Satluj Review: कुछ फिल्में सिर्फ एंटरटेन करने आती हैं, कुछ तालियां बटोरने के लिए बनती हैं और कुछ ऐसी होती हैं, जो खत्म होने के बाद भी आपके दिमाग और दिल में बैठ जाती हैं. ‘सतलुज’ ऐसी ही फिल्मों में शामिल है. ये कोई मसाला फिल्म नहीं है, जिसमें हीरो अकेले 100 लोगों को पीटकर इंसाफ दिला दे. यहां हीरो के हाथ में बंदूक नहीं, बल्कि फाइलें, सरकारी रिकॉर्ड और कागजों का ढेर है. यही बात इस फिल्म को बाकी फिल्मों से बिल्कुल अलग बना देती है. दिलजीत दोसांझ स्टार हैं, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन इस फिल्म में उन्होंने स्टार बनने की नहीं, बल्कि कैरेक्टर बनने की कोशिश की है. ‘सतलुज’ देखते हुए स्क्रीन पर दिलजीत नहीं, बल्कि जसवंत सिंह खालड़ा दिखाई देते हैं. वो एक ऐसे आदमी थे, जिन्होंने हजारों गुमनाम लोगों की आवाज बनने की हिम्मत दिखाई. इस फिल्म को रिलीज़ के 2 दिनों के अंदर ही ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 से हटा दिया गया. लेकिन जिन्होंने भी इस फिल्म को देखा, उन्होंने भारत के एक अलग ही चैप्टर को पढ़ लिया. अगर आप उन लोगों में से हैं जिन्हें दिलजीत की ‘सतलुज’ देखने का मौका नहीं मिला, तो आज आपके लिए फिल्म के रिव्यू के साथ-साथ इसकी कहानी लेकर आए हैं.
रिलीज़ से पहले चर्चा
‘सतलुज’ फिल्म की सबसे दिलचस्प बात ये है कि इसकी चर्चा रिलीज से पहले ही शुरू हो गई थी. लंबे टाइम तक सेंसर में फंसी रही ये फिल्म दो दिनों के लिए ही सही, मगर ओटीटी पर रिलीज़ हुई. इस फिल्म की कहानी बेचैन करती है, सवाल पूछती है और लंबे टाइम तक सोचने पर मजबूर कर देती है. ‘सतलुज’ की कहानी ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालड़ा की लाइफ से इंस्पायर है. पेशे से बैंक मैनेजर रहे खालड़ा एक दिन उन परिवारों की तलाश में निकलते हैं, जिनके अपने लोग अचानक गायब हो गए थे. किसी मां का बेटा लौटकर नहीं आया, किसी पत्नी का पति लापता हो गया, तो किसी बच्चे का पिता बिना कोई निशान छोड़े गायब हो गया. शुरुआत एक सवाल से होती है, लेकिन धीरे-धीरे ये तलाश हजारों अनकही कहानियों का सच सामने लाने लगती है.

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डायरेक्टर की जीत
डायरेक्टर हनी त्रेहान की सबसे बड़ी जीत यही है कि उन्होंने अपने हीरो को सुपरमैन नहीं बनाया. यहां जसवंत सिंह खालड़ा किसी फिल्मी अंदाज में सिस्टम से लड़ाई नहीं लड़ते. उनकी ताकत मुक्के नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड, नगर निगम के रजिस्टर, श्मशान घाट के डॉक्यूमेंट्स और फाइलों में छिपे आंकड़े हैं. वो साबित करते हैं कि सच हमेशा गोलियों से नहीं, बल्कि कागजों से भी सामने लाया जा सकता है. फिल्म का सबसे असरदार पहलू ये है कि ये गुस्सा दिखाने के लिए वायलेंस का सहारा नहीं लेती. यहां खून-खराबे के लंबे सीन नहीं हैं, लेकिन डर हर फ्रेम में फील होता है. एक सीन में पूरी फैमिली का मर्डर दिखाया जाता है, जिसमें 7 महीने की प्रेग्नेंट फीमेल भी शामिल होती है. डायरेक्टर उस मर्डर को सीधे कैमरे पर नहीं दिखाते, लेकिन उसके बाद की खामोशी इतनी भारी है कि लोग अंदर तक हिल जाते हैं.
