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पहली एंट्री से इंटरनेशनल पहचान तक, कुछ ऐसी है Cannes Film Festival में भारतीय सिनेमा के सफर की कहानी

by Preeti Pal 13 May 2026, 11:20 AM IST (Updated 13 May 2026, 3:50 PM IST)
13 May 2026, 11:20 AM IST (Updated 13 May 2026, 3:50 PM IST)
पहली एंट्री से इंटरनेशनल पहचान तक, Cannes में भारतीय सिनेमा के सफर की पूरी कहानी

13 May, 2026

Cannes Film Festival: दुनिया में अगर फिल्मों का कोई सबसे बड़ा और ग्लैमरस मंच माना जाता है, तो वो है कान्स फिल्म फेस्टिवल. फ्रांस के खूबसूरत शहर कान्स में हर साल होने वाला ये फेस्टिवल सिर्फ रेड कार्पेट और फैशन का मंच नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सिनेमा की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है. यहां सिर्फ फिल्मों की स्क्रीनिंग नहीं होती, बल्कि दुनियाभर के फिल्ममेकर्स, प्रोड्यूसर्स और कलाकार अपनी मूवीज को ग्लोबल पहचान दिलाने के लिए पहुंचते हैं. वहीं, कान्स में भारत की बढ़ती मौजूदगी इंडियन सिनेमा की ताकत को भी दिखाती है. यहां दुनिया भर की बेहतरीन फिल्मों, एक्टर्स और डायरेक्टर्स को अवॉर्ड मिलता है. फैशन लुक्स वायरल होते हैं. लेकिन भारतीय सिनेमा और कान्स का रिश्ता सिर्फ ग्लैमर तक सीमित नहीं है. ये कहानी दशकों पुरानी है, जहां भारतीय फिल्मों ने अपनी मजबूत कहानी, इमोशन्स और सोशल इश्यूज के दम पर दुनिया को इम्प्रेस किया. आज भले ही कान्स में भारतीय स्टार्स के फैशन लुक्स और रेड कार्पेट स्टाइल ज्यादा चर्चा में रहते हों, लेकिन भारत ने इस स्टेज पर अपनी पहचान बहुत पहले बना ली थी. चाहे शौनक सेन की ऑल दैट ब्रीद्स हो, पायल कपाड़िया की ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ या फिर हाल ही में नीरज घायवान की ‘होमबाउंड’, भारतीय कहानियों ने इंटरनेशनल ऑडियन्स दर्शकों का दिल भी जीता है. भारतीय सिनेमा की ये जर्नी स्ट्रगल, रिस्पेक्ट और ग्लोबल पहचान की शानदार कहानी है. लेकिन कान्स और इंडियन सिनेमा की हिस्ट्री जानने से पहले इस साल का हाल जान लेते हैं.

2026 में इंडियन फिल्मों का जलवा

हर बार की तरह इस बार भी कान्स फिल्म फेस्टिवल, भारतीय सिनेमा के लिए बहुत खास रहने वाला है. 12 मई से 23 मई तक चलने वाले इस फिल्म फेस्टिवल में भारत की मौजूदगी पहले से कहीं ज्यादा मजबूत दिखाई देगी. बॉलीवुड स्टार्स के ग्लैमरस रेड कार्पेट लुक्स के साथ-साथ इस बार भारतीय रीजनल सिनेमा और नए फिल्ममेकर्स भी दुनिया के सबसे बड़े फिल्म मंच पर अपनी छाप छोड़ने के लिए तैयार हैं. हर साल की तरह इस बार भी भारतीय स्टार्स का रेड कार्पेट पर जलवा देखने को मिलेगा. ऐश्वर्या राय बच्चन, आलिया भट्ट और कई सेलिब्रिटीज इस बार भी फ्रेंच रिवेरा में अपना स्टाइल स्टेटमेंट देते नजर आएंगे. लेकिन कान्स 2026 की चर्चा सिर्फ फैशन तक नहीं रहने वाली, क्योंकि भारतीय फिल्मों का शानदार लाइनअप भी लोगों का ध्यान खींच रहा है. सबसे ज्यादा चर्चा डायरेक्टर चिदंबरम की आने वाली फिल्म ‘बालन द बॉय’ को लेकर हो रही है. ‘मंजुम्मल बॉयज’ के डायरेक्टर चिदंबरम की ये फिल्म 14 मई को मार्शे डू फिल्म में मार्केट स्क्रीनिंग के लिए दिखाई जाएगी. केवीएन प्रोडक्शंस ने सोशल मीडिया पर इसकी अनाउंसमेंट करते हुए कहा कि फिल्म को दुनिया के बड़े स्टेज पर ले जाया जा रहा है. ये इंडियन मलयालम सिनेमा के लिए बड़ा अचीवमेंट है. वहीं, पंजाबी सिनेमा भी इस बार कान्स में खास चमक बिखेरने वाला है. डायरेक्टर अमरजीत सिंह सरों की फिल्म ‘चढ़दीकला’ का प्रीमियर कान्स में होने जा रहा है. फिल्म में एमी विर्क और रूपी गिल लीड रोल में हैं.

