Delhi Crime : दिल्ली में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कथित वीडियो अपलोड करने के मामले में कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ आरोप तय करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है. कोर्ट ने यह भी कहा कि मोबाइल फोन का न मिलना मुकदमा रोकने का आधार नहीं हो सकता है. खासकर तब, जब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किए गए वीडियो का आरोपी से सीधा संबंध हो. एडिशनल सेशन जज हरगुरवरिंदर सिंह जग्गी आदित्य बिस्वास की ओर से दायर एक रिवीजन याचिका की सुनवाई कर रहे थे. बिस्वास ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उनके खिलाफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 67B के तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया गया था.
फेसबुक पर किया गया था वीडियो अपलोड
27 जुलाई को कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि आरोप तय करने के लिए मोबाइल फोन बरामद न होना मुकदमे की कार्यवाही को रोकने का आधार नहीं हो सकता. खासकर तब जब आरोपी के सोशल मीडिया अकाउंट से ऐसे कंटेंट को अपलोड किया गया था. बता दें कि यह मामला दिसंबर 2022 में साउथ दिल्ली साइबर पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR से जुड़ा है. यह एफआईआर US-स्थित ‘नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन’ (NCMEC) की साइबरटिपलाइन रिपोर्ट के आधार पर ‘नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो’ से मिली शिकायत के बाद दर्ज की गई थी. पीड़ित पक्ष के अनुसार, नीम बिस्वास (आदित्य बिस्वास) नाम से संचालित फेसबुक अकाउंट से 17 सेकंड का एक वीडियो अपलोड किया गया था. इसमें एक बच्चे से संबंधित आपत्तिजनक सामग्री दिखाई गई थी.
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मोबाइल नंबर के जरिए पता लगाया
एफआईआर दर्ज होने के बाद जांचकर्ताओं ने IP एड्रेस और मोबाइल नंबर के जरिए अकाउंट का पता लगाया. इस दौरान पता चला कि बिस्वास ने किसी दोस्त के फोन से इस वीडियो को बनाया और फिर अपने अकाउंट से सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया. इसी बीच आरोपी ने आरोप तय करने के आदेश को चुनौती दी और उसने तर्क दिया कि फेसबुक या NCMEC से जुड़े किसी भी अधिकारी से पूछताछ नहीं की गई थी. आरोपी ने कहा कि साइबर-टिपलाइन रिपोर्ट केवल सुनी-सुनाई बात (hearsay) बना दी गई है और उसमें किसी भी सबूत को स्वीकार नहीं किया गया है. इस दौरान आरोपी ने यह भी कहा कि उसके पास से कोई मोबाइल फोन बरामद नहीं हुआ था और अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से उसके खुद के दिए गए बयान पर आधारित था.
गंभीर शक पैदा करने के लिए सबूत मिले
वहीं, याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को आरोपी के खिलाफ गंभीर शक पैदा करने के लिए सबूत मिले थे. कोर्ट ने कहा कि पिटीशनर द्वारा कथित तौर पर फेंके गए डिवाइस की बरामदगी न होने का इस्तेमाल सही मुकदमे को शुरू होने से नहीं रोका जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की स्वीकार्यता और गवाहों की जांच से जुड़े सवाल ट्रायल के लिए होंगे.
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