Gujarat News: कहा जाता है कि मां अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी समर्पित कर देती है. वह अपने सपनों का त्याग कर बच्चों के भविष्य को संवारने में कोई कसर नहीं छोड़ती. लेकिन जब वही मां जीवन के आखिरी पड़ाव में अकेली रह जाए और उसे वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़े, तो यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता और आत्ममंथन का विषय बन जाती है. लाइव टाइम्स की टीम जब अहमदाबाद के एक वृद्धाश्रम पहुंची, तो वहां हमारी मुलाकात राजस्थान के रतनगढ़ की रहने वाली शांतिबेन शर्मा से हुई.
बेटा दिल्ली के एक बैंक में है मैनेजर
शांतिबेन ने बताया कि उन्होंने बीएससी तक पढ़ाई की है. उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी है. बेटी की शादी कोलकाता में हुई है, जबकि बेटे राजीव शर्मा ने राजकोट में लव मैरिज की थी और वर्तमान में दिल्ली की एक बैंक में मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं. शांतिबेन ने अपने जीवन की ऐसी कहानी सुनाई, जिसे बताते हुए उनकी आंखें बार-बार नम हो गईं. शांतिबेन का आरोप है कि उनके पति के निधन के बाद, जब पूरा परिवार शोक में था और घर में उनके पति का पार्थिव शरीर रखा हुआ था, उसी दौरान उनके बेटे ने उनसे कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए.
बेटे ने घर के दस्तावेज किए अपने नाम
वृद्ध महिला का दावा किया है कि उनके पास मौजूद करीब 40 लाख रुपये, लगभग 20 तोला सोना, चांदी, मकान और जमीन से जुड़े दस्तावेज अपने कब्जे में लेकर वह अपनी पत्नी के साथ चला गया. शांतिबेन के अनुसार, इस घटना के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया. उनका कहना है कि जिस बेटे को उन्होंने पढ़ाया-लिखाया, बेहतर भविष्य दिया और जीवन में आगे बढ़ने के लिए हर संभव प्रयास किया. उसी बेटे ने उन्हें अकेला छोड़ दिया.
बेटी लेती रहती है मां का हालचाल
शांतिबेन ने यह भी कहा कि उनकी बेटी आज भी कोलकाता से नियमित रूप से फोन कर उनका हालचाल पूछती है. वह हर संभव भावनात्मक सहारा देने की कोशिश करती है. लेकिन उनके आरोप के मुताबिक, उनका बेटा राजीव शर्मा लंबे समय से न तो उनसे मिलने आया और न ही फोन कर उनका हाल पूछता है. उन्होंने कहा कि उन्हें संपत्ति या धन-दौलत से ज्यादा अपने बेटे का साथ और अपनापन चाहिए था. उनका कहना है कि आज उनकी सबसे बड़ी जरूरत पैसा नहीं, बल्कि परिवार का स्नेह और सम्मान है.
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अहमदाबाद के एक वृद्धाश्रम में रह रही है मां
शांतिबेन अहमदाबाद के एक वृद्धाश्रम में रह रही हैं. उनका कहना है कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि जिंदगी के इस पड़ाव पर उन्हें अपने ही परिवार से दूर रहना पड़ेगा. उनका दर्द सिर्फ उनका निजी दर्द नहीं है, बल्कि उन हजारों बुजुर्ग माता-पिता की पीड़ा का प्रतीक है, जो अपने ही बच्चों से उपेक्षा का सामना कर रहे हैं. यह मामला एक बड़ा सामाजिक सवाल भी खड़ा करता है. क्या आधुनिक जीवन की भागदौड़ में रिश्तों की अहमियत कम होती जा रही है?
मां त्याग कभी नहीं भुलाया जा सकता
क्या माता-पिता का त्याग और उनके संघर्ष को इतनी आसानी से भुलाया जा सकता है? क्या बुजुर्गों की सुरक्षा और सम्मान केवल कानूनों के भरोसे छोड़ा जा सकता है या समाज और परिवार की भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है? एक मां की आंखों में अपने बेटे के लिए आज भी उम्मीद दिखाई देती है. शायद यही ममता की सबसे बड़ी पहचान है. सवाल सिर्फ इतना है कि क्या यह बेटा कभी अपनी मां के पास लौटेगा, या फिर यह इंतजार यूं ही चलता रहेगा? यह फैसला समय करेगा, लेकिन फिलहाल अहमदाबाद के इस वृद्धाश्रम में रहने वाली शांतिबेन की कहानी हर उस व्यक्ति को सोचने पर मजबूर करती है, जो अपने माता-पिता के प्यार और त्याग को सामान्य बात मानकर भूल जाता है.
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