Dhamaal 4 Review: बॉलीवुड की दुनिया में कुछ फ्रेंचाइज़ ऐसी हैं जो हर 2 या 4 साल बाद लौटती हैं और ऑडियन्स से कहती हैं कि, ‘इस बार तो पक्का हंसोगे.’ लेकिन डायरेक्टर इंदर कुमार की ‘धमाल 4’ देखकर ऐसा लगता है कि फिल्म ने ऑडियन्स को हंसाने से ज्यादा उनकी याददाश्त पर भरोसा किया है. वैसे भी, कभी-कभी बॉलीवुड पुरानी यादों के सहारे ऐसी गाड़ी स्टार्ट करने की कोशिश करता है, जिसकी बैटरी सालों पहले ही बैठ चुकी होती है. फर्क सिर्फ इतना होता है कि इस बार हॉर्न पहले से ज्यादा बजता है. ‘धमाल 4’ भी ऐसी ही फिल्म है, जो पुरानी सक्सेस की चाबी लेकर नए ताले खोलने निकली है. लेकिन रास्ते में खुद ही भूल जाती है कि ऑडियन्स सिर्फ पुरानी यादों से नहीं, अच्छी कॉमेडी से हंसती है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सिर्फ ‘धमाल’ नाम जोड़ देने से फिल्म और उसकी कहानी अपने आप मजेदार हो जाती है? अगर जवाब ‘हां’ होता तो कॉमेडी लिखने के लिए स्क्रिप्ट राइटर नहीं, सिर्फ पोस्टर डिजाइनर ही काफी होता.
सबसे बड़ी कमज़ोरी
मल्टी स्टारर फिल्म ‘धमाल 4’ की सबसे बड़ी प्रोब्लम है उसकी स्क्रिप्ट. ऐसा लगता है जैसे किसी ने पुरानी फिल्मों के कई सीन्स को एक बड़े मिक्सर में डालकर पीस दिया और बिना स्वाद चखे सीधे ऑडियन्स को परोस दिया. न कहानी में फ्रेशनेस है, न ट्विस्ट में दम और न ही पंचलाइन में वो धार, जो एक अच्छी कॉमेडी की पहचान होती है. इसके अलावा ‘धमाल 4’ दूसरी सबसे बड़ी प्रोब्लम ये है कि इसे लगता है कि अगर, हर 5 मिनट में कोई गिर जाए, कोई चिल्ला दे, कोई अजीब सा मुंह बना ले या एक-दूसरे की बेइज्जती कर दे, तो थिएटर में बैठे लोग अपने आप हंसने लगेंगे. लेकिन मेरे दोस्त, सिनेमाघर में कई जगह सन्नाटा उस कॉमेडी से ज्यादा ईमानदार लगता है, जिसे स्क्रीन पर परोसा गया है. कहने का मतलब ये है कि इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे देखकर मज़ा आए. कुछ एक सीन को छोड़कर.

बढ़िया शुरुआत से उम्मीदें
‘धमाल 4’ शुरू होते ही ऐसी फीलिंग आती है कि अब कोई बड़ा धमाका होने वाला है. लेकिन कुछ देर बाद समझ आ जाता है कि धमाका सिर्फ स्पीकर कर रहे हैं. कहानी वहीं पुरानी खजाने वाली दौड़ पर निकल पड़ती है. बस इस बार रास्ता नया बताया गया है, मंजिल वही पुरानी है और एंटरटेनमेंट बीच रास्ते में ही कहीं खो जाता है. एक बार फिर वही पुराना खजाना ढूंढ़ने का खेल शुरू होता है. नक्शा ढूंढो, सुराग पकड़ो, सब एक-दूसरे को धोखा दो और आखिर में दौड़ लगाओ. कहानी इतनी जानी-पहचानी और देखी-दिखाई लगती है कि कई बार ऐसा फील होता है जैसे फिल्म नहीं, पुरानी यादों की फोटोकॉपी देख रहे हों. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार फोटोकॉपी भी क्लियर नहीं है.
