Home Lifestyle स्वाद का प्रमोशन! कभी खेत की पगडंडियों पर खाते थे, आज रेस्टोरेंट्स में इन 6 डिशेज के लिए भारी बिल चुकाते हैं

स्वाद का प्रमोशन! कभी खेत की पगडंडियों पर खाते थे, आज रेस्टोरेंट्स में इन 6 डिशेज के लिए भारी बिल चुकाते हैं

by Preeti Pal
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स्वाद का प्रमोशन! कभी खेत की पगडंडियों पर खाते थे, आज रेस्टोरेंट्स में इन 5 डिश को खाने के लिए भारी बिल चुकाते हैं

Premium Indian Dishes: कुछ पकवानों का सफर हमें सिखाता है कि स्वाद सिर्फ महंगी चीज़ों में नहीं, बल्कि ट्रेडिशन और संस्कृति में छिपा होता है. यही वजह है कि आज आपके लिए उन इंडियन आम डिशेज की लिस्ट लाए हैं, जो अब लग्ज़री बन चुकी हैं.

16 February, 2026

जिन डिशेज को हम कभी ‘गरीबों का खाना’ कहकर नजरअंदाज करते थे, आज वही हमारी सेहत और विरासत का सबसे अनमोल हिस्सा बन चुकी हैं. वैसे भी, भारतीय खाने का इतिहास सिर्फ स्वाद की कहानी नहीं है, बल्कि ये हमारे समाज की बदलती सोच का आईना भी है. आज हम जिन पकवानों को बड़े-बड़े रेस्टोरेंट्स में महंगे दामों पर ऑर्डर करते हैं, उनमें से कई कभी मजबूरी और किल्लत के दौर में पैदा हुई थीं. ये उन किसानों और मजदूरों का खाना थीं, जिन्होंने सिंपल चीजों को अपनी मेहनत से एक प्रोपर मील में बदल दिया. टाइम बदला, लोगों का नजरिया बदला और आज वही ‘गरीबों का खाना’ दुनिया भर के शेफ्स की पहली पसंद बन चुका है. आज उन्हीं डिशेज पर एक नजर डालते हैं, जिन्होंने खेतों से निकलकर आलीशान डाइनिंग टेबल तक का सफर तय किया है.

लिट्टी चोखा

कभी बिहार और ईस्ट यूपी के ग्रामीण इलाकों की पहचान रहा लिट्टी चोखा आज एक ब्रांड बन चुका है. सत्तू से भरी गेहूं की आटे की गोलियों को उपलों की आग में भूनकर तैयार करना जितना सस्ता था, उतना ही पेट भरने वाला भी. इसे किसानों और ट्रेवलर्स के लिए सबसे बढ़िया खाना माना जाता था क्योंकि ये जल्दी खराब नहीं होता था, मगर आज कहानी अलग है. लिट्टी चोखा अब सिर्फ देहाती खाना नहीं रहा. बड़े शहरों के कैफे और हेरिटेज रेस्टोरेंट्स में इसे शुद्ध देसी घी में डुबोकर और शानदार तरीके से सजाकर परोसा जाता है. यानी जिसे कभी मजबूरी का खाना कहा जाता था, आज उसे प्राइड की तरह सेलिब्रेट किया जा रहा है.

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खिचड़ी

खिचड़ी का नाम सुनते ही अक्सर लोगों को बीमार होने वाली फीलिंग आती थी. दाल और चावल का ये कॉम्बिनेशन उन दिनों का सहारा था जब घर में राशन कम होता था या जब पेट को आराम की जरूरत होती थी. इसे सबसे सस्ता और सिंपल खाना माना जाता था. हैरानी की बात ये है कि आज के वेलनेस कल्चर ने खिचड़ी को सुपरफूड का दर्जा दे दिया है. लग्जरी रेस्टोरेंट्स अब इसमें ट्रफल ऑयल, विदेशी सब्जियां और महंगे घी का तड़का लगाकर इसे प्रीमियम डिश के तौर पर बेच रहे हैं.

रागी बॉल्स

कर्नाटक और साउथ इंडिया के कई हिस्सों में रागी बॉल्स मजदूरों का खाना हुआ करता था. रागी सस्ता भी था और इसे खाने के बाद लंबे टाइम तक भूख नहीं लगती थी, जो मजदूरी करने वालों के लिए परफेक्ट था. अब जैसे-जैसे लोगों में मोटे अनाज यानी मिलेट्स के लिए अवेयरनेस बढ़ी, रागी रातों-रात एक स्टार बन गया. आज इसे कैल्शियम और फाइबर का खजाना माना जाता है. शहरों के हेल्थ कैफे अब रागी को एक प्रीमियम ऑप्शन के रूप में पेश कर रहे हैं.

सरसों का साग और मक्के की रोटी

सर्दियों के मौसम में सरसों का साग और मक्की की रोटी एक रॉयल मील माना जाता है, लेकिन इसकी शुरुआत पंजाब के खेतों से हुई थी. किसान अपने पास मौजूद सरसों की पत्तियों और मक्के के आटे का इस्तेमाल करते थे क्योंकि ये सस्ते और सर्दियों में शरीर को गर्मी देने वाले थे. आज इस डिश को ‘हेरिटेज कुजीन’ कहा जाता है. रेस्टोरेंट्स इसे घंटों धीमी आंच पर पकाने और ऊपर से ढेर सारा सफेद मक्खन डालने के ट्रेडिशनल तरीकों का प्रमोशन करते हैं.

पखल भात

ओडिशा में पखल भात यानी पानी में भिगोया हुआ फर्मेंटेड चावल, गर्मियों में मजदूरों को ठंडक देने का सबसे आसान तरीका था. ये रात के बचे हुए चावलों को इस्तेमाल करने का एक जरिया भी था ताकि खाना बर्बाद न हो. आज के साइंटिस्ट इसे प्रोबायोटिक फूड बताते हैं. बड़े-बड़े शेफ अब पखल भात को कई तरह के साइड डिशेज के साथ पेश कर रहे हैं, जिससे ये सिंपल सा दिखने वाला खाना अब एक न्यूट्रिशनल डिश बन गया है.

कांजी वड़ा

नॉर्थ इंडिया में फेमस कांजी वड़ा असल में चीजों को लंबे टाइम तक सेफ रखने की तकनीक से निकला था. राई के पानी में दाल के वड़ों को फर्मेंट होने के लिए छोड़ दिया जाता था, जिससे बिना फ्रिज के भी ये खराब नहीं होता था और इसका स्वाद भी बढ़ जाता था. आज जब दुनिया भर में फर्मेंटेड फूड का बोलबाला है, तो कांजी वड़ा की मांग भी बढ़ गई है.

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