1990 का पंजाब
1990 के दशक के पंजाब को जिस बारीकी से ‘सतलुज’ में दिखाया गया है, वो तारीफ के काबिल है. सूनी सड़कें, डरे हुए चेहरे, अपने लापता बेटों का इंतजार करती मांएं और ऐसा माहौल, जहां सवाल पूछना भी खतरे से खाली नहीं था. इसके अलावा फिल्म किसी पॉलिटिकल बहस में उलझने की बजाय लोगों के दर्द को दिखाती है. फिल्म की सिनेमैटोग्राफी भी इसकी जान है. कैमरा बिना किसी दिखावे के हर दर्द को चुपचाप रिकॉर्ड करता चलता है. कई जगह सिर्फ एक्टर्स के चेहरे ही पूरी कहानी कह देते हैं. फिल्म की विजुअल लैंग्वेज बहुत ही शानदार है. यानी कहीं भी जरूरत से ज्यादा ड्रामा नहीं किया गया है.
बेस्ट परफॉर्मेंस
इस बात में कोई शक नहीं है कि, ‘सतलुज’ में दिलजीत दोसांझ ने अपने करियर की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है. वो फिल्म में रोते-चिल्लाते नहीं दिखते, बल्कि आंखों और चेहरे के एक्सप्रेशन से पूरा दर्द फील करा देते हैं. उनकी एक्टिंग में इतनी सादगी है कि कई बार लगता है जैसे कोई असली इंसान अपनी लाइफ हमारे सामने जी रहा हो. जब भी कोई उन्हें धमकाता है या डराने की कोशिश करता है, उनका कैरेक्टर जवाब में ऊंची आवाज नहीं उठाता. वो सिर्फ हाथ जोड़ देता है. दिलजीत के अलावा सुविंदर विक्की भी फिल्म के सबसे मजबूत पिलर्स में से एक हैं. पुलिस ऑफिसर के कैरेक्टर में उनका शांत लेकिन खतरनाक अंदाज डर पैदा करता है. वो जोर-जोर से चिल्लाने वाले विलेन नहीं हैं, बल्कि ऐसे ऑफिसर हैं जिन्हें पूरा भरोसा है कि इतिहास कभी उनसे सवाल नहीं पूछेगा. यही कॉन्फिडेंस उनके कैरेक्टर को और भी डरावना बना देता है.

बाकी कैरेक्टर
फिल्मों में अक्सर किसी सोशल वर्कर या हीरो की पत्नी को सिर्फ इंतजार करती हुई महिला की तरह दिखाया जाता है. लेकिन ‘सतलुज’ इस सोच को बदल देती है. एक्ट्रेस गीतिका विद्या ओहल्यान ने परमजीत के कैरेक्टर में इतनी सच्चाई भरी है कि कई बार उनकी चुप्पी भी इमोशनल कर देती है. वो जानती है कि उनका पति सही रास्ते पर है, लेकिन हर सुबह ये डर भी साथ जागता है कि कहीं यही सच्चाई उन्हें उनसे हमेशा के लिए दूर न कर दे.
अर्जुन रामपाल की एंट्री
फिल्म में अर्जुन रामपाल सीबीआई ऑफिसर समुद्र सिंह के रोल में हैं. उनकी एंट्री कहानी में एक नया बैलेंस लेकर आती है. वैसे भी, अगर फिल्म सिर्फ सिस्टम के खिलाफ गुस्सा दिखाती, तो शायद ये एकतरफा लगती. लेकिन समुद्र सिंह का कैरेक्टर ये बताता है कि हर संस्था में ऐसे लोग भी होते हैं जो संविधान और न्याय पर भरोसा रखते हैं. फिल्म ये नहीं कहती कि पूरा सिस्टम गलत है. बल्कि ये सवाल उठाती है कि जब संस्थाएं खुद से सवाल पूछना बंद कर दें, तब सबसे बड़ा खतरा पैदा होता है. इसके अलावा बात करें फिल्म के बैकग्राउंड म्यूजिक की, तो ये बहुत लिमिटेड है, लेकिन जहां भी सुनाई देता है, वहां कहानी के इमोशन्स को और डीप कर देता है. कहीं भी जबरदस्ती इमोशनल बनाने की कोशिश नहीं की गई. वैसे भी कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस के लिए बनती हैं, कुछ अवॉर्ड्स के लिए और कुछ ऐसी होती हैं, जो लोगों की यादों में जिंदा रहती हैं. ‘सतलुज’ उसी तीसरी कैटेगरी में आती है.
संविधान के पक्ष में खड़ी फिल्म
‘सतलुज’ न तो पुलिस को पूरी तरह विलेन बनाती है और न ही सरकार को दुश्मन. बल्कि ये एक बहुत जरूरी सवाल पूछती है कि, क्या लोकतंत्र की ताकत सिर्फ दुश्मनों को हराने में है या अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में भी? फिल्म बार-बार याद दिलाती है कि किसी भी लोकतंत्र की असली पहचान उसकी सेना या हथियार नहीं, बल्कि उसका संविधान होता है. शायद यही वजह है कि इस फिल्म को लेकर इतनी कंट्रोवर्सी हुई. पहले इसकी रिलीज अटकती रही और फिर ओटीटी प्लेटफॉर्म से भी इसे हटा लिया गया. यही प्रोब्लम है कि, जो फिल्म यादों को बचाने की बात करती है, उसे ही बार-बार भुलाने की कोशिश की जाती है.

