Home Top News न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व ही मजबूत लोकतंत्र की असली नींव, अदालती बोझ कम करेगी मध्यस्थता

न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व ही मजबूत लोकतंत्र की असली नींव, अदालती बोझ कम करेगी मध्यस्थता

by Nitin Thakur 8 August 2026, 9:39 PM IST (Updated 10 August 2026, 12:30 PM IST)
8 August 2026, 9:39 PM IST (Updated 10 August 2026, 12:30 PM IST)
न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व ही मजबूत लोकतंत्र की असली नींव, छोटे मामलों को मध्यस्थता से सुलझाने पर जोर

Access to Justice: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है. आज के इस आयोजन की थीम एक आवाज, सशक्त भविष्य, गरिमा, समावेशन के माध्यम से न्याय पहुंचना है. न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व को लोकतंत्र का आधार बनाया गया है. मध्यस्थता के माध्यम से छोटे-छोटे मामलों का निपटारा कर हम केस पेंडेंसी जैसे गंभीर विषयों पर मंथन कर रहे हैं.

हमारे लिए न्याय की अवधारणा पंच परमेश्नरों की परंपरा रही है, जिन्होंने कभी समझौतों से विवादों को सहजता से सुलझाया है. यह बातें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कही. वे ‘इंहेंसिंग एक्सेस टू जस्टिस'(न्याय तक पहुंच बढ़ाना) विषय पर आयोजित कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे. कॉन्फ्रेंस का आयोजन 8 अगस्त को इंदौर के ब्रिलियंट कंवेंशन सेंटर में किया गया.

न्याय के लिए प्रतिबद्ध है सरकार

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के गीता ज्ञान से भी समाधान का मार्ग दिखाई देता है. उन्होंने भीषण समय टालने के लिए 5 गांवों से समाधान निकालने का प्रयास किया था. हमारे संविधान में हजारों वर्षों की न्याय परंपरा का आधुनिक उत्कृष्ट संगम है. यह देश का न्याय विधान है और हमारे न्यायालय न्याय के मंदिर हैं. भारतीय अदालतों को लोग श्रद्धा से न्याय मिलने के स्थान के रूप में देखते हैं. कहा कि न्याय की आस में न्यायालय की चौखट पर कदम रखते हैं. राज्य सरकार न्यायपालिका की भावना के अनुसार अपने सभी उपलब्ध संसाधनों के साथ सदैव सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है.

अंग्रेजों के बनाए कानून किए खत्म

डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में बदलाव का स्वर्णिम समय चल रहा है. हमने अंग्रेजों के दौर के अनेक गैर-जरूरी कानूनों को समाप्त कर न्याय को सुलभ और सरल बनाया है. हमारे लिए आधुनिक समय में ई-केस फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल डेटा संग्रह, आधुनिक न्याय प्रबंधन जैसी न्याय प्रणाली लागू की गई है. उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने सभी तरह के प्रबंधन किए हैं.

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कहा कि अभी कुछ दिन पहले ही अनुच्छेद 44 के माध्यम से राज्य के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से संबंधित विधेयक विधानसभा में पारित किया है. इसे पूर्व न्यायधीश रंजना देसाई के नेतृत्व में बनी समिति के सुधावों पर तैयार किया गया है.उन्होंने कहा कि हमने पेपर लीक, धोखाधड़ी के मामले में तेजी से कार्य करने के लिए 4 फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना की है. उच्च न्यायालय जबलपुर के विशेष सहयोग से 24 घंटे के अंदर ही इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित की गई है.

न्याय में देरी भी अन्याय ही है

मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश में साइबर सुरक्षा, राष्ट्रीय स्वचालित प्रणाली, ई-जीरो एफआईआर के माध्यम से पुलिस प्रणाली वर्तमान दौर की जरूरतों के अनुसार सुदृढ़ हो रही है. उन्होंने कहा कि मालवा की धरती सम्राट विक्रमादित्य और राजा हरिश्चंद्र के काल से वंदनीय रही है. जहां हर कालखंड में कदम-कदम पर न्याय के उत्कृष्ट उदाहरण समाने आए हैं. लगभग 250 वर्ष पूर्व इसी न्याय नगरी में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने सुशासन की स्थापना की थी. कोई शासक न्याय करते समय पुत्र और प्रजा में भेदभाव न करे, यह उदाहरण होलकर सम्राज्य में ही देखने को मिला है. उन्होंने अपने इकलौते पुत्र को गलती के लिए उसी प्रकार दंडित किया, जैसा कोई न्यायाधीश करता है. इसी प्रकार लगभग 2 हजार वर्ष पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का उदाहरण देखने को मिलता है.

