Suicides in India: इंसान जब जीवन जीने की आस छोड़ देता है, तो उसे सबसे आसान सिर्फ एक रास्ता दिखता है- आत्महत्या. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा हाल ही में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में 1,70,746 लोगों ने आत्महत्या की. सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि कुल मामलों में से 73 प्रतिशत पुरुष थे. इनमें से ज्यादातर लोगों ने पारिवारिक समस्याओं, जिम्मेदारियों के बोझ, रिश्तों में तनाव और भारी मानसिक दबाव के कारण अपनी जान लेने का फैसला किया. इस डेटा से पता चलता है कि सबसे ज्यादा हताश और निराश पुरुष ही रहते हैं. समाज ने उनकी भावनाओं, डर और अंदरूनी कमजोरी को समझने की कोशिश शायद ही कभी की हो. समाज अक्सर पुरुषों को मजबूत बने रहने की सीख देता है और यही कारण है कि वे कभी खुलकर अपनी भावनाओं को बता नहीं पाते.
पुरुष आर्थिक दबाव, पारिवारिक उम्मीदों और अंदरूनी मानसिक उथल-पुथल से चुपचाप जूझते रहते हैं और अपनी मुश्किलों के बारे में खुलकर बात नहीं कर पाते. यही चुप्पी धीरे-धीरे उन्हें अकेलेपन और निराशा की ओर धकेल देती है. ये आंकड़े महज एक रिपोर्ट नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज का एक कड़वा सच हैं, जिसे आज भी गंभीरता के साथ स्वीकार नहीं किया जाता. इस रिपोर्ट में आप जानेंगे कि महिलाओं और पुरुषों ने किन कारणों से आत्महत्या की.
जानें हालिया आंकड़े
भारत में 2024 में 1,70,746 आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए. यह पढ़ने में सिर्फ एक संख्या लगती है, लेकिन हर एक आत्महत्या के पीछे उन लोगों का मानसिक तनाव, उनका दर्द, उनकी परेशानियां और आंसू छिपे हैं. सभी दर्ज मामलों में से लगभग तीन-चौथाई पुरुष थे. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में 1,25,449 पुरुषों ने आत्महत्या की, जबकि 45,245 महिलाओं और 52 ट्रांसजेंडर ने अपनी जान ली. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा रिपोर्ट किए गए मामलों के आधार पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने आंकड़े जारी किए हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र में सबसे अधिक 22,174 मौतें दर्ज की गईं, जबकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में प्रति लाख जनसंख्या पर सबसे अधिक 40.6 प्रतिशत आत्महत्या दर दर्ज की गई.
यहां भारत के डेमोग्राफिक्स, राज्य-वार घटनाओं की दर और सुसाइड के मुख्य कारणों का डिटेल में ब्योरा दिया गया है, जिसके मुताबिक, पारिवारिक समस्याएं (वैवाहिक मुद्दों को छोड़कर) आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी हैं, जिसने अलग-अलग जेंडर के 57,000 से अधिक लोगों की जान ली. शादी न होने के कारण ज्यादातर मर्दों ने आत्महत्या की, वहीं दहेज से जुड़े झगड़ों में ज्यादातर औरतों की जान गई.
कहां है सबसे ज्यादा आत्महत्या दर

