Home मनोरंजन RAW के ‘जेंटलमैन स्पाईमास्टर’ RN Kao की कहानी, जानें कौन हैं जिनपर फिल्म बना रहे हैं करण जौहर

RAW के ‘जेंटलमैन स्पाईमास्टर’ RN Kao की कहानी, जानें कौन हैं जिनपर फिल्म बना रहे हैं करण जौहर

by Preeti Pal 22 September 2026, 1:29 PM IST
22 September 2026, 1:29 PM IST
RAW के ‘जेंटलमैन स्पाईमास्टर’ RN Kao की कहानी अब बड़े पर्दे पर, जानें कौन हैं जिनपर फिल्म बना रहे हैं करण जौहर

RN Kao Real Story: बॉलीवुड में जासूसी और देश की सुरक्षा से जुड़ी कहानियों का क्रेज लगातार बढ़ रहा है. अब एक ऐसी फिल्म आने वाली है, जिसकी कहानी किसी काल्पनिक जासूस की नहीं, बल्कि भारत के इंटेलिजेंस सिस्टम की नींव मजबूत करने वाले असली ऑफिसर पर होगी. करण जौहर ने रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी R&AW के संस्थापक और पहले चीफ रामेश्वर नाथ काओ यानी आरएन काओ की जिंदगी पर फिल्म बनाने का ऐलान किया है. धर्मा प्रोडक्शंस और लियो मीडिया कलेक्टिव की ये फिल्म 11 अगस्त, 2028 यानी स्वतंत्रता दिवस वीकेंड पर रिलीज होने की तैयारी में है. फिल्म करीब 6 साल से चर्चा में थी. अब आखिरकार इसे ऑफिशियली कन्फर्म कर दिया गया है. इसकी कहानी जर्नलिस्ट और राइटर नितिन गोखले की किताब ‘जेंटलमैन स्पाईमास्टर’ पर आधारित होगी. ये किताब 2019 में लॉन्च हुई थी.

फिल्म के डायरेक्टर और एक्टर्स के नाम अभी सामने नहीं आए हैं. हालांकि, इतना तय है कि कहानी 1955 से 1971 के उस दौर पर फोकस करेगी, जब काओ ने भारत के लिए एक अलग खुफिया एजेंसी की जरूरत को समझा और आगे चलकर RAW की स्थापना में बड़ी भूमिका निभाई. लेकिन सवाल यही है कि आखिर कौन थे RN काओ? वो कैसे भारत के सबसे महत्वपूर्ण खुफिया अधिकारियों में शामिल हुए? और बांग्लादेश के निर्माण, सिक्किम के भारत में विलय और NSG जैसी संस्थाओं की नींव से उनका क्या रिश्ता था? आज इन्हीं सब सवालों के जवाब लाए हैं.

वाराणसी से शुरू हुआ सफर

रामेश्वर नाथ काओ का जन्म 1918 में वाराणसी में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था. उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और इसके बाद ब्रिटिश भारत के दौर की भारतीय इंपीरियल पुलिस की परीक्षा पास की. 1940 में परीक्षा पास करने के बाद काओ उत्तर प्रदेश कैडर में शामिल हुए. शुरुआत पारंपरिक पुलिसिंग से हुई, लेकिन जल्द ही उनका झुकाव खुफिया और सेंसिटिव कैंपेंस की तरफ बढ़ने लगा. उनकी सबसे बड़ी खासियत थी, गोपनीयता बनाए रखना, परिस्थितियों को समझना और बहुत संवेदनशील मामलों को बिना शोर-शराबे के संभालना. यही खूबियां आगे चलकर उन्हें भारत के इंटेलिजेंस सिस्टम के टॉप तक ले गईं.

Dhurandhar की सफलता के बाद Ranveer Singh ने लिया बड़ा संकल्प, बप्पा से किया 1000 बेटियों की पढ़ाई का वादा

नेहरू के सिक्योरिटी ऑफिसर

आजादी के बाद काओ की पहचान एक बहुत भरोसेमंद अधिकारी के तौर पर बनने लगी. 1955 में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सिक्योरिटी से जुड़ी जिम्मेदारी दी गई. ये वो समय था जब भारत नया-नया आजाद हुआ था. पूरी दुनिया कोल्ड वॉर के दौर से गुजर रही थी. भारत के सामने बाहरी सुरक्षा, पड़ोसी देशों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी कई चुनौतियां थीं. इसी दौरान काओ को एक बहुत सेंसिटीव इंटरनेशनल मामले की जांच सौंपी गई. वो भी एयर इंडिया के ‘कश्मीर प्रिंसेस’ विमान बम विस्फोट की जांच. इस मामले ने उन्हें इंटरनेशनल लेवल की खुफिया जांच से रूबरू कराया. इस जांच के दौरान उनका संपर्क चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री झोउ एनलाई से भी हुआ. यहीं से काओ के करियर में एक बड़ा बदलाव शुरू हुआ.

