Tiranga Village: देशभक्ति की भावना किसी भाषा या आवाज की मोहताज नहीं होती, इसे जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले के सुदूर पहाड़ी गांव धडकाई की तीन मूक-बधिर बहनों ने साबित कर दिखाया है. समुद्र तल से 9,150 फीट की ऊंचाई पर बसे और बुनियादी सड़कों से महरूम इस ‘साइलेंट विलेज’ से उठती देशभक्ति की गूंज आज पूरे देश को प्रेरित कर रही है.
जिद के आगे पिता को भी झुकना पड़ा
गांव के रहने वाले रेहम अली की तीन बेटियों रेशमा बीबी (26), परवीन कौसर (24) और सायरा खातून (22) ने स्वतंत्रता दिवस से पहले देशव्यापी ‘हर घर तिरंगा’ अभियान को अपने गांव तक पहुंचाने का अटूट संकल्प लिया. जब तक सरकारी अभियान इस दुर्गम इलाके तक पहुंच पाता, इन बहनों ने खुद मोर्चा संभाल लिया. उनके भीतर राष्ट्रप्रेम का जज्बा इतना गहरा था कि उन्होंने तिरंगा बनाने के लिए कपड़ा मिलने तक खाना खाने से साफ इनकार कर दिया. बेटियों की इस ज़िद के आगे पिता को भी झुकना पड़ा और वे तुरंत बाज़ार से कपड़ा लेकर आए. बोलने और सुनने में अक्षम होने के बावजूद इन आदिवासी गुर्जर बहनों की उंगलियों ने सिलाई मशीन पर देश के प्रति अपने प्रेम को पिरोया.
गांव में हर घर लहराया तिरंगा
उन्होंने दिन-रात मेहनत करके 150 से अधिक तिरंगे खुद सिले और गांव के हर घर में जाकर बांटे. अपनी भाषा में इशारों से उन्होंने ग्रामीणों को राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करने और इसे गर्व से लहराने के लिए प्रेरित किया.लगभग 2,000 की आबादी वाले इस गांव में 90 से अधिक लोग जन्म से मूक-बधिर हैं. जिसके कारण इसे ‘साइलेंट विलेज’ (मूक गांव) कहा जाता है, लेकिन आज इन तीन बहनों के अडिग इरादों ने यह दिखा दिया है कि भले ही उनके होठों पर आवाज़ न हो, लेकिन उनके दिलों में धड़कता भारत देश के हर नागरिक के लिए गर्व का विषय है. खुशी से भरे पिता ने कहा कि पिछले पांच दिनों में उन्होंने 150 से ज़्यादा तिरंगे सिले और बांटे हैं. मुझे अपनी बेटियों और उन्होंने जो हासिल किया है, उस पर बहुत गर्व है.
पहली बार पहुंचा ‘हर घर तिरंगा’
स्थानीय लोगों ने बताया कि हालांकि उन्हें 2022 में शुरू हुए ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के बारे में पता था, लेकिन यह अभियान अब तक पहाड़ी ढलान पर बसे दूर-दराज़ के गांव ‘दाधकाई-बी’ तक नहीं पहुंचा था. बहनों के घर के पास रहने वाले जमात दानिश ने कहा कि गांव का अपनी छतों पर तिरंगा लहराते देखने का चार साल का इंतज़ार आखिरकार खत्म हो गया है. सालों से ग्रामीणों ने अपनी एक अनोखी सांकेतिक भाषा विकसित की है, जिसे वहां के निवासी समझते हैं और आसानी से उसमें बातचीत करते हैं.
पूरे गांव का बढ़ाया मान
दानिश ने कहा कि बहनों ने एक शांत पड़े गांव में नई जान डाल दी है. उन्होंने आगे कहा कि अब लगभग हर छत पर तिरंगा लगा है और बच्चे गर्व के साथ राष्ट्रीय ध्वज लहराते हुए देखे जा सकते हैं. गांव के बुजुर्ग और ‘दाधकाई-बी’ के पूर्व सरपंच हाजी अब्दुल लतीफ (75) भी उन लोगों में शामिल थे जिन्हें तीनों बहनों से तिरंगे के बंडल मिले. लतीफ ने कहा कि यह देखकर दिल को बहुत अच्छा लगता है कि अपनी दिव्यांगता के बावजूद हमारी बेटियों ने इतना दृढ़ संकल्प दिखाया है और पूरे गांव का मान बढ़ाया है. उनकी कोशिश निश्चित रूप से दूसरों को प्रेरित करेगी.
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News Source: PTI
