Home अंतरराष्ट्रीय दुनिया में वह भयानक युद्ध जिसको लड़कर अमेरिका बुरा फंसा, आज भी सुनकर लोग हो जाते हैं हैरान; ऐसा हुआ था हाल

दुनिया में वह भयानक युद्ध जिसको लड़कर अमेरिका बुरा फंसा, आज भी सुनकर लोग हो जाते हैं हैरान; ऐसा हुआ था हाल

by Sachin Kumar 30 May 2026, 8:23 PM IST
30 May 2026, 8:23 PM IST
American History Armed Conflict

Armed Conflict : द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन गया और अपनी सेना को भी ताकतवर मानने लगा. हालांकि, दुनिया में अभी भी उसके सामने सोवियत संघ चुनौती बनकर खड़ा था, जो मार्क्सवाद विचारधारा को मानता और अपनी विचारधारा फैलाने में लगा हुआ था. यही वजह रही कि दोनों देशों के बीच में शीत युद्ध छिड़ गया और 1991 में सोवियत संघ का विघटन होने के साथ ही कोल्ड वार खत्म हो गया. इसके बाद दुनिया में सिर्फ एक ही महाशक्ति बची थी और वह थी अमेरिका. वह जब चाहें किसी भी देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगा देता या फिर किसी भी सरकार का तख्ता पलट कर देता. अब उसको कोई रोकने वाला नहीं था. लगातार मजबूत सेना और आर्थिक क्षमता के बदौलत उसकी एजेंसियों भी दूसरे देशों में घुसपैठ करने काम करने लगीं. हालांकि, दुनिया में उसने ऐसे कई युद्ध में लड़े, जिसमें अमेरिका को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा.

उदाहरण के तौर पर वियतनाम युद्ध में अमेरिका ने जंग छेड़ दी और उसे लगा कि वह इस युद्ध को आसानी से जीत जाएगा. लेकिन वियतनामियों ने गुरिल्ला युद्ध की तकनीक से अमेरिका को दांतो तले चने चबवाने का काम किया. इसी बीच अमेरिका लगातार देश की जनता को प्रोपैगेंडा के माध्यम यह विश्वास दिलाने में लगा हुआ था कि वह युद्ध जीत रहे हैं और उनकी सेना आगे बढ़ रही है. हालांकि, जब खाद्य पदार्थ और साजो समान लाने वाले प्लेन में अमेरिकी सैनिकों की बॉडी भर-भरकर जाने लगी तो देश की जनता ने सरकार के खिलाफ आंदोलन करना शुरू कर दिया. इसके बाद मजबूर होकर अमेरिकी सरकार को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी. अमेरिका के इस फैसले के बाद दुनिया भर के अखबारों ने कहा कि यह उसकी सबसे बड़ी सैन्य हार है और अमेरिका आज तक इस हार को भुला नहीं पाया है. ऐसे ही उसने कई युद्ध में अपने सैनिक भेजे, लेकिन अंत में थक हारकर उसको अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी.

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1975 में हुई थी वियतनाम की जीत

दुनिया के सबसे भयंकर युद्धों में से एक वियतनाम वार ने विश्व को हिलाकर रख दिया था. यह भीषण युद्ध 1955 से शुरू होकर 1975 तक चला था. इस युद्ध में एक तरफ साम्यवादी विचारधारा का समर्थक उत्तरी वियतनाम था और दूसरी तरफ अमेरिका का समर्थन करने वाला दक्षिण वियतनाम ने खड़ा था. 20 साल तक चले लंबे युद्ध में अमेरिका को बुरी शिकस्त झेलनी पड़ी थी और उसके अपनी सेना अंतिम में बुलानी पड़ी. मामला यह है कि यह शीत युद्ध का भी दौर था और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद फ्रांस दिवालिया हो गया था. इसकी वजह से फ्रांस इंडोचाइना में अपना उपनिवेश स्थापित नहीं कर सका और एक शांति समझौते के तहत फ्रांस ने वियतनाम को दो हिस्सों (उत्तर और दक्षिण) में बांट दिया. इस दौरान उत्तर के हिस्से पर साम्यवादी और दक्षिण में अमेरिकी समर्थन सरकार ने अपनी सत्ता काबिज कर ली.