संवाद से ही संभव है हल

कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि न्याय व्यवस्था के संदर्भ में सशक्त भविष्य, गरिमा, समावेशन सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि यह विधिक सहायता की वास्तविक परिभाषा है. मुख्यमंत्री ने देवी अहिल्याबाई होलकर के न्याय के प्रति समर्पण का जिक्र किया. लोकमाता के लिए न्याय सबके लिए समान था. वे इकलौती महिला शासक थीं, जो निर्बाध रूप से प्रतिदिन नागरिकों, किसानों और विधवाओं से मुलाकात कर उनकी समस्याओं का समाधान करती थीं. वे सीधे नागरिकों से संवाद करती थीं. उनके शासनकाल में किसी के साथ भेदभाव नहीं होता था. ऐसी इंदौर नगरी में इस सम्मेलन का आयोजन किया गया है. इसके लिए मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण बधाई का पात्र है. उन्होंने कहा कि संवाद की प्रक्रिया अनेक विचारों से एकमत या आवाज तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

सभी का उद्देश्य समान

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के संवाद और चर्चा के लिए कार्यक्रमों से राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला और तहसील स्तर की संस्थाएं जुड़ी हैं. हमारे पैरा लीगल वॉलेंटियर सामाजिक व्यवस्था के सबसे करीब होते हैं. उनकी भूमिकाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन हम सभी एक समान संवैधानिक उद्देश्य से साथ जुड़े होते हैं. वेस्ट जोन में विधिक सेवाओं का विस्तार मध्यप्रदेश के जनजातीय समुदाय, गोवा के मछुआरा समुदाय, गुजरात के माइग्रेंट वर्कर और मुंबई में रहने वाली किसी महिला के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. सभी की अलग-अलग समस्याएं हो सकती हैं. हर समस्या का समाधान एक जैसा नहीं होगा, बल्कि उसकी प्रकृति के अनुसार हमें अलग समाधान प्रदान करना होगा. स्थानीय समस्या को उसी सोच के साथ निदान तक लेकर जाना पड़ेगा. उस समस्या को समझने के लिए उनकी भाषा को समझना होगा.

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न्याय में दिखे समानता का भाव

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि समाज के अंतिम छोर के व्यक्ति तक न्याय की पहुंच हो, इसी में समानता का भाव छिपा है. समानता स्वयं से पूछता है कि हममें से कोई पीछे तो नहीं रह गया. हमें प्रगति और अधिकारों को दिलवाने की लड़ाई में देखना होगा कि कहीं कोई पीछे तो नहीं छूट गया. समानता और न्याय की पहुंच हर नागरिक का अधिकार है और यह सुनिश्चित करना भी हम सभी की जिम्मेदारी है. हमारी क्षमता इसमें नहीं कि जो हमारे पास आ गया उसकी सहायता करें, बल्कि असल परीक्षा तो यह है कि जो हमारे पास नहीं आया है, हम उसके पास कैसे पहुंचे. पैरा लीगल वॉलेंटियर्स हमारी लीगल सेना और समाजसेवी की तरह हैं. यही काम महात्मा गांधी ने समाज के लिए किया था. समानता केवल स्कीम लॉन्च करने से नहीं आएगी. संवाद सुनिश्चित करता है कि हर समस्या को सुना जाए. गरिमा सुनिश्चित करती है कि सभी से सम्मानपूर्वक बर्ताव हो. समावेशन सुनिश्चित करता है कि कोई पीछे न छूटे.