2024 के डेटा का राज्य-वार ब्योरा काफी क्षेत्रीय अंतर दिखाता है, जिसमें महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा 22,174 मौतें हुईं, उसके बाद तमिलनाडु में 19,965 और मध्य प्रदेश में 15,491 का नंबर आता है. हालांकि, जब आबादी के हिसाब से एडजस्ट किया गया, तो अंडमान और निकोबार आइलैंड्स में सबसे ज्यादा आत्महत्या दर 40.6 प्रति लाख लोगों पर दर्ज किया गया. उसके बाद सिक्किम में 36.3 प्रतिशत प्रति लाख आत्महत्या दर है और केरल में 30.2 प्रतिशत.
आत्महत्या का कारण
शादी से जुड़े मामलों को छोड़कर, परिवार की समस्याएं पूरे देश में सुसाइड का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरीं हैं, जिससे 41,238 पुरुषों और 15,926 महिलाओं की जान गई. बीमारी दूसरी सबसे बड़ी वजह थी, जिससे 21,608 पुरुषों और 8,991 महिलाओं की मौत हुई. वहीं, जिन मामलों में वजह का पता नहीं चल सका, उनमें 12,467 पुरुषों और 4,791 महिलाओं ने सुसाइड किया. 11,511 पुरुषों और 4,334 महिलाओं ने दूसरे कारणों से सुसाइड किया. 4,536 पुरुषों और 3,986 महिलाओं ने शादी के झगड़ों की वजह से अपनी जिंदगी खत्म की. ड्रग एडिक्शन, बैंकरप्सी, लव अफेयर्स, बेरोजगारी और एग्जाम में फेल होने जैसे दूसरे कारण भी बताए गए, हालांकि इन मामलों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम थी. कुल मिलाकर, रिपोर्ट से पता चलता है कि लगभग हर कैटेगरी में, पुरुषों में सुसाइड के मामले महिलाओं से ज्यादा हैं और फैमिली स्ट्रेस सबसे बड़ा कारण बनकर सामने आया. यह डेटा हमें सोचने पर मजबूर करता है कि बाहर से मजबूत दिखने वाले पुरुष अंदर से कितने परेशान और तनाव में रहते हैं.

शादी के कारण कितने लोगों ने की आत्महत्या
हालांकि शादी से जुड़े सुसाइड के मामले पुरुषों (4,536) में महिलाओं (3,986) की तुलना में थोड़े ज़्यादा थे, लेकिन सब-कारणों पर करीब से नजर डालने पर जेंडर की अलग-अलग कमजोरियां पता चलती हैं. शादी न होने से 1,966 पुरुषों और 1,086 महिलाओं ने मौत को गले लगा लिया. जबकि दहेज से जुड़े झगड़ों में ज्यादातर महिलाओं की जान गई, जिसमें 333 पुरुषों के मुकाबले 1,360 महिलाओं ने सुसाइड किया. इसके अलावा, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स की वजह से 953 पुरुषों और 671 महिलाओं की मौत हुई. तलाक से जुड़े मामलों में 336 पुरुषों और 185 महिलाओं ने सुसाइड किया. शादी के दूसरे झगड़ों की वजह से 948 पुरुषों और 684 महिलाओं ने सुसाइड किया. कुल मिलाकर, शादी न होने के मामलों में पुरुषों का सुसाइड रेट ज्यादा है, जबकि दहेज से जुड़े मामलों में अधिक महिलाओं ने जान दी.

बीमारी के कारण सुसाइड
बीमारी सुसाइड से होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण बनकर सामने आई, जिससे 21,608 पुरुषों और 8,991 महिलाओं की जान चली गई. इस कैटेगरी के ग्राफ रिपोर्ट से पता चलता है कि मेंटल बीमारी और दूसरी लंबी बीमारियां इनमें से ज़्यादातर मौतों के लिए मुख्य वजह थीं. खास तौर पर, मेंटल बीमारी की वजह से 9,970 पुरुषों और 4,328 महिलाओं की मौत हुई, जबकि दूसरी लंबी बीमारियों की वजह से 9,899 पुरुषों और 4,165 महिलाओं की मौत हुई. कैंसर के कारण 962 पुरुषों और 270 महिलाओं की जान गई, जबकि पैरालिसिस की वजह से 691 पुरुषों और 211 महिलाओं ने सुसाइड किया. वहीं, AIDS/STD जैसी बीमारियों के कारण 86 पुरुष और 17 महिलाओं ने आत्महत्या की. रिपोर्ट से पता चलता है कि लगभग हर मामले में, पुरुषों की संख्या महिलाओं से काफी ज्यादा थी.

