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अब सिर्फ मार्क्स नहीं, बच्चों की मानसिक सेहत भी होगी अहम : गुजरात के सभी स्कूलों में लागू होगा नया नियम

by Nikul Patel 1 November 2026, 8:22 PM IST (Updated 1 November 2026, 8:24 PM IST)
1 November 2026, 8:22 PM IST (Updated 1 November 2026, 8:24 PM IST)
अब सिर्फ मार्क्स नहीं, बच्चों की मानसिक सेहत भी होगी अहम: गुजरात के सभी स्कूलों में लागू होगा नया नियम, हर स्कूल में बनेगी 'स्कूल वेलनेस टीम'

Gujarat Education: गुजरात में अब स्कूलों में विद्यार्थियों की पहचान सिर्फ उनके परीक्षा परिणाम और अंकों से नहीं होगी, बल्कि उनकी मानसिक सेहत और भावनात्मक स्थिति को भी उतनी ही प्राथमिकता दी जाएगी. विद्यार्थियों में बढ़ते मानसिक तनाव, परीक्षा के दबाव, प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक अपेक्षाओं और आत्महत्या जैसी गंभीर घटनाओं को रोकने के लिए गुजरात सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है. इसके तहत राज्य के सभी माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और आत्महत्या रोकथाम के लिए विशेष व्यवस्था लागू करना अनिवार्य होगा.

कक्षा 9 से 12 तक के सभी स्कूलों पर होगा लागू

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में शिक्षा विभाग ने यह नई व्यवस्था लागू की है. गुजरात माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा विनियम, 1974 में नया प्रावधान जोड़ा गया है. इसके तहत विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक कल्याण और आत्महत्या रोकथाम को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं. यह नियम गुजरात माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (GSHSEB) से संबद्ध कक्षा 9 से 12 तक के सभी स्कूलों पर लागू होगा.

‘स्कूल वेलनेस टीम’ का होगा गठन

नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक स्कूल में अनिवार्य रूप से ‘स्कूल वेलनेस टीम’ (SWT) का गठन करना होगा. इस टीम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों में मानसिक तनाव, चिंता, अवसाद और आत्महत्या जैसे नकारात्मक विचारों के शुरुआती संकेतों की पहचान करना और समय रहते उन्हें सहायता उपलब्ध कराना होगा. स्कूल के प्राचार्य इस टीम के प्रमुख होंगे, जबकि स्कूल काउंसलर या नियुक्त शिक्षक टीम के समन्वयक की जिम्मेदारी संभालेंगे. इसके अलावा कक्षा 9-10 और 11-12 के एक-एक शिक्षक, स्कूल मैनेजमेंट कमेटी का प्रतिनिधि, दोनों स्तरों से एक-एक पीयर मॉनिटर यानी ‘मनो-मित्र’ और एक गैर-शैक्षणिक कर्मचारी भी टीम में शामिल होंगे. हर शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में टीम का गठन करना और सालाना उसके कामकाज की समीक्षा करना अनिवार्य होगा.

‘मनो-मित्र’ की भी होगी व्यवस्था

स्कूलों में विद्यार्थियों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने के लिए ‘मनो-मित्र’ की व्यवस्था भी की जाएगी. इसके तहत कुछ विद्यार्थियों को पीयर सपोर्ट की जिम्मेदारी दी जाएगी. मनो-मित्र अपने सहपाठियों की समस्याओं को समझने, उनकी बात सुनने और उन्हें शुरुआती भावनात्मक सहयोग देने में मदद करेंगे. यदि किसी विद्यार्थी को विशेष सहायता या काउंसलिंग की जरूरत होगी तो उसे संबंधित शिक्षक, काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ तक पहुंचाने में मदद की जाएगी. इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच आपसी विश्वास, सहयोग और सकारात्मक संबंधों को मजबूत करना है, ताकि कोई भी बच्चा अपनी परेशानी अकेले सहने को मजबूर न हो.

काउंसलर, मनोवैज्ञानिक की नियुक्ति अनिवार्य

सरकार के नए नियम के मुताबिक जिन स्कूलों में 100 या इससे अधिक विद्यार्थी हैं, वहां कम से कम एक योग्य काउंसलर, मनोवैज्ञानिक या सामाजिक कार्यकर्ता की नियुक्ति करना अनिवार्य होगा. संबंधित विशेषज्ञ को बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रशिक्षण प्राप्त होना चाहिए. वहीं, 100 से कम विद्यार्थी वाले स्कूलों को बाहरी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और टेली-मानस सेवाओं के साथ औपचारिक रेफरल व्यवस्था स्थापित करनी होगी. विशेष रूप से बोर्ड परीक्षाओं, परीक्षा परिणामों की घोषणा और कक्षा 8 से 9 तथा कक्षा 10 से 11 में प्रवेश के दौरान विद्यार्थियों को अतिरिक्त मार्गदर्शन और काउंसलिंग उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है.

रैगिंग, बुलिंग और साइबर बुलिंग पर भी सख्ती

स्कूलों में रैगिंग, शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना, बुलिंग, साइबर बुलिंग और जाति, धर्म, भाषा, लिंग या सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ गोपनीय शिकायत निवारण व्यवस्था बनाना अनिवार्य होगा. शिकायतों की समयबद्ध और निष्पक्ष जांच करनी होगी. यदि स्कूल प्रशासन को किसी विद्यार्थी के गंभीर जोखिम की जानकारी होने के बावजूद समय पर कार्रवाई नहीं करता और उसकी लापरवाही से विद्यार्थी को गंभीर नुकसान पहुंचता है, तो इसे संस्थागत दोष माना जा सकता है. ऐसी स्थिति में संबंधित स्कूल या जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कानूनी और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकेगी. अब स्कूलों की जिम्मेदारी सिर्फ अच्छे अंक दिलाने तक नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को तनावमुक्त वातावरण देना और उनकी जिंदगी की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी होगी.

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