सुशासन का वास्तविक आधार है न्याय

केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि भारतीय न्याय व्यवस्था में न्याय केवल न्यायालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक इसकी पहुंच हो, यह हमारी प्रतिबद्धता है. दुनिया में भारत की पहचान लोकतंत्र की जननी के तौर पर है. लेकिन, हमारी सभ्यता ने रूल ऑफ लॉ, नेचुरल जस्टिस, मध्यस्थ संवाद और लोक कल्याण की परंपरा को आत्मसात किया है. भारतीय कानून में नैतिकता, समानता और मानव कल्याण का आधार रहा है. भारतीय संविधान निर्माताओं ने संविधान में सबसे पहले जस्टिस को स्थान दिया है. सोशल, इकोनोमिकल और पॉलिटिकल जस्टिस, ये तीनों शब्द भारतीय संवैधानिक दर्शन की आधारशिला है. आर्टिकल 39A के माध्यम से संविधान ने सभी राज्यों को यह दायित्व सौंपा है कि प्रत्येक नागरिक को नि:शुल्क न्याय की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए.

सहमति से निकलेगा समस्या का हल

सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश विक्रम नाथ ने कहा कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकारण (नालसा) की शिक्षा स्कीम और साइन लैंग्वेज में थीम सॉन्ग न्याय की पहुंच को जन-जन तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध होगा. राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की योजनाओं के हिंदी संस्करण और ब्रेल लिपि में गाइड का विमोचन दृष्टि बाधितों के लिए न्याय की आस बनकर सामने आएगा. स्पर्श के माध्यम से दिव्यांगजन किसी अन्य की सहायता लिए बगैर यह सुनिश्चित कर पाएंगे कि विधिक सेवाएं उनके लिए उपलब्ध हैं.

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नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी जबलपुर के सहयोग से मध्यस्थता पर सर्टिफिकेट कोर्स- विवाद से सहमति का शुभारंभ भी नालसा के प्रयासों को आगे बढ़ाने में सहायक होगा. इससे परिवार, पड़ोसी और साझेदारी जैसे मुद्दों का संवाद के जरिए समाधान निकलेगा. मध्यस्थता एक ऐसा माध्यम बनेगा, जिसमें नागरिकों के पास सहमति से हल निकालने की शक्ति होगी, न कि कोई समाधान उन पर थोपा जाए. न्याय सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध है.

हमारे संकल्प को मिलेगी नई दिशा

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायधीश विवेक रुसिया ने कहा कि यह सम्मेलन हमारे संकल्प को नई दिशा प्रदान करेगा. हम सभी के एकीकृत प्रयासों से ही न्याय सभी के लिए समान रूप से आशा और उम्मीद की किरण बनेगा. एक्सेस ऑफ जस्टिस एक संवैधानिक सोच नहीं, बल्कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी है. समानता को चैरिटी के रूप में नहीं देखा जाए, यह एक संवैधानिक अधिकार है. तकनीकी नवाचारों ने सभी वर्गों तक विधिक सेवाओं की पहुंच को सभी के लिए आसान और सुगम बनाया है.

कहा कि हमें इस आयोजन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का भी विशेष सहयोग मिला है. मध्यप्रदेश न्यायिक विधिक सेवा प्राधिकरण का प्रयास रहा है कि न्याय केवल न्यायालयों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक इसकी सरल, सहज और सम्मानजनक पहुंच हो. लोक अदालतें, कारागार सुधार और विधिक सेवाओं का जनजातीय क्षत्रों तक विस्तार की पहल सराहनीय है. हमारे प्रशिक्षित मध्यस्थों का एक तंत्र अनेक मामलों का निपटारा न्यायालयों से पूर्व संवाद और सहमति से कर रहा है. दिव्यांगों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है.

ये रहे मौजूद

कॉन्फ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट न्यायधीश जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, न्यायधीश विजय बिश्वनोई, न्यायधीश आलोक अराधे, न्यायधीश शील नागु, न्यायधीश संजीव सचदेवा, मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय के न्यायधीश विवेक अग्रवाल, न्यायधीश आनंद पाठक सहित सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, विधिक सेवा प्राधिकरणों के वरिष्ठ पदाधिकारी, न्यायिक अधिकारी, महापौर पुष्यमित्र भार्गव उपस्थित थे. कार्यक्रम के अंत में मध्यप्रदेश उच्च न्यायलय के न्यायधीश आनंद पाठक ने आभार व्यक्त किया.

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