Suicide: हम सभी बाहर से तो बिल्कुल सामान्य दिखते हैं, लेकिन सभी के मन में हर समय अलग-अलग ख्याल चलते रहते हैं. किसी को करियर की टेंशन होती है, किसी को फैमिली की तो किसी को प्यार की. हो सकता है कि कोई बाहर तो लोगों से घिरा हो, बातें कर रहा हो, हंस रहा हो और अपने रोज के काम कर रहा हो, लेकिन अंदर ही अंदर वह बहुत अकेला और परेशान महसूस कर रहा हो. कभी-कभी, यह इमोशनल दर्द इतना बढ़ जाता है कि उसे इससे छुटकारा पाने के लिए अपनी जिंदगी खत्म करना ही एकमात्र रास्ता लगता है.
जींदगी से हारकर आत्महत्या करने वाले लोग खुद तो चले जाते हैं, लेकिन पीछे छोड़ देते हैं अपने परिवार के लिए उम्र भर का दर्द और आंसू. इसलिए आज के समय में, जब लोग किसी और की भावनाओं को समझना नहीं चाहते, आप अपनों को समझें, अगर आपको लगता है कि आपके आसपास या परिवार में कोई व्यक्ति निराश है, तो उसको इमोशनल सपोर्ट देना बहुत जरूरी है.
दुनिया में 7.2 लाख लोग सालाना ले रहे अपनी जान
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल लगभग 727,000 लोग सुसाइड करते हैं और इससे भी ज़्यादा लोग सुसाइड की कोशिश करते हैं. 2021 में 15 से 29 साल के लोगों में सुसाइड मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण था. यह समस्या सिर्फ अमीर देशों तक ही सीमित नहीं है. दुनिया के सभी हिस्सों में लोग इससे प्रभावित हैं और लगभग 73 प्रतिशत सुसाइड कम और मध्यम आय वाले देशों में होते हैं. सुसाइड किसी भी समाज और देश के लिए एक गंभीर समस्या है.
भारत में आत्महत्या और उससे जुड़े फैक्ट
वहीं भारत की बात करें, तो भारत में हर साल लगभग 1.70 लाख लोग आत्महत्या करते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में आत्महत्या की दर प्रति 1 लाख आबादी पर 12.4 है, जो अब तक के सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है. आत्महत्या करने वाले पुरुषों में शादीशुदा पुरुषों की संख्या काफी ज्यादा है. NCRB की रिपोर्ट बताती है कि 2024 में आत्महत्या करने वाले सभी लोगों में से लगभग 67.5% शादीशुदा थे. पिछले दशक में छात्रों की आत्महत्याओं में 65% की भारी बढ़ोतरी हुई है, जो बहुत ही गंभीर है. अकेले 2023 में, देश भर में लगभग 13,900 छात्रों ने आत्महत्या की, जिसकी मुख्य कारण परीक्षा से जुड़ा तनाव था. दिल्ली और कोटा से अक्सर छात्रों के सुसाइड की खबरें आती हैं, जिसको लेकर कुछ खास कड़े कदम नहीं उठाए जाते.

कौन कर सकता है आत्महत्या
सुसाइड का कोई एक कारण नहीं है, न ही कोई एक ऐसा व्यक्ति है जिसे सबसे ज्यादा रिस्क में माना जा सके. कुछ हालात निश्चित रूप से आशंका को बढ़ा सकते हैं. कई मामलों में मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं, खासकर डिप्रेशन और शराब का इस्तेमाल, सुसाइडल बिहेवियर से जुड़ी पाई गई हैं. जिन लोगों ने पहले सुसाइड की कोशिश की है, उनके दोबारा ऐसा करने की आशंता ज्यादा होती है. हालांकि, हर मामला मानसिक बीमारी से जुड़ा नहीं होता. कभी-कभी, जिंदगी में अचानक आने वाला कोई बड़ा संकट व्यक्ति को अंदर से इतना कमजोर बना देता है कि वह उसका सामना नहीं कर पाता. आर्थिक तंगी, रिश्तों में तनाव, अकेलापन, पुराना दर्द, गंभीर बीमारी, हिंसा, बुरा बर्ताव, किसी अपने को खोना और सामाजिक भेदभाव भी व्यक्ति के मेंटल स्ट्रेस को बढ़ा सकते हैं.