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क्लासिक फिल्मों का जलवा

इस बार कान्स क्लासिक्स सेक्शन में भी भारत की मजबूत मौजूदगी दिखाई देगी. फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन लगातार 5वें साल कान्स में हिस्सा ले रहा है. इस बार दिवंगत फिल्ममेकर जॉन अब्राहम की फेमस मलयालम फिल्म ‘अम्मा अरियान’ का 4K रिस्टोरेशन वर्ल्ड प्रीमियर किया जाएगा. साल 1986 में बनी ये फिल्म राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के दौर की कहानी को बहुत ही इमोशनल अंदाज में दिखाती है. खास बात ये है कि इस साल कान्स में चुनी गई ये इकलौती भारतीय फीचर फिल्म है जिसे इतना बड़ा सम्मान मिला है. इसके अलावा हिंदी-कन्नड़ फिल्म ‘सेप्टेंबर 21’ भी इस बार कान्स में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने जा रही है. डायरेक्टर करेन क्षिति सुवर्णा की इस फिल्म में प्रियंका उपेंद्र, प्रवीण सिंह सिसोदिया, जरीना वहाब और अमित बहल जैसे कलाकार नजर आएंगे. इतना ही नहीं, भारतीय स्टूडेंट्स का टैलेंट इस बार कान्स में चमकने वाला है. फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया यानी FTII के एक स्टूडेंट की शॉर्ट फिल्म ‘शैडोज ऑफ द मूनलेस नाइट्स’ को ला सिनेफ कॉम्पिटिटिव सेक्शन के लिए सिलेक्ट किया गया है. वहीं, कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा भी इस बार अपनी नई जर्नी की शुरुआत कर रहे हैं. उनकी पहली प्रोडक्शन फिल्म ‘गुदगुदी’ को मार्शे डू फिल्म सेक्शन में स्क्रीनिंग के लिए चुना गया है. ‘धुरंधर’ फ्रेंचाइजी की सक्सेस के बाद ये उनके करियर का बड़ा पड़ाव माना जा रहा है.

फैशन का जलवा

कान्स की बात हो और फैशन का जिक्र ना हो, ये कैसे हो सकता है? एक बार फिर ऐश्वर्या राय बच्चन लोरियल की ग्लोबल एंबेसडर के रूप में कान्स के रेड कार्पेट पर दिखाई देंगी. उनके कान्स लुक्स हर साल वायरल होते हैं. फैशन लवर्स को उनके कान्स लुक का बेसब्री से इंतजार रहता है. ऐश्वर्या के अलावा आलिया भट्ट का जलवा कान्स में दिख ही रहा है. वैसे, इस साल का कान्स फिल्म फेस्टिवल कई मायनों में खास रहने वाला है. दुनिया भर की 20 से ज्यादा बड़ी फिल्में पाल्मे डी’ओर के लिए कॉम्पटीशन करेंगी. लेकिन भारतीय सिनेमा के लिए ये सिर्फ रेड कार्पेट या ग्लैमर का मंच नहीं, बल्कि दुनिया को अपनी कहानियां दिखाने का बड़ा मौका है. अब भारतीय सिनेमा सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं रहा. मलयालम, मराठी, गुजराती, कन्नड़ और हिंदी सिनेमा मिलकर दुनिया को ये दिखा रहा है कि भारत में कहानियों की कोई कमी नहीं है. कान्स 2026 में भारत की मजबूत मौजूदगी यही साबित करती है कि देसी सिनेमा अब ग्लोबल मंच पर अपनी अलग पहचान बना चुका है.