भागम-भाग में फर्स्ट हाफ
अजय देवगन, अरशद वारसी, रितेश देशमुख और जावेद जाफरी की ‘धमाल 4’ का फर्स्ट हाफ ऐसे भागता है जैसे उसे खुद नहीं पता कि जाना कहां है. एक के बाद एक कैरेक्टर आते हैं, चिल्लाते हैं, भागते हैं, गिरते हैं और थिएटर में बैठे लोग इंतजार करते रहते हैं कि, शायद अब कोई ऐसा सीन आएगा जिस पर खुलकर हंसी आए. लेकिन कॉमेडी सिर्फ शोर नहीं होती. अगर ऐसा होता तो ट्रैफिक जाम भारत की सबसे बड़ी कॉमेडी फिल्म होती. सबसे मजेदार बात ये है कि फिल्म अपने आपको बहुत मजेदार समझती है. हर दूसरा डायलॉग ऐसे पेश किया जाता है जैसे अभी पूरा थिएटर ठहाकों से गूंज उठेगा. लेकिन कई जगह ऑडियन्स का रिएक्शन कुछ ऐसा होता है कि पॉपकॉर्न खाने की आवाज भी ज्यादा सुनाई देती है. कॉमेडी फ्रैंचाइजी बनाने वालों को ये बात समझनी होगी कि, कॉमेडी और शोर में बहुत बड़ा फर्क होता है. अच्छी कॉमेडी चेहरे पर मुस्कान छोड़ती है, जबकि लगातार शोर सिर्फ सिरदर्द देता है. अफसोस की बात है कि ‘धमाल 4’ दूसरी वाली कैटेगरी में ज्यादा नजर आती है. ऐसा लगता है कि स्क्रिप्ट मीटिंग में किसी ने कहा होगा कि ‘जोक नहीं मिल रहा? कोई बात नहीं, वॉल्यूम बढ़ा दो…’

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सबसे बड़ी ताकत
‘धमाल’ की सबसे बड़ी ताकत कभी इसकी स्टार कास्ट हुआ करती थी. अलग-अलग बिहेवियर वाले कैरेक्टर्स जब साथ आते थे तो अपने आप ह्यूमर क्रिएट होता था. इस बार वही चेहरे हैं, लेकिन उनके बीच वाली चिंगारी कहीं खो गई है. कई सीन ऐसे गुजर जाते हैं जहां एक्टर्स मेहनत करते दिखते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उनका साथ छोड़ देती है. रितेश देशमुख कई जगह अपनी कॉमिक टाइमिंग से फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं. लेकिन वो भी बीच-बीच में नकली कनपुरिया बनकर सारा खेल बिगाड़ देते हैं. वहीं, हमारे ‘सिंघम’ यानी अजय देवगन ‘धमाल 4’ में धमाल मचाने की पूरी कोशिश करते हैं. वो बार-बार दिखाते हैं कि मैं हूं यहां, लेकिन उनका कैरेक्टर भी उतना असरदार नहीं है, जितनी उम्मीद थी. वैसे भी, एक अकेला खिलाड़ी पूरी टीम को मैच नहीं जिता सकता. इस फिल्म में भी कुछ ऐसा ही हाल दिखा.
अरशद-जावेद की जोड़ी
अरशद वारसी और जावेद जाफरी की जोड़ी कभी ‘धमाल’ फ्रेंचाइज़ की जान मानी जाती थी. उनकी नोकझोंक और मासूम बेवकूफियां ऑडियन्स को खूब हंसाती थीं. दोनों को साथ देखकर पुरानी ‘धमाल’ जरूर याद आती है, लेकिन वही बात फिर सामने आती है कि, यादें शानदार हैं, लेकिन नया कंटेंट शानदार नहीं है. ‘धमाल 4’ में कुछ ऐसे जोक्स भी हैं जो आज के टाइम में पुराने और काफी ज्यादा वीक लगते हैं. किसी की बॉडी का मजाक उड़ाना, बार-बार एक जैसी लाइनें रिपीट करना या सिर्फ ऊंची आवाज में डायलॉग बोल देना अब कॉमेडी की गारंटी नहीं है. वैसे भी अब ऑडियन्स पहले से ज्यादा समझदार हो चुकी है. ऐसे में उन्हें हंसाने के लिए सिर्फ शोर नहीं, समझदारी भी चाहिए. ‘धमाल’ के पुराने चेहरों के साथ इस बार फ्रैंचाइजी में रवि किशन भी हैं. संजीदा शेख, ईशा गुप्ता, संजय मिश्रा और अंजली आनंद भी ‘धमाल 4’ का खास हिस्सा हैं. इस बात में कोई शक नहीं है कि, सभी लोगों ने अपना-अपना काम बड़ी अच्छी तरह से किया है. लेकिन जब कहानी में ही दम ना हो, तो फिर एक्टर्स क्या ही कर लेंगे?

