह भी कहा था कि वह बंगाल से ही विपक्षी गठबंधन के भविष्य के बारे में एक संदेश देना चाहती थीं. हालांकि, सुलह का हाथ बढ़ाने के इस कदम से पता चलता है कि इसके पीछे एक खास रणनीतिक मकसद है. बनर्जी के खेमे ने शुरू में नंदीग्राम में एक उम्मीदवार उतारा था और उम्मीदवार के हटने के बाद ही उसे मुकाबले से वापस लिया था.
1990 में बनी थी TMC, लेफ्ट फ्रंट को दी थी चुनौती
जानकारों का कहना है कि कांग्रेस को उनका समर्थन करना, बीजेपी-विरोधी वोटों के बंटवारे को रोकने की कोशिश और उनके गुट के लिए बेहद मुश्किल समय में एक राजनीतिक प्रतिक्रिया, दोनों ही है. बनर्जी की घोषणा के कुछ ही समय बाद 2007 के नंदीग्राम ज़मीन आंदोलन से जुड़े एक मामले में प्रधान की गिरफ्तारी और जेल भेजे जाने के बाद इस घटनाक्रम का महत्व और बढ़ गया है. हालांकि, इसमें छिपी विडंबना को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. बनर्जी खुद कांग्रेस से ही निकली थीं.

1990 के दशक के आखिर में उन्होंने लेफ्ट फ्रंट को चुनौती देने और CPI(M) के खिलाफ कांग्रेस के अपर्याप्त विरोध को देखते हुए TMC बनाई थी. फिर भी, जब भी किसी बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ा है, तो ये दोनों पार्टियां समय-समय पर एक-दूसरे के साथ आती रही हैं. NDA से अलग होने के बाद बनर्जी ने 2001 का बंगाल विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा और बाद में 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान फिर से हाथ मिलाया. यह गठबंधन 2011 में अपने चरम पर पहुंचा, जब कांग्रेस और TMC ने मिलकर बंगाल में लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन को खत्म किया, लेकिन बाद में यह साझेदारी टूट गई क्योंकि पॉलिसी, सीट-शेयरिंग और राज्य सरकार के कामकाज को लेकर मतभेद बढ़ गए.
कांग्रेस की वजह से BJP और लेफ्ट को फायदा
बनर्जी के 15 साल के शासन के दौरान रिश्ते खास तौर पर खराब हो गए. कांग्रेस नेताओं ने बार-बार TMC पर अपने संगठन को राजनीतिक रूप से कमजोर करने का आरोप लगाया, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस को एक बेअसर ताकत के तौर पर पेश किया, जिसके पतन से BJP और लेफ्ट को फायदा हुआ. जानकारों का कहना है कि यह हालिया कदम सिर्फ़ उपचुनाव के सामान्य गणित से कहीं ज़्यादा है. यह एक अनोखा पल है जब बनर्जी ने बंगाल में BJP-विरोधी चुनावी रणनीति के केंद्र में सार्वजनिक रूप से कांग्रेस को रखा है. हालांकि, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने तुरंत राजनीतिक मेल-मिलाप की किसी भी संभावना को कम करके आंका. बनर्जी के कदम पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें कांग्रेस का समर्थन ‘गिरी हुई पत्ती के तौर पर नहीं, बल्कि बरगद के पेड़ का हाथ थामकर’ करना चाहिए. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी के पुनरुद्धार को मान्यता दी जानी चाहिए.