सालों पुराने सवाल
फिल्म भले ही 1990 के दशक के पंजाब की कहानी कहती हो, लेकिन इसके सवाल आज भी उतने ही रेलेवेंट हैं. क्या नेशनल सिक्योरिटी के नाम पर हर सवाल दबाया जा सकता है?क्या जवाब मांगना देशद्रोह कहलाने लगता है? क्या हर नागरिक को बराबर न्याय मिलता है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या कुछ मौतें ऐसी भी होती हैं जिन्हें याद रखने की इजाजत नहीं होती? यही सवाल ‘सतलुज’ को सिर्फ एक पीरियड फिल्म नहीं, बल्कि आज के दौर की भी बहुत जरूरी कहानी बना देते हैं.
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ढाई घंटे की फिल्म
करीब ढाई घंटे लंबी होने के बाद भी फिल्म बोर नहीं करती. जैसे-जैसे जसवंत सिंह खालड़ा नए डॉक्यूमेंट्स ढूंढ़ते जाते हैं, कहानी और थ्रिलिंग होती जाती है. धीरे-धीरे ये एक नॉर्मल इन्वेस्टिगेशन नहीं रहती, बल्कि ऐसा थ्रिलर बन जाती है जहां सच जानना ही सबसे बड़ा क्राइम बन जाता है. हालांकि, दूसरे हिस्से में कोर्ट और इन्वेस्टिगेशन से जुड़े कुछ सीन थोड़े छोटे हो सकते थे. इसके अलावा कुछ बातें दोहराई भी गई हैं. लेकिन ये कमियां इतनी बड़ी नहीं हैं कि पूरी फिल्म के असर को कम कर दें.
सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं
आज के दौर में जब ज्यादातर फिल्में सिर्फ कमाई और रिकॉर्ड बनाने की दौड़ में लगी हैं, तब ‘सतलुज’ ये याद दिलाती है कि सिनेमा का असली काम सिर्फ एंटरटेन करना नहीं है. सिनेमा उन कहानियों को भी जिंदा रख सकता है जिन्हें इतिहास की किताबों में जगह नहीं मिलती. सिनेमा उन लोगों की आवाज बन सकता है, जिन्हें कभी बोलने का मौका नहीं मिला. सिनेमा उन सवालों को भी उठा सकता है, जिनका जवाब सरकारी फाइलों में नहीं मिलता. सच कहूं तो, ‘सतलुज’ कोई आसान फिल्म नहीं है. यह आपको हंसाने नहीं, बल्कि सोचने के लिए मजबूर करती है. ये फिल्म खत्म होने के बाद भी आपके साथ चलती रहती है. इसके कैरेक्टर, इसके सवाल और इसकी खामोशी लंबे टाइम तक आपका पीछा नहीं छोड़ती. अफसोस है कि यादों को बचाने की कहानी कहने वाली ये फिल्म खुद भी बार-बार गायब होती रही. लेकिन अच्छी फिल्मों की यही खासियत होती है. उन्हें भले ही पर्दे से हटा दिया जाए, लेकिन लोग उन्हें अपनी बातचीत, अपने सवालों और अपनी यादों में हमेशा जिंदा रखते हैं.

रेटिंग
‘सतलुज’ सिर्फ एक इंसान की कहानी नहीं है. ये उन हजारों परिवारों की कहानी है, जिनके सवालों का जवाब कभी नहीं मिला. ये फिल्म याद दिलाती है कि जब कोई सिस्टम अपने लोगों की आवाज सुनना बंद कर देता है, तब इतिहास, लिटरेचर और सिनेमा ही उनकी गवाही देते हैं. ऐसे में अगर आप सिर्फ टाइमपास, गाने और कॉमेडी वाली फिल्म देखने की सोचते हैं, तो शायद ‘सतलुज’ आपके लिए नहीं है. वैसे, तो फिलहाल इस फिल्म को आप देख नहीं सकते. लेकिन, अगर ये फिल्म फिर से आई तो, एक बार जरूर देखिएगा. ये आपको सोचने पर मजबूर कर देगी और इंसानियत का मतलब फिर से याद दिलाएगी. बाकी हमारी तरफ से दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ को 5 में से 4 रेटिंग.
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