कुछ कमजोर सामाजिक समूह के लोगों में भी आत्महत्या करने की आशंका ज्यादा होती है. इनमें रिफ्यूजी और माइग्रेंट, आदिवासी समुदाय, LGBTQ के लोग और कैदी शामिल हो सकते हैं. हालांकि, किसी व्यक्ति की पहचान अपने आप में यह तय नहीं करती कि वह सुसाइड करेगा या नहीं. असल कारण उनके हालात होते हैं, जिनमें व्यक्ति लगातार अकेलापन, भेदभाव या मेंटल स्ट्रेस महसूस करता है.
मानसिक बीमारी और आत्महत्या
यह एक आम गलतफहमी है कि केवल मानसिक बीमारी वाले लोग ही आत्महत्या करते हैं. आत्महत्या करने वाले हर व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या हो, यह जरूरी नहीं है. इसी तरह मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हर व्यक्ति को आत्महत्या के विचार आए, यह भी जरूरी नहीं. आत्मघाती व्यवहार कई वजहों से हो सकता है. व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक स्थिति, रिश्ते, आर्थिक हालात, सामाजिक माहौल और ज़िंदगी की तनावपूर्ण घटनाएं – ये सभी इसमें भूमिका निभा सकते हैं. इसलिए, किसी से बस यह कह देना कि “तुम्हारे पास सब कुछ है, फिर तुम परेशान क्यों हो?” असल में उनकी परेशानी को और बढ़ा सकता है. हर कोई तनाव और मुश्किल हालात का सामना अलग-अलग तरह से करता है.
अक्सर छोटी-बड़ी कई समस्याएं समय के साथ जमा होती जाती हैं, जिससे व्यक्ति को लगने लगता है कि हालात बदल नहीं सकते. ऐसे समय में उन्हें अपनी मुश्किल स्थिति से निकलने का कोई और रास्ता नहीं दिखता. इसलिए आत्महत्या को किसी एक घटना या कारण से जोड़ना गलत है. इसमें कई व्यक्तिगत, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और हालात से जुड़े कारक शामिल हो सकते हैं.
क्या आत्महत्या को रोका जा सकता है?
आत्महत्या को रोकना मुमकिन है. सबसे जरूरी बात यह है कि व्यक्ति को समय पर मदद और भावनात्मक सहारा मिले. WHO का ‘LIVE LIFE’ प्रोग्राम आत्महत्या की रोकथाम के लिए चार अहम उपायों पर जोर देता है. पहला- आत्महत्या के खतरनाक तरीकों तक पहुंच को सीमित करना; दूसरा- आत्महत्या पर जिम्मेदार मीडिया रिपोर्टिंग को बढ़ावा देना और तीसरा, किशोरों में सामाजिक और भावनात्मक जीवन कौशल को बढ़ावा देना. चौथा, आत्मघाती व्यवहार से प्रभावित लोगों की जल्द पहचान, सही जांच, इलाज और फॉलो-अप सुनिश्चित करना. इसके अलावा, सरकारों को आत्महत्या से जुड़े डेटा कलेक्शन को बेहतर बनाने, जागरूकता बढ़ाने और अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल मजबूत करने की भी जरूरत है.
चुप्पी है सबसे बड़ी रुकावट
आत्महत्या को रोकने में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है इससे जुड़ा सामाजिक कलंक या शर्म. बहुत से लोगों को डर होता है कि अगर वे अपनी मानसिक परेशानी या आत्महत्या के विचारों के बारे में बताएंगे, तो उन्हें कमजोर समझा जाएगा. वे लोग इसी डर के कारण अपनी परेशानी को सहते रहते हैं और परिवार, दोस्त या विशेषज्ञ मदद नहीं लेते. समाज में आत्महत्या के बारे में खुलकर बात करना मुश्किल होता है. लेकिन खामोशी से समस्या हल नहीं होती, बल्कि, इससे व्यक्ति और भी अकेला महसूस कर सकता है. इसलिए, आत्महत्या के बारे में संवेदनशीलता के साथ बात करना जरूरी है. अपने परिवार और दोस्तों के बीच चर्चा करने से जरूर हल निकलता है.