वीएफएक्स
वीएफएक्स पर मेहनत जरूर दिखती है. एडवेंचर भी है, भाग-दौड़ भी है, बड़े सेट भी हैं. लेकिन जब हंसी ही गायब हो तो इतना सारा तामझाम वैसा ही लगता है जैसे शादी में 500 तरह के पकवान हों और नमक किसी में न हो. नमक के बिना खाना कैसा लगता है, ये बताने की जरूरत नहीं है. इसके अलावा फिल्म का म्यूज़िक भी कुछ खास याद नहीं रहता, क्योंकि फिल्म का अपना कोई गाना ही नहीं है. ‘गुलाबी साड़ी’ हम सब पहले ही खूब सुन चुके हैं. वहीं, मेकर्स खजाने वाले सीन में बार-बार ‘मनी हाइस्ट’ वाला ‘बेला चाओ बेला चाओ’ वाली धुन बजाते रहते हैं. क्या लगा था, प्रोफेसर खुश होगा? कहने का मतलब ये है कि ‘धमाल 4’ का ऐसा कोई गाना नहीं है जिसे थिएटर से बाहर निकलते वक्त लोग गुनगुनाते हुए जाएं. लगता है कि फिल्म के मेकर्स को अपने गानों पर भी उतना ही भरोसा था, जितना इसकी कहानी पर.
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डायरेक्शन
इंदर कुमार के डायरेक्शन की बात करें तो कोशिश बड़ी दिखाई देती है, लेकिन फिल्म बार-बार अपनी डायरेक्शन भटक जाती है. फिल्म लगातार भागती रहती है, मगर मंजिल तक पहुंचने से पहले ही थका देती है. हर दस मिनट बाद कोई नया मोड़ आता है, लेकिन उनमें से बहुत कम ऐसे हैं जो सच में थ्रिलिंग लगते हैं. सबसे दिलचस्प बात ये है कि फिल्म बार-बार पुरानी यानी की पहली वाली ‘धमाल’ की याद दिलाती है. लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी मुश्किल भी बन जाती है. क्योंकि कंपैरिजन होते ही क्लियर दिखने लगता है कि पहली फिल्म की मासूमियत, फ्रैशनेस और ह्यूमर कहीं पीछे छूट चुका है. वैसे भी, सिर्फ पुराना नाम देने से, पुराना मैजिक क्रिएट नहीं हो जाता.

देखें या नहीं?
अब सबसे बड़ा सवाल, कि ‘धमाल 4’ देखें या नहीं? ऐसे में अगर आप सिर्फ अपने फेवरेट एक्टर्स को एक साथ देखने के लिए ‘धमाल 4” देखना चाहते हैं, तो ये मूवी कुछ-कुछ सीन्स में आपको हंसने और मुस्कुराने का मौका देगी. लेकिन अगर आप उम्मीद लेकर जा रहे हैं कि दो घंटे तक लगातार हंसेंगे, मज़ा करेंगे, तो फिर ‘धमाल 4’ देखने से पहले अपनी उम्मीदों का सीट बेल्ट जरूर बांध लेना. वैसे, बॉलीवुड में कॉमेडी फिल्में बनाना सबसे मुश्किल कामों में से एक है. लोगों को रुलाना आसान है, डराना भी आसान है, लेकिन बिना फूहड़पंती के लोगों को हंसाना बड़ा मुश्किल है और ‘धमाल 4’ इस अग्नी परीक्षा में फेल हुई है. वहीं, अगर आप दिमाग घर छोड़कर सिर्फ हल्का-फुल्का टाइमपास चाहते हैं, तो इस फिल्म को देखा जा सकता है. लेकिन अगर आप पहली ‘धमाल’ जैसा एंटरटेनमेंट ढूंढ़ रहे हैं, तो वो खजाना आपको इस बार भी नहीं मिलेगा. लास्ट में यही कहेंगे कि, फिल्म का नाम ‘धमाल’, बजट धमाल, शोर धमाल, बस कॉमेडी छुट्टी पर चली गई. वैसे, अगर आपके बच्चें हैं, तो उन्हें ये फिल्म पसंद आ सकती है. यानी आप वीकेंड पर अगर अपने बच्चों के साथ अच्छा टाइम बिताना चाहते हैं, तो ‘धमाल 4’ देखी जा सकती है. बाकी आप खुद बहुत समझदार हैं. हमारी तरफ से फिल्म को 5 में से 2 रेटिंग्स.
