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‘फ्री स्पीच’ का अधिकार नहीं देता गाली देने का लाइसेंस, जानें गालीबाजों को सीधा करने के लिए क्या है कानून

by Neha Singh 6 August 2026, 3:38 PM IST (Updated 6 August 2026, 4:02 PM IST)
6 August 2026, 3:38 PM IST (Updated 6 August 2026, 4:02 PM IST)
Legal Action Against Abuse (2)

Abusive Language Law: हमारे समाज में कई लोग गाली देने को गलत नहीं मानते. लोगों को लगता है कि गाली देना आम बात है. वहीं कुछ लोगों का मानना है कि गाली गुस्सा जाहिर करने का एक तरीका है. युवा और जेन-जी गाली देने को कूल मानते हैं. तो वहीं, देश चलाने वाले नेता भी किसी से कम नहीं है. संसद में भी अक्सर गालियों के उच्चारण सुनाई दे जाते हैं. गाली किसी एक उम्र के लोगों की पसंद नहीं है, बल्कि हमारे आस-पास हर व्यक्ति अपने दोस्तों में या पीठ-पीछे लोगों को गाली जरूर देता है. लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि गाली देना आम बात है और आप किसी को भी गाली दे सकते हैं. हाल ही में हमें जंतर-मंतर के प्रदर्शन में देखने को मिला कि कुछ छात्रों ने प्रधानमंत्री के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, जिसके बाद उनमें से कुछ के ऊपर जीरो एफआईआर दर्ज की गई. हालांकि नाबालिगों ने बाद में माफी मांग ली.

भारतीय संविधान हर नागरिक को बोलने की आजादी का अधिकार देता है. इसका मतलब है कि आप बिना किसी झिझक के अपनी राय खुलकर रख सकते हैं, सरकार की बुराई कर सकते हैं और किसी भी मुद्दे पर अपने विचार रख सकते हैं. हालांकि, इस अधिकार का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति किसी को भी गाली दे सकता है. बोलने की आजादी की कानूनी और सामाजिक सीमाएं भी हैं, जिन्हें पार करने पर कार्रवाई हो सकती है.

सोशल मीडिया पर आम है गाली देना

आमने-सामने गाली देने वाले भले ही कभी झिझक सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर उन्हें अभद्रता की सारी हदें पार करने का मौका मिल जाता है. Facebook, Twitter, Instagram और YouTube जैसे प्लेटफॉर्म पर बहस के दौरान गाली-गलौज और अपमानजनक कमेंट्स आम होते जा रहे हैं. एक्ट्रेस और इन्फ्लूएंसर के कमेंट सेक्शन में गालियों की भरमार होती है. अगर कोई किसी के विचारों को पसंद नहीं करता तो सोशल मीडिया पर उसे गाली देकर अपनी भड़ास निकालता है.

लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होती कि अगर पीड़ित चाहे तो उनके खिलाफ कानूनी एक्शन ले सकता है और आपको उन्हें सजा मिल सकती है. अगर गाली-गलौज का मकसद किसी की इज्जत को नुकसान पहुंचाना, धमकी देना, गंदी या आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करना या जानबूझकर किसी का अपमान करना है, तो भारतीय कानून के तहत उस व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. ऐसे में भारतीय न्याय संहिता (BNS), इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट और दूसरे कानूनी नियम अलग-अलग हालात में लागू हो सकते हैं. ऐसे मामलों में, शिकायत दर्ज करने से लेकर कोर्ट जाने तक के कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं.

क्या कहता है संविधान

भारत का संविधान नागरिकों को लोकतांत्रिक माहौल में अपनी बात कहने का अधिकार देता है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) हर नागरिक को अपनी राय रखने और बोलने की आजादी का अधिकार देता है. हालांकि, यह अधिकार असीमित नहीं है. संविधान का अनुच्छेद 19(2) इस पर रोक लगाता है. जब वैचारिक मतभेद की जगह घटिया बयानबाजी ले लेती है, तो संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) चुपचाप पीछे हट जाता है और अनुच्छेद 19(2) के साथ नया आपराधिक कानून (BNS) लागू हो जाता है. भारत में बोलने की आजादी का मतलब जरूरी नहीं कि नफरत फैलाने या गाली देने का लाइसेंस हो. जैसे ही जबान हद पार करती है, कानून की हदें शुरू हो जाती हैं.

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कोर्ट का रुख

गाली-गलौज या अश्लील भाषा के इस्तेमाल पर कोर्ट का रुख बहुत साफ और प्रैक्टिकल है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली के मुताबिक, सिर्फ गाली-गलौज करना अपने आप में कोई जुर्म नहीं है. कोर्ट यह मानता है कि गाली-गलौज करना असभ्य और अभद्र व्यवहार है, लेकिन सिर्फ गाली-गलौज किसी के खिलाफ क्रिमिनल केस करने के लिए काफी नहीं है. हर मामले में संदर्भ और इरादे पर विचार किया जाना चाहिए.

कार्रवाई के प्रावधान

BNS धारा 352: शांति भंग करने के इरादे से अपमान करना

अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर अपशब्दों का इस्तेमाल कर किसी को इस हद तक उकसाता है कि वह सार्वजनिक शांति भंग कर दें, तो पुलिस उस पर कार्रवाई हो सकती है. यह असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है. इसमें बीएनएस की धारा 352 के तहत पुलिस एक्शन ले सकती है, जो आईपीएस की धारा 504 का नया वर्जन है. इस कानून का मकसद सिर्फ गाली-गलौज करने पर सजा देना ही नहीं है, बल्कि यह भी जांचना है कि क्या आरोपी का व्यवहार हिंसा, अशांति या कानून-व्यवस्था तोड़ने के इरादे से था या ऐसी स्थिति पैदा होने की संभावना थी. सेक्शन 352 के तहत दोषी पाए जाने पर ज्यादा से ज्यादा दो साल की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है.