अगर किसी को आत्महत्या के विचार आ रहे हों, तो क्या करें
अगर आप अपने आस-पास, परिवार या दोस्त में किसी व्यक्ति को लगातार बेकार, निराश या अकेला महसूस हो रहा है, तो आपको उनकी तरफ मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए. उनकी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि दूसरा व्यक्ति किस परेशानी से जूझ रहा है. ऐसे व्यक्ति से शांति से बात करना और उसे यह यकीन दिलाना सबसे जरूरी है कि आप उनके साथ हैं और आप पर वे भरोसा कर सकते हैं, ताकि उन्हें लगे कि उनकी बात सुनी जा रही है और उनकी परेशानी को गंभीरता से लिया जा रहा है. अगर आप किसी करीबी के व्यवहार में अचानक और बड़ा बदलाव देखते हैं, तो उनसे बात करने में संकोच न करें. उनके साथ किसी शांत जगह पर बैठें और पूछें कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं. सीधे तौर पर आत्महत्या के बारे में पूछने से कोई भी आपको आत्महत्या के विचार के बारे में नहीं बताएगा, लेकिन अगर उन्हें आपके ऊपर भरोसा हो जाता है, तो वह जरूर सारी बातें आपसे शेयर करेंगे.
अगर आपको कोई ऐसा व्यक्ति मिलता है, तो उसे मदद के लिए किसी भरोसेमंद परिवार के सदस्य, दोस्त, डॉक्टर, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, काउंसलर या सोशल वर्कर से संपर्क कराएं. वहीं अगर आपको लगता है कि वह बहुत ज्यादा तनाव में है और खुद को नुकसान पहुंचा सकता है तो उन्हें किसी भी हालत में अकेला न छोड़ें. तुरंत स्थानीय आपातकालीन सेवाओं या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से मदद लेनी चाहिए. हो सकता है आप किसी परिवार को उजड़ने से बचा लें.
यहां करें संपर्क
अगर आपका कोई जानने वाला परेशान है या डिप्रेशन में हो, तो सबसे पहले उसे इमोशनली सपोर्ट करें. उनका ख्याल रखें और नेशनल 24/7 टोल-फ्री मेंटल हेल्थ रिहैबिलिटेशन हेल्पलाइन KIRAN को 1800-599-0019 पर या टेली-मानस 1800-891-4416 पर कॉल करें.
मदद मांगना कमजोरी की निशानी नहीं
आत्महत्या की रोकथाम के लिए जरूरी नहीं कि कोई बड़ा अभियान ही चलाया जाए. अक्सर, इसकी शुरुआत एक साधारण बातचीत से होती है. किसी परेशान व्यक्ति से यह पूछना कि “क्या आप ठीक हैं?” और बिना किसी पूर्वाग्रह के उनकी बात सुनना एक बड़ा कदम हो सकता है. हर समस्या का तुरंत समाधान नहीं होता, लेकिन किसी को यह एहसास दिलाना कि वे अकेले नहीं हैं, बहुत मायने रखता है. इसके लिए मेंटल हेल्थ के बारे में खुलकर बातचीत, समय पर मदद मिलना, परिवार और समाज की संवेदनशीलता और सरकारों द्वारा प्रभावी रोकथाम रणनीतियों को लागू करने की जरूरत है. स्कूलों और कॉलेजों में एंटी-डिप्रेशन सेल बनाने चाहिए. समाज को यह समझाना बहुत जरूरी है कि इमोशनली सपोर्ट कितना जरूरी है. कभी-कभी, किसी व्यक्ति को जिंदगी में वापस लाने के लिए बस एक सुरक्षित बातचीत, सही सपोर्ट और इस बात का भरोसा चाहिए होता है कि मुश्किल समय के बाद भी आगे बढ़ने का रास्ता मौजूद है.
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