Health System: भारत की स्वास्थ्य प्रणाली गैर-संक्रामक रोगों (NCD) के कारण चरमरा रही है. ऐसे में विशेषज्ञों ने ‘माइक्रो-हॉस्पिटलों’ की स्थापना की वकालत की है.
Health System: भारत की स्वास्थ्य प्रणाली गैर-संक्रामक रोगों (NCD) के कारण चरमरा रही है. ऐसे में विशेषज्ञों ने ‘माइक्रो-हॉस्पिटलों’ की स्थापना की वकालत की है. उनका दावा है कि ये अस्पताल भारत में NCD के कारण होने वाली मौत को कम कर सकते हैं.विशेषज्ञों का दावा है कि भारत में लगभग 63 प्रतिशत मौत गैर-संक्रामक रोगों (NCD) के कारण होती है. मालूम हो कि गैर-संक्रामक बीमारी (NCD) वे बीमारियां हैं जो रोगाणुओं (वायरस, बैक्टीरिया) के कारण नहीं होतीं. ये मुख्य रूप से आनुवंशिकी, जीवनशैली (खराब आहार, व्यायाम की कमी, तंबाकू, शराब), पर्यावरण और उम्र बढ़ने जैसे कारकों से होती हैं. इनमें हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और अस्थमा जैसे रोग शामिल हैं, जो दुनिया भर में मृत्यु का एक प्रमुख कारण हैं. विशेषज्ञों ने बताया कि WHO के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में होने वाली सभी मौत में से लगभग 63 प्रतिशत मौत गैर-संक्रामक रोगों (NCD) के कारण होती हैं. देश में अस्पतालों में बेड की संख्या प्रति 1,000 जनसंख्या पर मात्र 0.55 है, जो WHO के 3 प्रति 1,000 के मानक से काफी कम है. जिसके कारण अस्पतालों में भीड़भाड़, लंबा इंतजार और देखभाल की गुणवत्ता में कमी देखने को मिलती है.
भीड़भाड़ वाले अस्पतालों में नहीं मिल पाता इलाज
विशेषज्ञों ने कहा कि इन्हीं वजहों से सूक्ष्म अस्पतालों (माइक्रो हॉस्पिटल) की जरूरत महसूस की जा रही है. ये अस्पताल 15,000 से 50,000 वर्ग फुट के बीच होते हैं. इनमें अल्पकालिक प्रवास के लिए 10 या उससे कम बिस्तरों की व्यवस्था रहती है. इनमें आपातकालीन कक्ष, प्राथमिक देखभाल और विशेषज्ञ चिकित्सक शामिल होते हैं. जिससे मरीजों को आपात स्थिति में त्वरित व उचित चिकित्सा मिल जाती है. विशेषज्ञों ने कहा कि भारत की विश्वस्तरीय प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे के बावजूद लोगों को प्राथमिक क्लीनिकों और भीड़भाड़ वाले 500 बेड वाले अस्पतालों में सही इलाज नहीं मिल पाता है. यह बातें स्वास्थ्य पर आयोजित ‘हील वनहेल्थ कनेक्ट सीरीज’ में उभर कर सामने आईं. इस मौके पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के पूर्व महानिदेशक स्वास्थ्य सेवा (DGHS) डॉ. जगदीश प्रसाद ने कहा कि भारत में डॉक्टर और तकनीक तो हैं, लेकिन वास्तव में हमारे पास समन्वित देखभाल की कमी है. कहा कि बड़े अस्पताल अक्सर गंभीर संकटों के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं, न कि सामान्य परिस्थितियों के लिए. उन्होंने बताया कि गैर-संक्रामक रोगों के लिए दीर्घकालिक, समुदाय-केंद्रित प्रबंधन की आवश्यकता होती है.
एक ही छत के नीचे मिलते हैं सभी परामर्श
उन्होंने कहा कि माइक्रो-हॉस्पिटल में परामर्श, निदान और देखभाल सभी एक ही छत के नीचे होते हैं. इससे मरीजों के इधर-उधर भटकने की समस्या से बचा जा सकता है, जो आमतौर पर तब होती है जब मरीजों को एक ही निदान के लिए कई प्रयोगशालाओं और क्लीनिकों में जाना पड़ता है. सर गंगा राम अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार मेडिसिन डॉ. मोहसिन वली ने वर्तमान प्रणाली के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को रेखांकित किया. पैसिफिक वनहेल्थ के सह-संस्थापक और अध्यक्ष डॉ. स्वदीप श्रीवास्तव ने कहा कि स्वास्थ्य सेवा का भविष्य बड़े अस्पताल बनाने में नहीं है, यह बेहतर ढंग से समन्वित प्रणालियों के निर्माण में है. माइक्रो अस्पताल बड़े अस्पतालों के छोटे संस्करण नहीं हैं, वे ‘स्वास्थ्य सेवा जैसी होनी चाहिए’ के एक नए दर्शन हैं, जो परिवार, समुदाय और दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं. दिल्ली के मेटाबोलिक रोगों के सलाहकार चिकित्सक डॉ. एजाज इल्मी ने कहा कि कई जीवनशैली संबंधी बीमारियां चुपचाप विकसित होती हैं और जब तक मरीज बड़े अस्पताल पहुंचता है, तब तक बीमारी गंभीर हो चुकी होती है. इल्मी ने कहा कि हमें इस माइक्रो अस्पताल ढांचे की आवश्यकता है ताकि बीमारी को शुरुआती चरणों में ही पहचाना जा सके.
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