कांग्रेस ही कर सकती है BJP का मुक़ाबला
चौधरी ने कहा कि समर्थन मिलने के समय पर ध्यान देना चाहिए. यह तब हुआ जब उनके उम्मीदवार ने रेस से अपना नाम वापस ले लिया. अब उनके पास ‘फ़ुटबॉल खिलाड़ी’ वाला चुनाव चिह्न तो है, लेकिन खेल खेलने के लिए कोई खिलाड़ी नहीं बचा है. उन्होंने पार्टी के अंदर नाम, चुनाव चिह्न और संपत्ति को लेकर हुई कड़वी गुटबाजी के बाद EC द्वारा अस्थायी रूप से दिए गए चुनाव चिह्न का ज़िक्र करते हुए यह बात कही. उन्होंने कहा कि इसीलिए वह हमारे पास आई हैं, क्योंकि वह जानती हैं कि हम ही एकमात्र ऐसी तीसरी ताकत हैं जिसमें BJP का मुक़ाबला करने की क्षमता है. हालांकि, बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार की राय कुछ अलग थी. उन्होंने कहा कि कांग्रेस राज्य के BJP-विरोधी और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक खेमे से मिलने वाले किसी भी समर्थन का स्वागत करती है, जो राहुल गांधी के नेतृत्व में ‘भगवा गठबंधन’ के ख़िलाफ़ हमारी पार्टी की लड़ाई को मान्यता देगा.
शून्य में शून्य जोड़ने पर नतीजा शून्यः BJP
बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने कहा कि कौन जानता है, बंगाल में हुई यह घटना शायद विपक्ष के लिए एकजुट होने का एक नया राजनीतिक रास्ता खोल दे. कांग्रेस नेताओं ने प्रधान की गिरफ़्तारी की कड़ी आलोचना की है. गांधी ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है और कहा है कि पार्टी लड़ेगी और जीतेगी. हालांकि, BJP के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने विपक्ष के बीच प्रस्तावित तालमेल की बात को खारिज करते हुए कहा कि शून्य में शून्य जोड़ने पर नतीजा शून्य ही होगा. उन्होंने तर्क दिया कि कांग्रेस और TMC दोनों ही राजनीतिक रूप से बने रहने की कोशिश कर रही हैं, और गठबंधन से किसी भी पार्टी को नई जान नहीं मिलेगी.
कांग्रेस को ममता से फायदा होने की उम्मीद
ममता बनर्जी और उनके गुट के लिए नंदीग्राम का फ़ैसला BJP-विरोधी बड़े वोट बैंक को बचाए रखने की कोशिश हो सकती है, जबकि उनकी अपनी संगठनात्मक पहचान पर ज़बरदस्त दबाव है. जानकारों का कहना है कि कांग्रेस का समर्थन करने से बनर्जी खुद को सिर्फ़ तृणमूल के नाम और चुनाव चिह्न के लिए लड़ने वाले गुट की नेता के बजाय एक राष्ट्रीय विपक्षी नेता के तौर पर पेश कर सकती हैं. वरिष्ठ पत्रकार बिस्वजीत भट्टाचार्य ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच कोई खास लगाव नहीं है, लेकिन ऐसा लगता है कि बनर्जी डूबते को तिनके का सहारा ढूंढ रही हैं. उन्होंने आगे कहा कि लेकिन चूंकि दोनों पक्ष राजनीतिक ज़मीन बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए यह व्यवस्था फ़िलहाल दोनों के लिए फ़ायदेमंद हो सकती है, क्योंकि कांग्रेस को बनर्जी की बची-खुची लोकप्रियता से फ़ायदा होने की उम्मीद है.

कांग्रेस बंगाल में खुद को खड़ा करने के लिए प्रयासरत
बड़ा सवाल I.N.D.I.A ब्लॉक से जुड़ा है. बनर्जी की भाषा, खासकर कांग्रेस को स्वाभाविक सहयोगी बताना और विपक्ष से एकजुट होकर लड़ने की उनकी अपील, गठबंधन के सहयोगियों के बीच मतभेदों से बार-बार कमजोर हुए BJP विरोधी अभियान के दौरान तालमेल को फिर से मजबूत करने की कोशिश हो सकती है. लेकिन अकेले नंदीग्राम से दोनों पक्षों के बीच बरसों की प्रतिद्वंद्विता और भरोसे की कमी खत्म होने की संभावना कम है. कांग्रेस बंगाल में स्वतंत्र रूप से खुद को फिर से खड़ा करने के लिए प्रतिबद्ध है, जबकि बनर्जी ने हमेशा ऐसे समझौतों का विरोध किया है जिनसे राज्य में TMC का दबदबा कम हो सकता है.
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