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कान्स का पहला सफर

भारत की शुरुआत कान्स फिल्म फेस्टिवल में साल 1946 में हुई थी. ये वही साल था जब कान्स फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत हुई थी. इसी दौरान भारतीय फिल्म ‘नीचा नगर’ ने इतिहास रच दिया. डायरेक्टर चेतन आनंद की इस फिल्म ने फेस्टिवल का सबसे बड़ा सम्मान ‘ग्रां प्री डू फेस्टिवल’ जीता, जिसे आज के पाल्मे डी ओर के बराबर माना जाता है. ये सिर्फ एक फिल्म की जीत नहीं थी, बल्कि भारतीय सिनेमा के लिए दुनिया के दरवाजे खुलने का बड़ा पल था. उस दौर में भारतीय फिल्मों को खास तौर से एंटरटेनमेंट के लिए देखा जाता था, लेकिन ‘नीचा नगर’ ने साबित किया कि भारत सोशल और रियलिस्टिक सिनेमा में भी दुनिया को टक्कर दे सकता है.

सत्यजीत रे

अगर कान्स और भारतीय सिनेमा की बात हो और सत्यजीत रे का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता. साल 1956 में रे की फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ ने कान्स में ‘बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट’ अवॉर्ड जीता. ये फिल्म गांव, गरीबी और भावनाओं की ऐसी कहानी थी जिसने पूरी दुनिया को इमोशनल कर दिया. सत्यजीत रे ने भारतीय सिनेमा को सिर्फ गानों और मसालेदार फिल्मों की इमेज से बाहर निकाला. उनकी फिल्मों ने ये दिखाया कि भारत की कहानियां बहुत डीप और सेंसिटिव भी हो सकती हैं. ‘पाथेर पांचाली’ के बाद इंटरनेशनल स्टेज पर भारतीय फिल्मों को सीरियसली लिया जाने लगा. उसी साल राजबंस खन्ना की फिल्म ‘गौतम द बुद्धा’ को भी बेस्ट डायरेक्शन के लिए स्पेशल मेंशन मिला. इससे क्लियर हो गया कि भारत सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक मजबूत सिनेमाई कल्चर लेकर दुनिया के सामने आया है.

भारतीय कहानियों का मैजिक

साल 1988 में मीरा नायर की फिल्म ‘सलाम बॉम्बे!’ ने कान्स में कैमेरा डी’ओर अवॉर्ड जीता. ये फिल्म मुंबई की सड़कों पर रहने वाले बच्चों की जिंदगी पर बेस्ड थी. फिल्म की सच्चाई और इमोशनल कहानी ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया. इसके बाद मीरा नायर इंटरनेशनल सिनेमा का बड़ा नाम बन गईं. उनकी फिल्मों ने दिखाया कि भारतीय कहानियां पूरी दुनिया से जुड़ सकती है. हालांकि, भारतीय सिनेमा सिर्फ बॉलीवुड नहीं है. यही वजह है कि कान्स में कई रीजनल फिल्मों ने भी भारत का नाम रोशन किय. 1989 में शाजी एन करुण की मलयालम फिल्म ‘पिरावी’ को कैमेरा डी’ ओर स्पेशल मेंशन मिला. वहीं, 1999 में मुरली नायर की ‘मराना सिम्हासनम’ ने कैमेरा डी’ओर जीता. इन फिल्मों ने ये साबित किया कि भारत का लोकल सिनेमा भी वर्ल्ड लेवल पर बहुत मजबूत है. खास बात ये रही कि इन फिल्मों में चमक-धमक कम थी, लेकिन कहानी और इमोशन इतने गहरे थे कि दुनिया ने उन्हें सराहा. उससे पहले साल 1983 में मृणाल सेन की फिल्म ‘खारिज’ को कान्स में जूरी प्राइज मिला. ये फिल्म भारतीय मिडिल क्लास सोसाइटी पर बेस्ड थी. मृणाल सेन, सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक जैसे डायरेक्टर्स ने भारतीय पेरेलर सिनेमा को दुनिया में नई पहचान दिलाई.

