Home Top News महाराष्ट्र में अटका मानसून, खेती और भूजल पर आएगा संकट? 41% गिरावट के पीछे हैं ये 5 कारण

महाराष्ट्र में अटका मानसून, खेती और भूजल पर आएगा संकट? 41% गिरावट के पीछे हैं ये 5 कारण

by Neha Singh 19 June 2026, 7:27 PM IST (Updated 19 June 2026, 7:28 PM IST)
19 June 2026, 7:27 PM IST (Updated 19 June 2026, 7:28 PM IST)

Monsoon Slowdown Reason: भारत में भीषण गर्मी के बाद लोगों को मानसून का बेसब्री से इंतजार है, लेकिन इस बार इसकी रफ्तार बहुत धीमी है. भारत में मानसून की शुरुआत अंडमान निकोबार से होती है और धीरे-धीरे यह दक्षिण पश्चिम राज्यों तक पहुंचता है. जून की शुरुआत में केरल में बारिश होने लगती है और दूसरे हफ्ते में महाराष्ट्र तक बादल बरस जाते हैं. इसके बाद जून के तीसरे हफ्ते तक दिल्ली, पंजाब, यूपी समेत उत्तर भारत के राज्यों में बारिश होती है. लेकिन इस बार मानसून महाराष्ट्र के दक्षिणी हिस्सों तक आकर रुक गया है.

बारिश में आई 41 प्रतिशत की कमी

मानसून की रफ्तार में इस ब्रेक की वजह से पूरे देश में बारिश में 41 परसेंट की कमी आई है, जो नॉर्मल से बहुत कम है. मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, 4 जून से 18 जून के बीच पूरे देश में सिर्फ 42.6 mm बारिश हुई है, जो नॉर्मल 72.2 mm से बहुत कम है. IMD के इलाके के हिसाब से बारिश का डिपार्चर मैप दिखाता है कि मध्य भारत में 67 %, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 42 %, सदर्न पेनिनसुला में 22 % और उत्तर-पश्चिम भारत में 6 % बारिश की कमी हुई है. मौसम विभाग ने ने गुरुवार को कहा कि “बड़े पैमाने पर अच्छे मौसम के हालात न होना” ही मुख्य कारण था कि साउथ-वेस्ट मानसून पिछले कुछ दिनों में महाराष्ट्र के बाकी हिस्सों में आगे नहीं बढ़ पाया.

ऐसे में सबके मन में एक ही सवाल है कि मानसून की स्पीड पर यह ब्रेक क्यों आया है? मानसून आगे क्यों नहीं बढ़ रहा है? क्या इससे महाराष्ट्र समेत अन्य राज्यों की खेती और भूजल पर असर पड़ेगा. खुद मौसम विभाग ने इन सवालों का जवाब दिया है. चलिए जानते हैं कि मानसून की स्पीड धीमी होने के 5 बड़े कारण क्या है.

बारिश थम जाने के कारण

कमजोर मानसूनी हवाएं

मौसम विभाग के अनुसार, बारिश की रफ्तार धीमी होने का पहला कारण अरब सागर में मानसूनी हवाओं का कमजोर पड़ना है. विभाग ने बताया, “ये हवाएं आम तौर पर नमी के बढ़ने और बड़े पैमाने पर बारिश के लिए जिम्मेदार होती हैं, जिससे मानसून आगे बढ़ता है.” ये हवाएं जितनी तेज होंगी, भारत में उतनी तेजी से मानसून फैलेगा. इन हवाओं से नमी वातावरण में नमी बढ़ती है और बादल बनते हैं. इन हवाओं के कमजोर पड़ने से मानसून केवल महाराष्ट्र के दक्षिणी हिस्से में अटका है.

दक्षिण-पश्चिमी हवाओं का कमजोर होना

दूसरा कारण है कि अरब सागर के ऊपर मानसून सर्कुलेशन से जुड़ी निचले लेवल की दक्षिण-पश्चिमी हवाएं कमजोर हो गई हैं. ये हवाएं महाराष्ट्र के तट और अंदरूनी इलाकों से नमी को दूसरे इलाकों तक पहुंचाती है. नम हवाओं के कमजोर होते ही उत्तर -पश्चिम की ओर से आने वाली गर्म और सूखी हवाएं और तेज हो गई हैं, जो एक अवरोधक के रूप में काम करती हैं. ये गर्म हवाएं मानसूनी बादलों को बनने नहीं देती और आगे बढ़ने से रोकती हैं.

