Karnataka Elections: कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग का मामला अब सिर्फ अनुशासनहीनता का मुद्दा नहीं रह गया है. दिल्ली में बीजेपी नेतृत्व ने जहां क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों पर कार्रवाई को लेकर मंथन किया, वहीं NDA के भविष्य और जेडी(एस) के साथ गठबंधन की उपयोगिता पर भी गंभीर चर्चा हुई. सवाल ये है कि क्या कर्नाटक में बीजेपी अब अपने दम पर नए सामाजिक समीकरण गढ़ने की तैयारी कर रही है? कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग को लेकर मंगलवार को दिल्ली में अहम बैठक हुई. बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र, नेता प्रतिपक्ष आर अशोक और प्रभारी राधा मोहन दास अग्रवाल के साथ पूरे घटनाक्रम की समीक्षा की.
कांग्रेस ने पांचवीं सीट भी जीती
प्रदेश नेतृत्व ने केंद्रीय नेतृत्व को बताया कि NDA के 11 विधायकों ने जेडी(एस) उम्मीदवार के पक्ष में मतदान नहीं किया. बीजेपी के चार वोट बर्बाद हुए, एक वोट अमान्य रहा और कम से कम तीन विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग की पुष्टि हुई है. वहीं जेडी(एस) के भी 6 से 7 विधायकों के पार्टी लाइन से हटकर मतदान करने की जानकारी सामने आई है. 224 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस अपने दम पर चार सीटें जीत सकती थी, लेकिन क्रॉस वोटिंग के कारण उसने पांचवीं सीट भी जीत ली. इसका असर विधान परिषद के समीकरणों पर भी पड़ा. कांग्रेस की ताकत 34 से बढ़कर 39 हो गई, जबकि बीजेपी 29 और जेडी(एस) 6 सदस्यों तक सिमट गई. जेडी(एस) उम्मीदवार गोविंदराजू की हार ने गठबंधन के भीतर असंतोष की परतें भी खोल दीं.
जेडी (एस) की पकड़ हो रही कमजोर
18 विधायकों वाली जेडी(एस) के उम्मीदवार को सिर्फ 14 प्रथम वरीयता वोट मिले. बीजेपी ने भी अपने चार विधायकों को समर्थन का निर्देश दिया था, लेकिन इसके बावजूद गठबंधन उम्मीदवार चुनाव हार गया. दिल्ली की बैठक सिर्फ क्रॉस वोटिंग तक सीमित नहीं रही. सूत्रों के मुताबिक चर्चा का दूसरा और बड़ा मुद्दा था कर्नाटक में NDA का भविष्य और जेडी(एस) की राजनीतिक उपयोगिता.
सूत्रों के मुताबिक प्रदेश नेतृत्व ने केंद्रीय नेतृत्व को बताया कि राज्य इकाई पहले से ही जेडी(एस) को तीसरा उम्मीदवार उतारने के पक्ष में नहीं थी. पार्टी का मानना था कि गठबंधन के पास जीत के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है, लेकिन दबाव में उम्मीदवार उतारा गया और नतीजा राजनीतिक झटके के रूप में सामने आया. बीजेपी के एक वर्ग का आकलन है कि वोक्कालिगा राजनीति में जेडी(एस) की पकड़ लगातार कमजोर हो रही है.
नए समीकरणों पर विचार कर रही बीजेपी
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के उभार के बाद वोक्कालिगा समुदाय का बड़ा हिस्सा कांग्रेस की तरफ शिफ्ट होता दिखाई दे रहा है. ओल्ड मैसूर क्षेत्र, जो कभी जेडी(एस) का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां भी पार्टी का आधार सिकुड़ता दिख रहा है. यही वजह है कि कम से कम बीजेपी की स्टेट यूनिट अब अपने सामाजिक समीकरणों की नई गणित पर विचार कर रही है और केंद्रीय नेतृत्व को भी इस मुद्दे पर बता दिया गया है. राज्य की राजनीति में पार्टी का सबसे मजबूत आधार माने जाने वाले लिंगायत समुदाय की हिस्सेदारी 14 से 17 प्रतिशत के बीच है. ओबीसी समुदायों की आबादी 32 से 35 प्रतिशत मानी जाती है, जबकि कुरुबा समुदाय अकेले 7 से 8 प्रतिशत प्रभाव रखता है. इसके अलावा एससी-एसटी की हिस्सेदारी 24 से 26 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 12 से 13 प्रतिशत के आसपास है.
कमेटी जल्द सौंपेगी अपनी रिपोर्ट
बीजेपी के भीतर यह राय मजबूत हो रही है कि लिंगायत और व्यापक ओबीसी गठजोड़ को मजबूत कर पार्टी प्रभावी राजनीतिक रणनीति बना सकती है. खासकर सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कुरुबा समुदाय में संभावित नाराजगी को भी बीजेपी एक अवसर के रूप में देख रही है. दिल्ली में हुई बैठक का एजेंडा सिर्फ क्रॉस वोटिंग के दोषियों की पहचान नहीं था. इसके लिए सीटी रवि की अगुवाई में बनाई गई फैक्ट फाइंडिंग कमेटी जल्द अपनी रिपोर्ट सौंपेगी और उसके बाद कार्रवाई हो सकती है. लेकिन असली चर्चा NDA की भविष्य की संरचना, जेडी(एस) की प्रासंगिकता और बीजेपी की नई सामाजिक इंजीनियरिंग को लेकर हुई. ऐसे में आने वाले दिनों में कार्रवाई भले क्रॉस वोटिंग करने वालों पर दिखे, लेकिन उसके राजनीतिक असर कर्नाटक में NDA की पूरी संरचना तक पहुंच सकते हैं.
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