Home Top News 4 महीने का सन्नाटा और अरबों डॉलर का दांव: वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज?

4 महीने का सन्नाटा और अरबों डॉलर का दांव: वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज?

by Sanjay Kumar Srivastava 19 June 2026, 7:42 PM IST
19 June 2026, 7:42 PM IST
4 महीने का सन्नाटा और अरबों डॉलर का दांव: वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए होर्मुज़ का क्या है मतलब?

Strait of Hormuz: होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का हृदय है और भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक समुद्री मार्ग है. फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाला यह संकरा जलमार्ग दुनिया का सबसे व्यस्त तेल पारगमन मार्ग है. इस मार्ग में मामूली व्यवधान भी वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ा देता है, जिससे भारत में महंगाई, राजकोषीय घाटा और रुपये की कमजोरी का खतरा बढ़ जाता है.

ग्लोबल इकॉनमी का थम गया था दिल

होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के फिर से खुलने से लगभग चार महीने तक चली उस रुकावट का अंत हो गया है, जिसके कारण कच्चे तेल की कीमतें बहुत बढ़ गई थीं और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं पैदा हो गई थीं. यह जलडमरूमध्य तब खुला जब युद्ध खत्म करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके ईरानी समकक्ष मसूद पेज़ेश्कियान के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) को लागू किया गया. होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जो फारस की खाड़ी (Persian Gulf) को ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) से जोड़ता है, सामान्य समय में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है. 28 फरवरी को जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर संयुक्त हमले शुरू किए, तब से इस जलमार्ग से होने वाली शिपिंग बुरी तरह बाधित हो गई थी.

138 जहाजों की रफ्तार ‘सिंगल डिजिट’ पर आई

ज्वाइंट मैरीटाइम इंफॉर्मेशन सेंटर के अनुसार, संघर्ष से पहले हर दिन लगभग 138 जहाज इस जलडमरूमध्य से गुजरते थे. रुकावट के चरम पर यह संख्या घटकर सिंगल डिजिट (एक अंक) में आ गई थी. अमेरिका-इज़राइल की बमबारी शुरू होने के तुरंत बाद तेहरान ने इस जलमार्ग को बंद करने का कदम उठाया, और इसके जवाब में वाशिंगटन ने कुछ हफ़्तों बाद ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी कर दी. इस जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के फिर से खुलने से इस इलाके के बाहर भी राहत मिलने की उम्मीद है.

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93 मिलियन बैरल कच्चे तेल के बाहर आने का रास्ता साफ

कमोडिटी डेटा फर्म ‘केप्लर’ का अनुमान है कि इसके फिर से खुलने से खाड़ी में फंसा लगभग 93 मिलियन बैरल गैर-ईरानी कच्चा तेल बाहर निकल सकेगा. साथ ही, अगर वॉशिंगटन प्रतिबंधों में और ढील देता है तो 72 मिलियन बैरल ईरानी कच्चा तेल भी, जो अभी चाबहार के पश्चिम में टैंकरों में फंसा हुआ है, बाहर आ सकेगा. इसके फिर से खुलने का असर पश्चिम एशिया से कहीं दूर तक महसूस किया जा रहा है. रास्ता फिर से खुलने से यूरोप और एशिया को होने वाला निर्यात बिना महंगे चक्कर लगाए फिर से शुरू हो सकेगा. इन चक्करों की वजह से हाल के महीनों में माल ढुलाई और ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ गई थी. दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक भारत के लिए यह घटनाक्रम काफी राहत लेकर आया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट से जो दिक्कतें सामने आई थीं, वे अभी पूरी तरह दूर नहीं हुई हैं.

सऊदी अरब, इराक, कुवैत, UAE और कतर के लिए है मुख्य रास्ता

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) सऊदी अरब, इराक, कुवैत, UAE और कतर के लिए एक्सपोर्ट का मुख्य रास्ता है. खाड़ी के इस अहम रास्ते के बंद होने से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल टैंकरों में भरा हुआ था और वे रास्ता खुलने का इंतज़ार कर रहे थे. चीन और भारत से लेकर यूरोप और अफ्रीका तक की ऊर्जा की ज़रूरत वाली अर्थव्यवस्थाएं खाड़ी से आने वाले कच्चे तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की लगातार सप्लाई पर निर्भर हैं. इसके पूरी तरह से खुलने से दोनों ही मामलों में राहत मिलने की उम्मीद है. खाड़ी के उत्पादकों के लिए रुकावट कम होगी और अटके हुए तेल के टैंकर दुनिया भर के खरीदारों तक पहुंच सकेंगे. भारत के लिए, खाड़ी देश ऊर्जा सप्लाई करने वाले सबसे अहम देशों में से हैं.

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भारत लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल करता है आयात

भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 85-90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, और इसमें से लगभग आधी सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आती है. जहां तक देश में खाना पकाने के लिए सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली गैस यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की बात है, तो भारत अपनी कुल ज़रूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, और इसमें से लगभग 90 प्रतिशत सप्लाई इसी जलडमरूमध्य से होकर आती है. भारत अपनी ज़रूरत की लगभग आधी प्राकृतिक गैस का आयात भी करता है, जिसमें से लगभग दो-तिहाई हिस्सा कतर और UAE से आता है.