क्रॉस-इक्वेटोरियल हवाएं

IMD के अनुसार, तीसरा बड़ा कारण क्रॉस-इक्वेटोरियल हवाओं का कमजोर होना है, जो भूमध्य रेखा को पार कर भारत में एंट्री करती हैं और दक्षिण से उत्तर की ओर चलती हैं. आम तौर पर ये हवाएं अरब सागर के ऊपर नमी बढ़ाती हैं और मानसून को मजबूत करती हैं. हालांकि, इस बार इनकी स्पीड कम हो गई है. इसका सीधा असर मानसून के बादलों के बनने और मजबूत होने पर पड़ा है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ये हवाएं जल्द ही मजबूत नहीं हुईं, तो जून के आखिर तक भी कई इलाकों में बारिश नॉर्मल से कम रह सकती है.

सिनॉप्टिक सिस्टम गायब

मानसून के आगे बढ़ने के लिए दो चीजें सबसे जरूरी हैं. पहला अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के ऊपर लो-प्रेशर एरिया या साइक्लोनिक सर्कुलेशन और दूसरा पश्चिमी तट के साथ काफी इंटेंसिटी वाला एक ऑफशोर ट्रफ (एक बड़े एरिया तक फैला लो प्रेशर का बेल्ट) जो मानसून को आगे बढ़ने में मदद करता है. अभी ये दोनों पूरी तरह से गायब हैं. खाड़ी में कोई हलचल न होने की वजह से मानसून को आगे बढ़ाने के लिए कोई खिंचाव नहीं मिल रहा है.

(MJO) और अल नीनो इफेक्ट

मानसून के रुकने का पांचवां और सबसे बड़ा कारण है एमजेओ (MJO) और उभरता अल नीनो . मैडेन जूलियन ऑसिलेशन (MJO) हिंद महासागर के ऊपर बादलों, हवा और बारिश का एक चक्र होता है. यह भूमध्य रेखा के आसपास पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ता है. अभी यह कमजोर है, जिससे बादल नहीं बन पा रहे हैं. MJO के सही स्थिति में होने पर बादल बनते हैं बारिश होती है. इसके साथ ही अल-नीनो भी एक मुख्य कारण है. प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति मजबूत हो रही है. अल- नीनो इफेक्ट में समुद्र का पानी गर्म हो जाता है और समुद्र के ऊपर चलने वाली हवाओं का रुख बदल जाता है. ऐसे में भारत की ओर आने वाले बादलों का रुख भी बदल जाता है.

खेती पर असर

IMD ने कहा, “इस वजह से अगले 4-5 दिनों तक महाराष्ट्र के ज़्यादातर हिस्सों में बारिश की गतिविधियां अलग-अलग रहने की संभावना है.” दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी उत्तर की ओर प्रगति, साथ ही इक्वेटोरियल प्रशांत महासागर पर हाल ही में अल नीनो की स्थिति बनने से, खरीफ फसलों पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है, जिन्हें फलने-फूलने के लिए समय पर बारिश की जरूरत होती है. मंगलवार को, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन जिलों की पहचान करने के निर्देश दिए जहां कम या असमान बारिश की संभावना है और राज्य सरकारों के साथ मिलकर फसल के हिसाब से इमरजेंसी प्लान तैयार करने के निर्देश दिए. मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि पानी बचाने, नमी मैनेजमेंट, इंटर-क्रॉपिंग और दूसरे फसल पैटर्न पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए. चौहान ने निर्देश दिया कि हर जोखिम वाले जिले के लिए एक अलग और प्रैक्टिकल स्ट्रेटेजी बनाई जानी चाहिए ताकि खरीफ सीजन के दौरान किसानों को कोई मुश्किल न हो.

गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और अन्य कृषि प्रधान राज्यों में बारिश की सुस्त रफ्तार किसानों की चिंता बढ़ा रही है. विशेषज्ञों के मुताबिक बारिश की कमी का सबसे बड़ा असर तिलहन, दलहन, सब्जियों और फलों के उत्पादन पर देखने को मिल सकता है. मुंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी और कपास जैसी फसलें पर्याप्त वर्षा पर निर्भर रहती हैं. यदि इन फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है तो खाद्य तेलों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है. इसका असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तेल से बनने वाले अनेक खाद्य उत्पाद भी महंगे हो सकते हैं.

गोवा में एक महीने का भूजल बचा

मानसून की रफ्तार धीमी होने पर भूजल पर भी संकट मंडरा सकता है. क्योंकि बारिश ही भूजल का मुख्य सोर्स है. गोवा सरकार ने कहा है कि उसके पास पीने का केवल एक महीने का ही स्टॉक है, क्योंकि तटीय राज्य में मानसून की बारिश कम हो रही है. राज्य के जल आपूर्ति विभाग के मंत्री सुभाष फल देसाई ने गुरुवार को PTI को बताया कि बारिश न होने की वजह से राज्य के अलग-अलग जलाशयों में पानी का लेवल बहुत कम हो गया है. उन्होंने कहा, “लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है. एक महीने की जरूरत पूरी करने के लिए काफी पानी है और राज्य सरकार यह पक्का करने के लिए सख्त सलाह जारी करेगी कि मौजूदा पानी उस समय से पहले खत्म न हो.

उन्होंने कहा कि उन्हें इंडस्ट्रीज समेत अलग-अलग तबकों से राज्य में पानी की सप्लाई की हालत के बारे में पूछने के लिए कॉल आ रहे हैं. फल देसाई ने कहा कि उनका विभाग जल संसाधन विभाग के मंत्री सुभाष शिरोडकर के साथ राज्य भर के अलग-अलग डैम में मौजूद पानी के डेटा का मूल्यांकन करने के लिए एक मीटिंग करेगा. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “अभी कोई कमी नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा.”

मंत्री के अनुसार, सेलौलिम डैम, जो पूरे साउथ गोवा, कुशावती जिले और नॉर्थ गोवा के कुछ हिस्सों को पानी सप्लाई करता है, 27 प्रतिशत भरा हुआ है. इसकी ड्रॉइंग कैपेसिटी 280 MLD (मिलियन लीटर प्रति दिन) है. उन्होंने कहा कि नॉर्थ गोवा के सत्तारी तालुका में मौजूद अंजुनेम डैम में पानी का स्टॉक गिरकर 9.9 प्रतिशत हो गया है.

गोवा-कर्नाटक बॉर्डर पर बने इस प्रोजेक्ट की ड्रॉइंग कैपेसिटी 50 MLD है, जिसे प्लांट में ट्रीट किया जाता है. फाल देसाई ने कहा कि नॉर्थ गोवा में पोंडा के पास शिरोडा में म्हैसल डैम में पानी का लेवल 19 प्रतिशत है और डैम की ड्रॉइंग कैपेसिटी 10 से 14 MLD है. कैनाकोना के सबसे दक्षिणी तालुका में मौजूद चपोली डैम में काफी पानी है और कैनाकोना में पानी की कोई कमी नहीं होगी. उन्होंने कहा कि उत्तरी गोवा के बर्देज तालुका को पानी सप्लाई करने वाले अमथाने रिजर्वॉयर में भी अच्छा स्टॉक है. मौसम विभाग ने अनुमान लगाया है कि अगले वीकेंड तक राज्य में बारिश फिर से शुरू हो जाएगी.

कब मिलेगी राहत

राहत की बात यह है कि मौसम विभाग ने मानसून के आने की तारीख भी बता दी है. 22- 23 जून के आस-पास उत्तर पश्चिम की शुष्क हवाओं का असर कम होने लगेगा और अरब सागर से आने वाली नमी वाली हवाएं फिर से अपना कब्जा जमा लेंगी. इसके बाद महाराष्ट्र में रुक हुआ मानसून रफ्तार पकड़ेगा और उत्तर-पूर्वी भारत में बादल बरसेंगे.

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