हालांकि, फ्रांसीसियों की हार के बाद भी देश में संघर्ष समाप्त नहीं हुआ. पूरा वियतनाम और आसपास के देशों में साम्यवाद पूरी तरह न फैले जाए इस डर की वजह से युद्ध जारी रहा. इस युद्ध में अमेरिकी हेलीकॉप्टर ने 3 करोड़ 60 लाख उड़ानें भरीं. उसने दुश्मन के इलाकों में अपने पर्चे बिखेरने का काम किया और वहां से घायल सैनिकों को उठाकर इलाज के लिए अस्पताल भेजने का काम किया. इस दौरान अमेरिका ने वियतनाम में 5 लाख से ज्यादा सैनिक उतार दिए और इस युद्ध का खर्च 686 अरब डॉलर बताया. अमेरिका ने द्वितीय युद्ध में लड़ाई के मुकाबले वियतनाम वार में चार गुना ज्यादा खर्च किया था. लगातार जारी जंग के बीच अमेरिकी प्लेन सैनिकों के ताबूतों से भरकर वियतनाम से जा रहे थे और इस युद्ध में अमेरिका के करीब 58,000 सैनिक मारे गए. उत्तर वियतनामी सैनिकों की खास बात यह थी कि भले ही उसका भारी नुकसान हुआ था लेकिन इसके बाद भी वह हार नहीं मान रहे थे. वह लगातार उस वक्त अत्याधुनिक हथियारों से लोहा ले रहे थे और अपने गुरिल्ला तकनीकी से अमेरिकी सैनिकों को चकमा देने के साथ मौत के घाट उतार दे रहे थे. साथ ही यह युद्ध इतना क्रूर था कि अमेरिका ने कई भयानक हथियारों का इस्तेमाल किया और जंगलों को पूरी तरह नष्ट करने का काम किया. वहीं, दक्षिण वियतनाम की तरफ से लड़ने वाले सैनिकों से कई गुना ज्यादा वामपंथी गुट के लिए लड़ने वाले लोग समर्पित थे. अंत में 1973 के पेरिस समझौते के तहत अमेरिका ने अपने अधिकांश सैनिकों बुला लिया. इसके बाद 30 अप्रैल 1975 को उत्तरी वियतनाम की सेना ने दक्षिण वियतनाम की राजधानी साइगोन पर कब्जा कर लिया और फिर एकीकृत साम्यवादी वियतनाम का उदय हुआ.

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कोरियाई युद्ध में कुछ हासिल नहीं कर सका अमेरिका

1950 से लेकर 1953 तक चले कोरियाई युद्ध दुनिया के सबसे बड़े संघर्षों में से एक था. एक तरफ जहां सोवियत संघ/चीन समर्थित उत्तर कोरिया था और दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र/अमेरिका समर्थित दक्षिण कोरिया खड़ा था. अमेरिका ने दक्षिण कोरिया में साम्यवाद को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले अमेरिकी सैनिकों ने हिस्सा लिया. यह युद्ध दोनों तरफ से 10 लाख सैनिकों के हताहत होने के बाद जुलाई 1953 में युद्ध समाप्त हो गया. इस युद्ध में अमेरिका के करीब 54000 सैनिक मारे गए थे और 92 हजार से ज्यादा जवान घायल हो गए थे. इतिहासकारों का मानना है कि अमेरिका इस युद्ध में अपने तय हुए लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाया था और उसको भारी संख्या अपने में सैनिकों की जान को गंवाना पड़ा. अमेरिका का इस युद्ध सफलता नहीं होने का कारण यह था कि जब अमेरिकी सेनाएं उत्तर कोरिया की तरफ आगे बढ़ रही थी उस वक्त लाखों चीनी सैनिकों ने युद्ध में प्रवेश कर अमेरिकी सैनिकों को पीछे धकेल दिया. हालांकि, अमेरिका और सोवियत संघ-चीन किसी युद्ध में सीधे नहीं लड़ना चाहता था. इसलिए उन्होंने सीमित सैन्य क्षमता के साथ युद्ध को लड़ना जारी रखा.

मामला यह था कि द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की बुरी हार के बाद उसने कोरिया के ऊपर से अपना औपनिवेशिक शासन हटा लिया था. इसके बाद मार्क्सवादी क्रांतिकारी शामिल थे जिन्होंने मंचूरिया और चीन में चीनी-प्रभुत्व वाली गुरिल्ला सेनाओं के साथ मिलकर जापानियों से लड़ाई लड़ी थी. इन सैनिकों में एक सफल गुरिल्ला नेता था जिसका नाम थाकिम इल-सुंग, जिन्होंने रूस प्रशिक्षण प्राप्त किया और सोवियत सेना में मेजर के पद पर तैनात हुए. दूसरा कोरियाई राष्ट्रवादी आंदोलन, जो कम क्रांतिकारी नहीं था, यूरोप, जापान और अमेरिका के विज्ञान, शिक्षा और औद्योगीकरण के सर्वश्रेष्ठ पहलुओं से प्रेरणा लेता था. ये अतिराष्ट्रवादी प्रतिद्वंद्वी गुटों में विभाजित थे, जिनमें से एक गुट का केंद्र बिंदु था. संयुक्त राज्य अमेरिका में शिक्षा प्राप्त की और एक समय में निर्वासित कोरियाई अंतरिम सरकार के अध्यक्ष थे.