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भारत की नई पहचान

हालांकि भारत की शुरुआत कान्स में बहुत पहले हो चुकी थी, लेकिन साल 2006 के बाद भारतीय सिनेमा की मौजूदगी एक नए अंदाज में दिखाई देने लगी. यही वो दौर था जब बॉलीवुड ग्लोबल हो रहा था और इंडियन स्टार्स की इंटरनेशनल पॉपुलैरिटी तेजी से बढ़ रही थी. साल 2002 में ऐश्वर्या राय पहली इंडियन एक्ट्रेस थीं जो कान्स की जूरी का हिस्सा बनीं. साल 2006 के बाद उनका रेड कार्पेट लुक पूरी दुनिया में छाने लगा. इसके बाद सोनम कपूर, दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा और कई भारतीय एक्ट्रेसेस ने कान्स में फैशन और सिनेमा दोनों के जरिए भारत की मौजूदगी को मजबूत किया. इसी दौर में भारतीय फिल्मों ने फिर से अपनी कहानी और कंटेंट के दम पर दुनिया का ध्यान खींचना शुरू किया. छोटे बजट की फिल्मों और इंडिपेंडेंट सिनेमा को इंटरनेशनल ऑडियन्स मिलने लगे.

100 साल का जश्न

भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर साल 2013 का कान्स फिल्म फेस्टिवल भारत के लिए बहुत खास रहा. भारत को इस फेस्टिवल में ‘ऑफिशियल गेस्ट कंट्री’ बनाया गया. इस दौरान ‘इन्क्रेडिबल इंडिया’ एग्जीबिशन हुई, जिसमें भारत की संस्कृति, सिनेमा और आर्ट को दुनिया के सामने पेश किया गया. एक्टर चिरंजीवी के साथ कई इंडियन स्टार्स इस प्रोग्राम का हिस्सा बने. ये सिर्फ एक सम्मान नहीं था, बल्कि ये हिंट था कि भारतीय सिनेमा अब दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्रीज में अपनी मजबूत जगह बना चुका है.

रेड कार्पेट से आगे की कहानी

आज कान्स में भारतीय स्टार्स के फैशन लुक्स सोशल मीडिया पर खूब वायरल होते हैं. लेकिन कान्स की असली ताकत फिल्मों और कहानियों में छिपी है. पिछले कुछ सालों में भारतीय डॉक्यूमेंट्री और इंडिपेंडेंट फिल्मों को भी खूब पसंद किया गया. इंडियन फिल्ममेकर अब सिर्फ घरेलू ऑडियन्स के लिए नहीं, बल्कि दुनियाभर के लोगों को ध्यान में रखकर फिल्में बना रहे हैं. यही वजह है कि भारतीय कंटेंट नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम और इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में लगातार जगह बना रहा है. ये कहना गलत नहीं है कि आज भारतीय सिनेमा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुका है. हिंदी फिल्मों के अलावा तमिल, मलयालम, मराठी, असमिया और बंगाली फिल्मों को भी इंटरनेशनल स्टेज पर पहचान मिल रही है. कान्स जैसे मंच भारतीय फिल्ममेकर्स के लिए सिर्फ अवॉर्ड जीतने की जगह नहीं हैं, बल्कि ये दुनिया तक अपनी आवाज पहुंचाने का जरिया भी हैं. वैसे भी अच्छी कहानियां किसी भाषा या देश की मोहताज नहीं होती. चाहे ‘नीचा नगर’ हो, ‘पाथेर पांचाली’ या ‘सलाम बॉम्बे!’, इन फिल्मों ने दुनिया को ये बताया कि भारत सिर्फ रंगों और गानों का देश नहीं, बल्कि दमदार कहानियों की धरती भी है.

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