Hunger Strikes of India: मजाक में बनी कॉकरोच जनता पार्टी इस समय सोशल मीडिया पर छाई हुई है और राजनीतिक चर्चा में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गई है. कॉकरोच जनता पार्टी जंतर मंतर पर एक महीने से ज्यादा समय से विरोध प्रदर्शन कर रही है. भारत के प्रसिद्ध इंजीनियर, इनोवेटर और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अब इस प्रदर्शन का केंद्र बन गए हैं, क्योंकि वे बीते 20 दिनों से जंतर मंतर पर भूख हड़ताल कर रहे हैं. वे केवल पानी और अपने हौसले के सहारे विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. लोग उनकी तुलना समाजसेवी अन्ना हजारे से कर रहे हैं. कुछ सीजेपी समर्थकों ने कहा कि सोनम वांगचुक गांधी की तरह भूख हड़ताल को अपना हथियार बनाकर सरकार से लड़ रहे हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल ने भी अपने समय में भूख हड़ताल की थी और उस समय तत्कालीन इंदिरा गांधी ने खुद उनका अनशन तुड़वाया था.
भारत के इतिहास में भूख हड़ताल हमेशा शांतिपूर्ण विरोध का एक मजबूत हथियार रही है, कभी-कभी इन भूख हड़तालों ने सरकारों को अपने फैसले बदलने पर मजबूर किया है, जबकि कभी-कभी लंबे संघर्ष के बाद भी मांगें पूरी नहीं हुई. इस खबर में आप जानेंगे कि देश में कब-कब बड़ी भूख हड़तालें हुई हैं और कब सरकार को उनके सामने झुकना पड़ा है.

सबसे पहले किसने की थी भूख हड़ताल
भारत में अनशन को लोकतांत्रिक हथियार बनाने का श्रेय महात्मा गांधी को जाता है. उन्होंने भूख हड़ताल को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल कर ब्रिटिश शासन को कई बार झुकाया था. आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी ने एक-दो नहीं, बल्कि 18 बार भूख हड़ताल की थी. उन्होंने मजदूरों के अधिकार, सांप्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याय और आजादी के आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर कई बार उपवास किया. इनमें से 1918 में अहमदाबाद में पहली मिल हड़ताल, 1932 में अछूतों की आजादी के लिए यरवदा जेल में आमरण अनशन और 1948 में बंटवारे के दंगों को रोकने के लिए उनका आखिरी अनशन सबसे प्रमुख थे. इसके बाद कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और नेताओं ने सरकार से अपनी मांगे मनवाने के लिए इसी हथियार का इस्तेमाल किया.
भगत सिंह ने 116 दिनों तक नहीं खाया था खाना
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक और बड़ी भूख हड़ताल 1929 में हुई, जब महान क्रांतिकारियों भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और जतिन दास ने लाहौर जेल में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किया. उनकी मांग थी कि भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ ब्रिटिश कैदियों जैसा ही सम्मान किया जाए. उन्होंने बेहतर खाना, साफ कपड़े, शिक्षा तक पहुंच और इंसानियत के साथ बर्ताव की मांग की. भगत सिंह रिकॉर्ड 116 दिनों तक खाना नहीं खाया. आखिरकार, 5 अक्टूबर, 1929 को, उन्होंने अपने पिता और कांग्रेस नेताओं के कहने पर अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी.
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आजादी के बाद हुए आमरण अनशन
पोट्टी श्रीरामुलु (1952)
पोट्टी श्रीरामुलु को भारतीय इतिहास के सबसे मशहूर भूख हड़ताल करने वालों में से एक माना जाता है. उन्होंने तेलुगु बोलने वाले लोगों के लिए अलग आंध्र राज्य की मांग को लेकर 19 अक्टूबर, 1952 को आमरण अनशन शुरू किया था. 56 दिन बाद 15 दिसंबर, 1952 को उनकी मौत हो गई. इससे एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ और केंद्र सरकार ने अलग आंध्र राज्य बनाने का ऐलान किया.
मास्टर तारा सिंह (1961)
शिरोमणि अकाली दल के नेता मास्टर तारा सिंह ने पंजाबी बोलने वाले राज्य की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की थी. उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दखल के बाद उन्होंने 48 दिनों के बाद अपना अनशन खत्म कर दिया था. उनके ‘पंजाबी सूबा आंदोलन’ की वजह से 1 नवंबर, 1966 को पंजाब का पुनर्गठन हुआ.
संत फतेह सिंह (1966)
संत फतेह सिंह ने चंडीगढ़ को नए बने पंजाब में शामिल करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की थी. उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दखल के बाद उन्होंने 10 दिनों के बाद अपना अनशन खत्म कर दिया था. हालांकि, चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा की जॉइंट राजधानी बना हुआ है.
के. चंद्रशेखर राव (2009)
तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (KCR) ने 29 नवंबर, 2009 को अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया था. सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, लेकिन उन्होंने जेल में भी अपना अनशन जारी रखा. उनकी बिगड़ती सेहत और बढ़ते पब्लिक प्रेशर के बाद, केंद्र सरकार ने तेलंगाना बनाने की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की. इसके बाद, उन्होंने 11 दिन बाद अपना अनशन खत्म कर दिया.
इरोम शर्मिला (2000-2016)
मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला को मणिपुर की आयरन लेडी के नाम से जाना जाता है. उन्होंने नवंबर 2000 में आर्म्ड फोर्सेज (स्पेशल पावर्स) एक्ट (AFSPA) को हटाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की थी. यह विरोध असम राइफल्स द्वारा 10 आम लोगों की हत्या के बाद शुरू हुआ था. उन्होंने 16 साल तक लंबी भूख हड़ताल की और उन्हें जबरदस्ती नाक की सिरिंज से खाना दिया गया. 9 अगस्त 2016 को उन्होंने अपना अनशन खत्म कर दिया और चुनावी राजनीति के जरिए अपना संघर्ष जारी रखने का फैसला किया. AFSPA को पूरी तरह से खत्म करने की उनकी मांग पूरी नहीं हुई.
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अन्ना हजारे (2011)
अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल 2011 को भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया. इस आंदोलन को पूरे देश में बहुत सपोर्ट मिला. बढ़ते पब्लिक प्रेशर के बाद, केंद्र सरकार ने सिविल सोसाइटी और सरकारी प्रतिनिधियों की एक जॉइंट ड्राफ्टिंग कमेटी बनाने का ऐलान किया. इसके बाद उन्होंने 11 दिन बाद अपना अनशन खत्म कर दिया. इस आंदोलन को मॉडर्न इंडिया के सबसे असरदार एंटी-करप्शन आंदोलनों में से एक माना जाता है.