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US विदेश नीति की बड़ी विफलताओं

बे ऑफ पिग्स आक्रमण ने अमेरिका विदेश नीति को सबसे बड़ा धक्का दिया था. अप्रैल 1961 में CIA के समर्थित और ट्रेन्ड 1,500 क्यूबा के निर्वासित लड़ाकों ने फिदेल कास्त्रो की सरकार का सत्ता पलटने के लिए क्यूबा के तट पर हमला किया. यह अभियान पूरी तरह विफल रहा और क्यूबा के सैनिकों ने तीन दिन तक चले अभियान में सभी निर्वासित लड़कों को बंदी बना लिया. वहीं, बे ऑफ पिग्स में हार मिलने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी बहुत गुस्से में आ गए थे. उन्होंने कहा कि मैंने उस वक्त जिन भी लोगों से बात की थी उन्होंने मुझसे यही कहा था कि यह योजना सफल हो जाएगी. इसके बाद उनके समर्थकों ने इस घटना को लेकर खूब आलोचना की. साथ ही कैनेडी ने इसके लिए CIA को दोषी ठहराया था. इस हमले को विफल करने के बाद क्यूबा पर फिदेल कास्तो की पकड़ हो गई और हवाना, मास्को के काफी करीब आ गया. वहीं, इस घटना का कारण अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव बढ़ गया. इसके बाद साल 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट तक मामला पहुंच गया. बता दें कि इस योजना की शुरुआत राष्ट्रपति ड्वाइट डेविड आइज़नहावर के समय ही हो गई थी और इसको बाद में राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने मंजूरी दे दी.

इस योजना के तबत क्यूबा के निर्वासितों को प्रशिक्षित कर क्यूबा में उतारना था और विद्रोह करवाकर कास्त्रो की सरकार को गिरवाने का षड्यंत्र रचा गया था. हालांकि, कास्त्रो की खुफिया एजेंसियों को इसके बारे में जानकारी मिल गई और उन्होंने अमेरिका की नीति को विफल कर दिया. इसके बाद आक्रमणकारियों को क्यूबा की जेल में डाल दिया गया. बाद में उन कैदियों को छुड़वाने के लिए अमेरिका ने क्यूबा को भारी मात्रा में दवाइयां और खाद्य सामग्री देनी पड़ी.

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अफगानिस्तान से अमेरिका को भागना पड़ा

अमेरिकी इतिहास का सबसे लंबा संघर्ष अफ़गानिस्तान युद्ध था, जो 2001 से लेकर 2021 तक चला था. 9/11 हमला होने के बाद अल-कायदा और तालिबान करने के लिए अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान में एंट्री होती है. 11 सितंबर, 2011 को अल-कायदा ने अमेरिका में भीषण हमला किया था और इस हमले से पूरी दुनिया हिल गई थी. इसके बाद इसका मुख्य दोषी ओसामा बिन लादेन को नहीं सौंपने के कारण अक्टूबर 2001 में अमेरिका ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया. फिर अमेरिका ने कुछ ही साल में अफगान सरकार का सत्ता से बेदखल कर दिया. वहां पर एक नई लोकतांत्रिक सरकार को स्थापित किया. साथ ही अफगानिस्तान के दुर्गम पहाड़ और गुफाओं में छिपे तालिबानियों को हराना इतना आसान नहीं था.

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इसी बीच अमेरिकी समर्थित अफगान सरकार पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता के आरोप लगने लगे. इसी बीच जनता में भी अविश्वास पैदा होने लगा. इसी बीच तालिबान ने जनता का भरोसा जीतने के साथ गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से लंबी लड़ाई की योजना बनाई. वह बीच-बीच में बारूदी सुरंगों और आत्मघाती हमलों से अमेरिकी और उनके सहयोगी देशों की सेना को भारी नुकसान पहुंचाते रहे. इन 20 वर्षों की जंग में अमेरिका ने खरबों डॉलर खर्च कर दिए और 2400 सैनिकों की जान भी गंवा दी. 20 साल के बाद अमेरिकी जनता और सरकार का इस अंतहीन युद्ध से मोहभंग हो गया. इसी बीच 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच में ‘दोहा समझौता’ हुआ. इसके तहत अमेरिका सेना की वापसी हुई. वहीं, 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने कड़ा विरोध दर्ज करते हुए राजधानी काबुल पर हमला कर दिया और फिर 30 अगस्त तक अफगानिस्तान में मौजूद अंतिम सरकार ने सत्ता से हटने का फैसला कर लिया. इसके बाद दो दशक से जारी जंग का अंत हो गया और तालिबान फिर से सत्ता पर काबिज हो गया. वहीं, तालिबान की वापसी के बाद विशेषज्ञों ने इसको अमेरिकी कूटनीति की हार बताया.

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