Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को डॉक्टरों को कड़ी फटकार लगाई. CJI ने डॉक्टरों से कहा कि अगर आप अपनी ड्यूटी नहीं निभाते हैं, तो आपको ‘डॉक्टर’ कहलाने का कोई हक नहीं है. अगर आपमें संवेदनशीलता होती, तो सुविधा न होने पर भी आप बच्ची को दूसरे अस्पताल ले जाते. क्या आपने इसलिए नज़रअंदाज़ किया क्योंकि वह गरीब थी? आपकी फीस नहीं दे सकती थी.मामला यह है कि उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में मार्च में रेप और मर्डर की शिकार हुई चार साल की बच्ची को समय पर मेडिकल मदद नहीं मिल पाई थी. जिससे उसकी मौत हो गई.
पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को गाज़ियाबाद में मार्च में रेप और मर्डर की शिकार हुई चार साल की बच्ची को समय पर मेडिकल मदद न देने के लिए दो प्राइवेट अस्पतालों और उनके डॉक्टरों को फटकार लगाई. CJI सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने अस्पतालों से परिवार को उचित मुआवज़ा देने को कहा. CJI ने डॉक्टरों से कहा कि अगर आप अपनी ड्यूटी नहीं निभाते हैं, तो आपको ‘डॉक्टर’ कहलाने का कोई हक नहीं है. अगर आपमें संवेदनशीलता होती, तो सुविधा न होने पर भी आप बच्ची को दूसरे अस्पताल ले जाते. क्या आपने इसलिए नज़रअंदाज़ किया क्योंकि वह गरीब थी? आपकी फ़ीस नहीं दे सकती थी. इस मामले की सुनवाई अगले हफ़्ते फिर होगी.
पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी जताई नाराजगी
मालूम हो कि 16 मार्च को एक पड़ोसी चॉकलेट दिलाने के बहाने बच्ची को बहला-फुसलाकर ले गया. जब बच्ची वापस नहीं लौटी, तो उसके पिता ने उसे ढूंढना शुरू किया और उसे बेहोश व खून से लथपथ पाया. परिवार उसे दो प्राइवेट अस्पतालों में ले गया. अस्पतालों ने उसे भर्ती करने से मना कर दिया. इसके बाद उसे गाज़ियाबाद के एक सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. अप्रैल में, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में FIR दर्ज करने और जांच करने में गाज़ियाबाद पुलिस की अनिच्छा पर सवाल उठाए थे. कोर्ट ने उन दो प्राइवेट अस्पतालों खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर और सेंट जोसेफ (मरियम) हॉस्पिटल को भी निर्देश दिया था, जिन्होंने कथित तौर पर पीड़िता का इलाज करने से मना कर दिया था, कि वे उन पर लगे आरोपों के जवाब में अपने हलफ़नामे दाखिल करें.
पिता की याचिका पर कोर्ट कर रही सुनवाई
बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसे पीड़िता के पिता ने दायर किया था. वे दिहाड़ी मजदूर हैं और चाहते थे कि इस मामले की जांच कोर्ट की निगरानी में किसी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) या CBI से कराई जाए. 10 अप्रैल को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस केस की जांच में गाजियाबाद पुलिस के संवेदनहीन रवैये की कड़ी आलोचना की. बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार, संबंधित पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO), दो अस्पतालों और एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी किए थे. बेंच ने राज्य पुलिस से यह भी कहा था कि वे पीड़िता के परिवार के सदस्यों को परेशान न करें. कोर्ट ने इस बात पर निराशा जताई थी कि दो प्राइवेट अस्पतालों ने खून बहने की हालत में आई लड़की को भर्ती करने से मना कर दिया था और आखिरकार एक सरकारी अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया गया.
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News Source: PTI