स्वामी निगमानंद सरस्वती और प्रोफेसल जीडी अग्रवाल
स्वामी निगमानंद सरस्वती ने 19 फरवरी 2011 को हरिद्वार में गंगा किनारे गैर-कानूनी माइनिंग के विरोध में भूख हड़ताल शुरू की. उनका अनशन 115 दिनों तक चला. 13 जून, 2011 को उनकी मौत हो गई. उनके आंदोलन को पर्यावरण बचाने से जुड़े सबसे मशहूर अनशन में से एक माना जाता है. पर्यावरणविद और प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने भी गंगा नदी के संरक्षण के लिए अक्तूबर 2018 में आमरण अनशन किया था. 111 दिनों के ऐतिहासिक भूख हड़ताल के बाद 11 अक्तूबर, 2018 को उनका निधन हो गया.
मेधा पाटकर (2019)
अगस्त 2019 में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर और छह अन्य कार्यकर्ताओं ने मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की. उन्होंने सरदार सरोवर डैम से प्रभावित गांवों के पुनर्वास और मुआवजे की मांग की थी. मध्य प्रदेश सरकार से भरोसा मिलने के बाद उन्होंने नौवें दिन अनशन खत्म कर दिया.
मनोज जरांगे पाटिल (2023-24)
महाराष्ट्र के नेता मनोज जरांगे पाटिल ने मराठा रिजर्वेशन की मांग को लेकर 29 अगस्त, 2023 को आमरण अनशन शुरू किया. यह आंदोलन पूरे महाराष्ट्र में फैल गया. उन्होंने जनवरी 2024 में अपनी भूख हड़ताल फिर से शुरू की. सरकार के यह भरोसा देने के बाद कि योग्य मराठों को कुनबी सर्टिफिकेट दिए जाएंगे, उन्होंने अपना अनशन खत्म कर दिया. मनोज जरांगे समय-समय फिर से अनशन पर बैठने की बात कहते हैं.
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जगजीत सिंह दल्लेवाल (2024-25)
किसान नेता जगजीत सिंह दल्लेवाल ने सभी फसलों के लिए MSP की कानूनी गारंटी की मांग को लेकर 26 नवंबर, 2024 को आमरण अनशन शुरू किया था. लगभग 123 दिनों के बाद 28 मार्च, 2025 को उन्होंने पानी पीकर अपना अनशन तोड़ा और बाद में एक किसान महापंचायत में आंदोलन खत्म करने का ऐलान किया. यह फैसला केंद्र सरकार के साथ बातचीत आगे बढ़ने और केंद्रीय मंत्रियों की अपील के बाद लिया गया.
प्रधानमंत्री ने तुड़वाया था सोनम वांग्याल का अनशन

सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांगयाल ने भी लद्दाख के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल किया था. उन्होंने 1984 में लद्दाख को शेड्यूल्ड ट्राइब (ST) का दर्जा दिलाने के लिए भूख हड़ताल की जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनका अनशन तुड़वाने के लिए खुद लेह आईं. वह सोनम वांग्याल से मिलीं और उन्हें अपना अनशन खत्म करने के लिए अपने हाथों से जूस पिलाया. उन्होंने उन्हें लद्दाख को ST का दर्जा देने का भी भरोसा दिया. इस घटना को लद्दाख के इतिहास में उस पल के तौर पर याद किया जाता है जब केंद्र सरकार आंदोलन के आगे झुकती दिखी. हालांकि, लद्दाख को तुरंत ST का दर्जा नहीं मिला. इंदिरा गांधी के भरोसे के बावजूद, इसे लागू होने में पांच से छह साल लग गए. आखिरकार 1989 में लद्दाख के कई समुदायों को ST का दर्जा दिया गया. सोनम वांगचुक भी अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए शिक्षा में सुधार की मांग कर रहे हैं.
सोनम वांगचुक के अनशन का 20वां दिन
सोनम वांगचुक के अनशन को 20 दिन हो गए हैं. उनकी मांग है कि नीट पेपर लीक के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें. सोनम वांगचुक के समर्थन में लोग सोशल मीडिया पर आवाज उठा रहे हैं. सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को लेकर सिनेमा जगत के सितारों ने भी चिंता जताई है. मीडिया रिपोर्ट्स से पता चलता है कि वह लगातार कमजोर होते जा रहे हैं, मांसपेशियों में दर्द से परेशान हैं और उनका 8.5 किलोग्राम वजन कम हो गया है. सोनम वांगचुक का अगल कदम यह है कि वे 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद भवन तक मार्च निकालेंगे. उन्होंने लोगों से अपील की है कि अगर वे सच में उनकी चिंता करते हैं, तो मार्च में शामिल हों. अब देखना होगा कि वे 20 जुलाई के बाद अपना अनशन तोड़ते हैं या नहीं.
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