विदेशों में मिला एक्सपीरियंस

RAW बनाने से पहले काओ ने विदेशों में भी बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं. हांगकांग में उन्होंने चीन से जुड़े राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर रखने का काम किया. इसके बाद उन्होंने अफ्रीकी देश घाना में भी काम किया, जहां आजादी के बाद वहां की खुफिया व्यवस्था तैयार करने में उनकी भूमिका बताई जाती है. इन विदेशी एक्सपीरियंस ने काओ को ये समझने में मदद की कि किसी देश का बाहरी इंटेलिजेंस सिस्टम सिर्फ लिस्ट इकट्ठा करने के लिए ही नहीं होता. इसके लिए जमीन पर मजबूत नेटवर्क, भरोसेमंद सोर्स, तकनीकी क्षमता और लंबे समय की रणनीति जरूरी होती है. आगे चलकर यही अनुभव भारत के लिए बहुत काम आया.

Hanuman Ansh और Dhurandhar को हराकर Oscars 2027 की रेस में आगे निकली ये फिल्म

जब रखी गई RAW की नींव

भारत को अलग बाहरी खुफिया एजेंसी की जरूरत महसूस होने की सबसे बड़ी वजहों में 1962 का चीन-भारत युद्ध और 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध शामिल थे. उस समय इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी IB घरेलू और विदेशी दोनों तरह की खुफिया जिम्मेदारियां संभालता था. लेकिन युद्धों के दौरान सामने आई कमियों ने एक अलग बाहरी खुफिया एजेंसी की जरूरत को और मजबूत किया. 1968 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने RAW की स्थापना को मंजूरी दी. फिर RN काओ को इस नई एजेंसी को खड़ा करने की जिम्मेदारी दी गई. काओ ने शुरुआत बहुत ही सीमित संसाधनों के साथ की. RAW में शुरुआती दौर में करीब 250 चुने अधिकारियों की टीम थी. बाद में इनमें से कई अधिकारी ‘काओ बॉयज’ के नाम से फेमस हुए. काओ का जोर सिर्फ अधिकारियों की संख्या बढ़ाने पर नहीं था. वो ऐसी संस्था बनाना चाहते थे जहां प्राइवेसी, पेशेंस, विशेषज्ञता और लंबे टाइम की प्लानिंग सबसे जरूरी हों. तकनीकी खुफिया क्षमता को मजबूत करने के लिए उन्होंने एविएशन रिसर्च सेंटर की क्षमताओं का भी इस्तेमाल किया. इस तरह RAW के शुरुआती ढांचे में ह्यूमन इंटेलिजेंस और टेक्निकल इंटेलिजेंस दोनों को जगह मिली.

बांग्लादेश की आज़ादी

RN काओ की कहानी का सबसे फेमस चैप्टर 1971 का भारत और पाकिस्तान युद्ध है. लड़ाई शुरू होने से काफी पहले RAW ने तत्कालीन ईस्ट पाकिस्तान में अपना नेटवर्क मजबूत कर लिया था. वहां के मुक्ति आंदोलन यानी मुक्ति वाहिनी के साथ संपर्क और सहयोग के जरिए प्रशिक्षण, खुफिया जानकारी और लॉजिस्टिक हेल्प से जुड़े काम किए गए. इसका उद्देश्य सिर्फ सीमा पार गतिविधियों पर नजर रखना नहीं था, बल्कि जमीन पर मौजूद परिस्थितियों की सटीक जानकारी भारत तक पहुंचाना भी था. नवंबर 1971 में RAW के नेटवर्क से पाकिस्तान की हवाई कार्रवाई से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई. इस चेतावनी ने भारतीय पक्ष को तैयारी करने का टाइम दे दिया. इसके बाद जब 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ हवाई हमले शुरू किए, तब भारत पहले से काफी हद तक तैयार था. युद्ध के दौरान काओ ने सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ, प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पी.एन. हकसर और सीनियर खुफिया अधिकारियों के साथ मिलकर काम किया. ईस्ट पाकिस्तान से मिलने वाली खुफिया जानकारी ने सैन्य रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 13 दिनों के अंदर पाकिस्तान की सेना ने ढाका में आत्मसमर्पण कर दिया और बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश के रूप में सामने आया. इसी वजह से 1971 का दौर RAW और आरएन काओ के करियर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है. करण जौहर की आने वाली फिल्म में भी शायद इसी दौर को कहानी का सबसे अहम हिस्सा बनाया जाएगा.