BNS की धारा 351: गाली के साथ धमकी भी दी गई हो तो

यदि कोई व्यक्ति गाली- गलौज के साथ किसी व्यक्ति के जीवन, प्रतिष्ठा या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकी देता है, तो धारा 351 के तहत एक्शन लिया जा सकता है. यह धारा तब लागू होती है, जब कोई व्यक्ति किसी को डराने, किसी काम को कराने या किसी काम को रोकने के लिए जान से मारने की धमकी देता है. यह असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है, हालांकि धमकी की गंभीरता के हिसाब से इसे संज्ञेय में बदला जा सकता है. ऐसे मामलों में धमकी की गंभीरता के हिसाब से 2 साल से लेकर 7 साल तक की सजा हो सकती है.

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BNS की धारा 356: मानहानि का मामला

जब कोई व्यक्ति बोलकर, लिखकर, सोशल मीडिया पोस्ट करके या किसी भी तरीके से किसी अन्य व्यक्ति की इज्जत या चरित्र को नुकसान पहुंचाता, तो उसे मानहानि कहते हैं. यह असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है. ऐसे में भारतीय न्याय संहिता की धारा 356 के तहत मानहानि का केस हो सकता है. इसीलिए किसी को भी कुछ भी बोलने से पहले इस धारा को याद करना चाहिए. किसी बयान को मानहानि करने वाला माना जाएगा या नहीं, यह हर केस के फैक्ट्स और हालात के आधार पर तय किया जाता है. ऐसे मामलों में 2 साल की जेल, जुर्माना या दोनों सजो मिल सकती है.

BNS की धारा 196: जाति, धर्म, भाषा के आधार पर नफरत फैलाना)

धारा 196 मुख्य रूप से समाज में अलग-अलग समुदायों के बीच सद्भाव बनाए रखने के लिए बनाया गया है. इसका मुख्य मकसद धर्म, जाति, भाषा, नस्ल, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर नफरत, दुश्मनी और भेदभाव (हेट स्पीच) को बढ़ावा देने वाले कामों को रोकना है. यह धारा तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति जानबूझकर दो समुदायों के बीच बोलकर, लिखकर, सोशल मीडिया पर पोस्ट करके या इशारों से सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने की कोशिश करता है. यह एक संज्ञेय अपराध है. इसके तहत दोषी पाए जाने पर आम तौर पर तीन साल तक की जेल हो सकती है, लेकिन अगर यही जुर्म किसी धार्मिक जगह (जैसे मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारा) पर किया जाता है, तो जुर्म को ज्यादा गंभीर माना जाता है और सजा बढ़कर पांच साल तक की जेल हो सकती है. यह पुराने इंडियन पीनल कोड की धारा 153A का नया वर्जन है.

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BNS की धारा 79: किसी महिला का अपमान करना

यह धारा मुख्य रूप से महिलाओं की गरिमा, सम्मान और निजता की रक्षा करने के लिए है. आसान भाषा में कहें, तो यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी महिला का अपमान करने या उसकी मर्यादा को ठेक पहुंचाने के इरादे से उसे गाली देता है या कोई हरकत करता है तो उसके खिलाफ बीएनएस की धारा 79 के तहत कार्रवाई की जा सकती है. यह एक संज्ञेय अपराध है. इसके उदाहरण हैं- किसी महिला को देखकर गंदे कमेंट करना, अश्लील इशारे करना, उसके सामने अश्लील वस्तु या फोटो-वीडियो दिखाना या उसके निजी जिंदगी में दखल देना. ऐसे मामलों में 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकता है.

IT Act (धारा 67)

इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) एक्ट, 2000 का सेक्शन 67, सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री के पब्लिश करने या शेयर करने पर रोक लगाता है. इस अपराध में सजा हो सकती है. सोशल मीडिया या किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अश्लील या भद्दे मैसेज, इमेज या वीडियो शेयर करने पर जेल और जुर्माना जैसी सख्त सजा हो सकती है.

Legal Action Against Abuse
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संज्ञेय और असंज्ञेय अपराध में अंतर समझिए

संज्ञेय अपराध (Cognizable Offences)- इन मामलों को गंभीर माना जाता है, जिससे पुलिस शिकायत मिलने पर तुरंत FIR दर्ज कर सकती है और बिना वारंट के आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है.

असंज्ञेय अपराध (Non-cognizable Offences)– ये अपराध तुलनात्मक रूप से कम गंभीर होते हैं. इन मामलों में पुलिस सीधे FIR दर्ज नहीं कर सकती. पुलिस पहले NCR (Non-Cognizable Report) दर्ज करती और मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाज जांच शुरू करती है. इन अपराधों में पुलिस कोर्ट के वारंट के बिना आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती.

अगर आप यूहीं किसी को भी गाली दे देते हैं, तो सुधर जाइए. वरना आपको कानूनी पचड़ों में फंसना पड़ जाएगा. वहीं अगर आपके साथ कोई गाली-गलौज करता है, तो आप उसके खिलाफ इन धाराओं के तहत शिकायत कर सकते हैं.

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