होर्मुज के रास्ते भारत का लगभग 60-80 प्रतिशत तेल और गैस

इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफेयर्स के सीनियर रिसर्च फ़ेलो फ़ज़ूर रहमान सिद्दीकी ने कहा कि भारत के लिए इस जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) का महत्व कई वजहों से है. उन्होंने कहा कि यह एक प्राकृतिक जलमार्ग है, इसलिए हमें पनामा नहर या स्वेज नहर की तरह कोई शुल्क (ट्रांज़िट फ़ीस) नहीं देना पड़ता है. उन्होंने आगे कहा कि भारत की लगभग 60-80 प्रतिशत तेल और गैस ऊर्जा इसी रास्ते से आती है और हम काफ़ी हद तक खाड़ी देशों, खासकर सऊदी अरब, कतर और UAE पर निर्भर हैं. टकराव के दौरान ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को प्रभावी ढंग से बंद कर दिया था. ऐसी खबरें भी आई थीं कि तेहरान ने इस जलमार्ग से गुज़रने वाले कमर्शियल जहाज़ों पर ट्रांज़िट फ़ीस भी लगाई थी.

होर्मुज का सीधा संबंध महंगाई और आर्थिक दबाव से

सिद्दीकी ने बताया कि इसके महत्व का दायरा सिर्फ़ ऊर्जा तक ही सीमित नहीं है. उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों में हमारे लगभग 1 करोड़ लोग रहते हैं. हम इस क्षेत्र से होने वाले आयात पर काफ़ी हद तक निर्भर हैं. न सिर्फ़ तेल और गैस के लिए बल्कि फ़र्टिलाइज़र, पोटैशियम और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों के लिए भी. उन्होंने लंबे समय तक चली इस रुकावट का सीधा संबंध महंगाई और आर्थिक दबाव से जोड़ा. कहा कि हमने कमर्शियल गैस की कीमतें बढ़ते देखी हैं, हमने देखा है कि कैसे फ़्लाइट टिकट महंगे हो गए हैं. अगर तेल और गैस की सप्लाई में किसी भी तरह की रुकावट आती है, तो इससे इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन सच में रुक सकता है.

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गल्फ इलाके से आयात के लिए होर्मुज सबसे सस्ता रास्ता

दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में सेंटर फ़ॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर सेबेस्टियन एन ने इस निर्भरता को ज़्यादा स्ट्रक्चरल नज़रिए से समझाया. उन्होंने कहा कि गल्फ़ इलाक़े से इंपोर्ट के लिए होर्मुज़ सबसे सस्ता, तेज़ और सुविधाजनक रास्ता है. समय के साथ, भारत ने इस रास्ते से ट्रांसपोर्टेशन का एक असरदार सिस्टम बनाया है. इसलिए कोई दूसरा रास्ता खोजना बहुत मुश्किल है. खास बात यह है कि दोनों एक्सपर्ट्स इस बात पर सहमत थे कि भारत ने गल्फ़ में पहले हुई रुकावटों के मुकाबले इस संकट का बेहतर तरीके से सामना किया. सेबेस्टियन ने कहा कि पहले हुए दो गल्फ़ युद्धों (1990 और 2003) के हालात के उलट, इस बार भारत काफ़ी हद तक इस इलाक़े से होने वाले एनर्जी ट्रांसपोर्टेशन में पूरी रुकावट को रोकने में कामयाब रहा. उन्होंने इसके असर को कम करने का श्रेय रूस और वेनेज़ुएला से मिली वैकल्पिक सप्लाई को दिया.

MoU में क्या कहा गया है?

MoU के टेक्स्ट के अनुसार, ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से कमर्शियल जहाजों की आवाजाही को 60 दिनों तक बिना किसी रुकावट के जारी रखने के लिए पूरी कोशिश करने पर सहमत हो गया है. दस्तावेज़ में कहा गया है कि माइंस और दूसरी तकनीकी रुकावटें हटाए जाने के 30 दिनों के भीतर हालात पूरी तरह सामान्य होने की उम्मीद है. तेहरान ने इस जलडमरूमध्य के लंबे समय के प्रशासन को लेकर ओमान और क्षेत्र के संबंधित देशों के साथ बातचीत शुरू करने का भी वादा किया है.

यह शांति कितनी नाज़ुक है?

बातचीत पर नज़र रखने वाले एनालिस्ट और ऑब्ज़र्वर इस समझौते के लंबे समय तक टिके रहने को लेकर सतर्क हैं.
वॉशिंगटन स्थित ‘क्विंसी इंस्टीट्यूट फॉर रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट’ के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट ट्रिटा पारसी ने अपने हालिया ब्लॉग में लिखा कि सबसे बड़ा बाहरी खतरा इज़राइली सरकार और बेंजामिन नेतन्याहू का वह जुनून है, जिसके तहत वे ईरान और अमेरिका के बीच पुरानी दुश्मनी खत्म करने के किसी भी मौके को नाकाम करने की कोशिश करते रहते हैं. सिद्दीकी ने कहा कि ईरान को अमेरिका पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है. असली टकराव अमेरिका और ईरान के बीच नहीं है.

असली टकराव इजराइल और ईरान के बीच

असली टकराव इज़राइल और ईरान के बीच है. इज़राइल ने बार-बार कहा है कि वह ईरान को परमाणु शक्ति नहीं बनने देगा. इज़राइल ने ही युद्ध शुरू किया था. ‘द हेरिटेज फाउंडेशन’ के सीनियर रिसर्च फेलो स्टीव येट्स ने MoU और संकट से निपटने के ट्रंप के तरीके का समर्थन किया. उन्होंने फॉक्स न्यूज़ से कहा कि ईरान में ट्रंप के ऑपरेशन से उसकी सैन्य क्षमता काफी कम हो गई. किसी भी शांति समझौते की शर्तों का पालन कराने के लिए ईरान पर दबाव बनाने की ज़रूरत होगी, लेकिन यह कहना गलत होगा कि अमेरिका वहीं वापस आ गया है जहां वह तीन महीने पहले ऑपरेशन शुरू होने के समय था.

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