OTT पर इस हफ्ते होगा फुल एंटरटेनमेंट! परिणीति से अनीत तक, ये स्टार्स ला रहे हैं नई फिल्में और सीरीज

सिक्किम में भी अहम भूमिका

RN काओ का काम सिर्फ पाकिस्तान या बांग्लादेश तक लिमिटेड नहीं था. सिक्किम से जुड़े संवेदनशील घटनाक्रम में भी उनकी भूमिका बताई जाती है. दरअसल, 1975 में सिक्किम भारत का 22वां राज्य बना. इससे पहले वहां राजनीतिक परिस्थितियां बहुत मुश्किल थीं. काओ की देखरेख में खुफिया गतिविधियों और राजनीतिक स्तर पर जानकारी जुटाने से जुड़े प्रयास किए गए. इस पूरे मामले में सैन्य ताकत के बजाय राजनीतिक परिस्थितियों को समझना, बातचीत और रणनीतिक योजना महत्वपूर्ण थी. यही वजह है कि सिक्किम से जुड़ा काओ का चैप्टर थोड़ा कम चर्चा में लेकिन अहम रहा.

NSG की कहानी में भी नाम

RN काओ की भूमिका आगे चलकर भारत की आतंकवाद-रोधी सुरक्षा व्यवस्था से भी जुड़ी. 1980 के दशक की शुरुआत में पंजाब में आतंकवाद और देश के सामने बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों ने एक ऐसी सुरक्षा इकाई की जरूरत महसूस कराई, जो होस्टेज रेस्क्यू, हाईजैक और हाई रिस्क काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन को संभाल सके. इंदिरा गांधी के सत्ता में लौटने के बाद काओ सीनियर एडवाइजर ऑन सिक्योरिटी अफेयर बने. उन्होंने एक हाई ट्रेंड रैपिड रिस्पॉन्स फोर्स की जरूरत पर जोर दिया. उनकी सिफारिशों और सुरक्षा संबंधी विचारों ने उस ढांचे को तैयार करने में भूमिका निभाई, जिसके बाद 1984 में नेशनल सिक्योरिटी गार्ड यानी NSG का गठन हुआ. बाद में NSG के ब्लैक कैट्स कमांडो भारत के सबसे खास काउंटर टेररिज्म और होस्टेज रेस्क्यू फोर्सेस में शामिल हुए.

बड़ी कहानी, पर लाइमलाइट से दूर

RN काओ की जिंदगी की सबसे दिलचस्प बात शायद यही है कि जिन घटनाओं में उनकी भूमिका बताई जाती है, वो भारतीय इतिहास और सुरक्षा व्यवस्था के लिए बहुत बड़ी हैं. हालांकि, काओ उतने ज्यादा फेमस नहीं हुए, जितने बड़े उन्होंने काम किए हैं. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी का बड़ा हिस्सा पर्दे के पीछे रहकर काम किया. उनका काम ही ऐसा था, जहां सफलता का मतलब कई बार यही होता था कि किसी को पता ही न चले कि पर्दे के पीछे किसने क्या किया. अब करीब चार दशक से ज्यादा समय बाद उनकी कहानी बड़े पर्दे पर आने वाली है. करण जौहर की फिल्म सिर्फ एक जासूस की कहानी नहीं होगी, बल्कि उस दौर की कहानी होगी जब भारत अपनी सुरक्षा व्यवस्था को नए सिरे से तैयार कर रहा था. एक पुलिस अधिकारी से लेकर प्रधानमंत्री के भरोसेमंद सिक्योरिटी ऑफिसर, फिर विदेशों में खुफिया एक्सपीरियंस और अंत में RAW के पहले चीफ बनने तक RN काओ का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस कहानी में कोई इमेजनरी सुपरहीरो नहीं है. यहां एक ऐसा ऑफिसर है जिसने बंदूक या कैमरे के सामने कम और रणनीति, जानकारी और सीक्रेट नेटवर्क के जरिए ज्यादा काम किया. अब देखना दिलचस्प होगा कि 11 अगस्त, 2028 को रिलीज होने वाली ये फिल्म RN काओ की इस गुमनाम लेकिन बड़ी विरासत को पर्दे पर किस तरह पेश करती है. अगर फिल्म उनकी जिंदगी के 1955 से 1971 वाले दौर को सेंटर में रखती है, तो दर्शकों को RAW की शुरुआत और 1971 के युद्ध के पीछे की उस दुनिया की झलक मिल सकती है, जिसे आम लोगों ने शायद ही कभी करीब से देखा हो.

‘खिचड़ी’ और ‘साराभाई’ का नया पता है Chumbak! पड़ोसी जब जिंदगी में घुसने लगें, तो शुरू होती है असली कॉमेडी

You may also like

Live Times logo

Feature Posts

Newsletter

@2026 Live Time. All Rights Reserved.

Are you sure want to unlock this post?
Unlock left : 0
Are you sure want to cancel subscription?