आत्महत्या का मनोवैज्ञानिक कारण
ज्यादातर मामलों में आत्महत्या करने के पीछे सबसे बड़ा कारण डिप्रेशन होता है. व्यक्ति खुद को समाज और अपने परिवार से कटा हुआ महसूस करता है. उसे लगता है कि उसे कोई नहीं समझता और वह बहुत अकेला है. इसके अलावा कई बार व्यक्ति को लगता है कि वह अपने परिवार पर बोझ बन गया है. वहीं असफल हो जाना भी मानसिक तनाव पैदा करता है. आम तौर पर इंसानों में समय के साथ सब ठीक करने की प्रवृत्ति होती है, लेकिन अक्सर शारीरिक दर्द, ट्रॉमा या पिछली असफलता के कारण व्यक्ति के मन में हताशा अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाती है, जिस कारण उसे जिंदगी खत्म करना ही सबसे सही ऑप्शन लगता है.
डिप्रेशन में व्यक्ति के दिमाग में सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे हॉर्मोन असंतुलित हो जाते हैं. ऐसे में व्यक्ति कुछ भी महसूस नहीं कर पाता. डिप्रेशन में व्यक्ति को कुछ करने का या किसी से बात करने का मन नहीं करता. हर चीज से उनकी रुचि खत्म हो जाती है. व्यक्ति हर चीज के लिए खुद को जिम्मेदार मानने लगता है. डिप्रेशन में अक्सर, इंसान का दिमाग “टनल विजन” में चला जाता है. उन्हें अपनी प्रॉब्लम का सिर्फ एक ही हल दिखता है- मौत. उस समय उनका दिमाग और कुछ सोच ही नहीं पाता. इसके अलावा कभी-कभी, अचानक कोई शॉक (जैसे ब्रेकअप, एग्जाम में फेल होना, या पैसे का बड़ा नुकसान) बिना सोचे-समझे एक्शन लेने पर मजबूर कर सकता है.

‘मर्द को दर्द नहीं होता’- जैसे रूढ़िवादी विचार
भारतीय समाज में मानसिक तनाव और डिप्रेशन को आज भी गंभीर स्थिति नहीं माना जाता है. लोग अक्सर इसे हंसी-मजाक में टाल देते हैं. पीड़ित अंदर ही अंदर घुटता रहता है. वहीं जब बात पुरुषों की आती है, तो यह सोच और भी रूढ़िवादी हो जाती है. बचपन से ही लड़कों को सिखाया जाता है कि ‘लड़के रोते नहीं’ या ‘मजबूत बनो’. इस सोशल कंडीशनिंग की वजह से, पुरुष अपने मन के दर्द, डर या आंसुओं को ‘कमजोरी की निशानी’ मानते हुए बड़े होते हैं और भविष्य में वे किसी समस्या के बारे में खुलकर बात नहीं कर पाते. पुरुष अपनी भावनाओं को जाहिर करने से डरते हैं, यह सोचकर कि समाज उन्हें कमजोर समझेगा. कोर्ट केस, तलाक या घरेलू झगड़ों के दौरान अक्सर पुरुषों की मेंटल हेल्थ को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिससे वे पूरी तरह से अकेला और लाचार महसूस करते हैं.
कुछ लोग तो डिप्रेशन को पागलपन के साथ जोड़ देते हैं, जिससे पता चलता है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आज भी जागरुकता भारी कमी है. मनिपाल यूनिवर्सिटी के रिसर्च के अनुसार, भारत में 10 में से 4 पुरुष कभी भी अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में किसी के बात नहीं करते. अपनी भावनाओं को लगातार अंदर दबाने के कारण वे गंभीर डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं और एक दिन अपनी ही जिंदगी खत्म करने का फैसला ले लेते हैं.
हम क्या कर सकते हैं
समाज की इस स्थिति को बदलने के लिए हमें ‘मर्द बनो’ के बजाय ‘खुलकर बोलो’ वाली सोच को बढ़ावा देना होगा. माता पिता को अपने बच्चे की मानसिक स्थिति को समझने की कोशिश करनी होगी. उनसे खुलकर बात करनी होगी. वहीं सरकार को लोगों को जागरुक करने के लिए नीतियां बनानी चाहिए. स्कूलों और कॉलेजों में एंटी-डिप्रेशन सेल बनाने चाहिए. समाज को यह समझाना बहुत जरूरी है कि डिप्रेशन पागलपन नहीं, एक गंभीर बीमारी है. वहीं पुरुषों को यह समझाना चाहिए कि मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदार और साहसिक कदम है. कुल मिलाकर, शिक्षा और जागरुकता की मदद से ही हम जिंदगियां बचा सकते हैं.
अगर आपका कोई जानने वाला परेशान है या डिप्रेशन में हो, तो सबसे पहले उसे इमोशनली सपोर्ट करें. उनका ख्याल रखें और नेशनल 24/7 टोल-फ्री मेंटल हेल्थ रिहैबिलिटेशन हेल्पलाइन KIRAN को 1800-599-0019 पर या टेली-मानस 1800-891-4416 पर कॉल करें.
News Source: NCRB
