Delhi Riots 2020 : दिल्ली दंगे 2020 के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कड़कड़डूमा कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी है. एडिशनल सेशंस जज समीर बाजपेयी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दोनों आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया. खालिद और इमाम ने यह कहते हुए याचिका दायर की थी कि बिना किसी ट्रायल शुरू हुए उन्हें लगातार जेल में रखना आजादी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है.
ट्रायल कोर्ट का किया रुख
दोनों आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज मामले में नियमित जमानत के लिए ट्रायल कोर्ट का रुख किया था. खालिद की याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि भले ही उनकी पिछली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी, लेकिन बाद में हुई न्यायिक घटनाओं से हालात में बदलाव आया है. उन्होंने मई में एक अन्य मामले में अदालत की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि UAPA मामले में जमानत का नियम भी है. ये नई अर्जी तब दायर की गई है जब सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी को यूएपीए के तहत दर्ज मामले में उन्हें जमानत देने से मना कर दिया था.
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नहीं हुआ 6 महीने बाद भी कोई डेवलंपमेंट
वहीं, अपनी अर्जी दाखिल करते हुए इमाम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जमानत देने से मना करने के छह महीने बाद भी कार्रवाई में कोई खास डेवलपमेंट नहीं हुआ और लगभग 6 साल से कस्टडी में हैं. साथ ही काफी लंबे समय से जेल में होने के बाद भी अभी तक आरोपियों के खिलाफ कोई चार्ज फ्रेम नहीं हुआ है. इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का जिक्र किया गया जो मई 2018 में आतंकवाद से जुड़े एक मामले में दिया गया था. आरोपियों को जमानत देते हुए दो जजों की बेंच ने 5 जनवरी को के फैसले की आलोचना की थी. साथ ही इस बात पर भी जोर दिया गया था कि आतंकवाद-रोधी कानूनों का इस्तेमाल अनिश्चित काल तक हिरासत में रखने के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
पिछले केस का दिया हवाला
दूसरी तरफ खालिद ने दलील दी कि बाद में हुई न्यायिक घटनाओं से हालात में बदलाव आया है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी पिछली अर्जी खारिज किए जाने के बावजूद मौजूदा जमानत याचिका सुनवाई के लायक है. इसके अलावा याचिका में लंबे समय तक जेल में रखे जाने से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी हवाला दिया गया, जिसमें ‘वर्नन गोंसाल्वेस बनाम महाराष्ट्र राज्य’ शामिल हैं. ऐसे फैसलों का आधार का तर्क तब दिया जाता है जब UAPA के तहत जमानत पर लगी कानूनी पाबंदियां संवैधानिक सुरक्षा उपायों से ऊपर नहीं हो सकती है.
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