Gujarat High Court: गुजरात हाईकोर्ट ने पितृत्व विवाद और DNA जांच से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. न्यायमूर्ति जे.सी दोशी की एकल पीठ ने वडोदरा फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी बेटी की पितृत्व जांच के लिए डीएनए टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया था. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को डीएनए टेस्ट के लिए सामान्य प्रक्रिया के रूप में मजबूर नहीं किया जा सकता और ऐसा आदेश देते समय निजता के अधिकार, परिस्थितियों तथा न्यायिक सिद्धांतों का संतुलन आवश्यक है.
भरण-पोषण से जुड़ा है मामला
दरअसल, यह मामला वर्ष 1994 में दायर एक भरण-पोषण यानी मेंटेनेंस के मुकदमे से जुड़ा है. महिला ने खुद और अपनी उस समय मात्र 15 महीने की बेटी के लिए हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम के तहत गुजारा भत्ता मांगा था. बाद में यह मामला फैमिली कोर्ट में स्थानांतरित किया गया. मुकदमे के दौरान महिला ने एक आवेदन देकर पति का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की, ताकि यह साबित किया जा सके कि बेटी उसी की संतान है. फैमिली कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करते हुए डीएनए जांच कराने का आदेश दिया था. फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि संबंधित व्यक्ति निर्धारित तारीख पर प्रयोगशाला में पहुंचकर रक्त का नमूना देगा और यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसके खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगाया जाएगा. इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.
बेटी 32 साल की, जांच अनुचितः याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि जिस बेटी के पितृत्व की जांच कराई जा रही है, वह अब 32 वर्ष की हो चुकी है, शादीशुदा है और अमेरिका में रह रही है. हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम के अनुसार बालिग और विवाहित बेटी अब अपने पिता से भरण-पोषण की हकदार नहीं है. ऐसे में पितृत्व निर्धारित कराने का उद्देश्य ही समाप्त हो चुका है. साथ ही यह भी कहा गया कि पहले विवाह साबित होना चाहिए, उसके बाद ही पितृत्व का सवाल उठ सकता है. याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि वह 78 वर्ष का है और गंभीर बीमारियों से पीड़ित है. उसकी एक टांग काटनी पड़ी है तथा उसकी स्वास्थ्य बेहद खराब है. ऐसे में डीएनए टेस्ट कराने का आदेश अनुचित और अमानवीय होगा. दूसरी ओर महिला की ओर से कहा गया कि डीएनए टेस्ट वैज्ञानिक रूप से सबसे सटीक तरीका है और इससे सच्चाई सामने आ जाएगी.
टेस्ट का आदेश केवल विशेष परिस्थितियों में ही
उसका तर्क था कि यदि जरूरत हो तो निजी लैब के बजाय सरकारी अस्पताल में भी नमूने लिए जा सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक तकनीक में खून के नमूने की आवश्यकता भी नहीं होती, बाल के नमूने से भी डीएनए जांच संभव है. हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि जब डीएनए टेस्ट का आदेश दिया गया था, तब बेटी नाबालिग थी और उसकी सहमति नहीं ली गई थी. अब वह बालिग है, विवाहित है और उसने स्वयं अदालत में आकर अपने पितृत्व की जांच की मांग भी नहीं की. ऐसे में उसकी सहमति के बिना डीएनए जांच का आदेश उसके निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि डीएनए टेस्ट का आदेश केवल विशेष परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है. इसे नियमित प्रक्रिया या रूटीन आदेश की तरह नहीं दिया जा सकता.
अदालत को यह भी देखना होगा कि क्या बिना डीएनए जांच के न्याय करना संभव नहीं है और क्या इस आदेश से किसी व्यक्ति की निजता या सामाजिक प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि महिला ने पहले अपने विवाह को साबित करने के लिए कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया और सीधे पितृत्व साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट की मांग कर दी.
फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द
इसके अलावा जिस मुकदमे का निपटारा 1998 तक हो जाना चाहिए था, उसमें 2010 में डीएनए जांच की मांग करना भी उचित नहीं माना जा सकता. अब जबकि बेटी बालिग और विवाहित है तथा भरण-पोषण का दावा भी प्रभावहीन हो चुका है, ऐसे में डीएनए जांच की आवश्यकता नहीं रह जाती. इन्हीं सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का 11 मई 2012 का आदेश रद्द कर दिया और डीएनए टेस्ट की मांग वाली अर्जी भी खारिज कर दी. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष या बेटी के वास्तविक पितृत्व पर कोई टिप्पणी नहीं की है. फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह मूल भरण-पोषण के मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ाकर उसका शीघ्र निपटारा करे.
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