Mamata Banerjee’s Falling Empire: पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद से आज तक का, पिछला एक महीना ममता बनर्जी के लिए किसी भूकंप से कम नहीं रहा. उन्हें एक के बाद एक झटके लगते रहे. एक महीने में उनकी राजनीतिक ताकत घट कर आधी से भी कम हो गई. सबसे पहले तो 15 साल की सत्ता समाप्त हुई और आखिर में पार्टी टूट गई. BJP के हाथों पार्टी की करारी चुनावी हार ने राजनीतिक माहौल को पूरी तरह से बदल दिया. यह झटका तब और पर्सनल हो गया जब वह भवानीपुर से अपने कट्टर दुश्मन शुभेंदु अधिकारी से हार गईं, जो लंबे समय से उनका पॉलिटिकल किला माना जाता था. और आखिरी तूफान तब आया, जब उनकी पार्टी के दो-टुकड़े हो गए.
बुधवार को, TMC के बागी विधायकों के एक ग्रुप ने असेंबली स्पीकर रथिंद्र बोस को 58 MLA के समर्थन पत्र सौंपे, जिसमें निकाले गए नेता ऋतब्रत बनर्जी को अपने विधायक दल के नेता के तौर पर सपोर्ट किया गया. स्पीकर ऋतब्रत को विपक्ष के नेता के पद के लिए मंजूरी दे दी है. इस बड़े बदलाव से ठीक पहले दिल्ली में ऋतब्रत और शुभेंदु अधिकारी की दिल्ली में एक एक्सीडेंटल मीटिंग हुई थी और ठीक 13 दिन बाद उन्होंने टीएमसी की ‘ऋतु’ बदल दी. चलिए जानते हैं कि कैसे 13 दिनों में 28 साल पुरानी पार्टी में पहली फूट पड़ गई.
अभिषेक बनर्जी को लेकर पार्टी में गुस्सा
दिल्ली में एक एक्सीडेंटल मीटिंग, सिग्नेचर-जाली विवाद, ममता बनर्जी के भतीजे और सांसद अभिषेक बनर्जी को लेकर गुस्सा और उत्तराधिकार की लड़ाई- ये सब सिर्फ 13 दिनों में बहुत तेजी से हुआ और आखिर में टीएमसी के टुकड़ें हो गए. 4 मई को BJP के हाथों विधानसभआ चुनाव में हार के तुरंत बाद, पार्टी के कुछ हिस्सों में बेचैनी दिखने लगी, क्योंकि कुछ विधायकों को लगा कि पार्टी चीफ के भतीजे अभिषेक बनर्जी के ताकत बढ़ती जा रही है. 6 मई को नए चुने गए 80 विधायकों की एक मीटिंग में, ममता बनर्जी ने कथित तौर पर सभी विधायकों से कहा कि वे खड़े हों और कैंपेन में अभिषेक की भूमिका के लिए उनकी तारीफ करें. हालांकि यह उनके योगदान को पहचान देने के इरादे से किया गया था, लेकिन इस इशारे से विधायकों के एक हिस्से में सुगबुगाहट शुरू हो गई, जिन्हें लगा कि पार्टी तेजी से एक परिवार के आस-पास घूम रही है.

बंग भवन में सीएम शुभेंदु और ऋतब्रत की मुलाकात
सार्वजनिक संकेत 19 मई को सामने आए. एक और मीटिंग में, ऋतब्रत बनर्जी और MLA संदीपन साहा ने सवाल किया कि फाल्टा कैंडिडेट जहांगीर खान को दोबारा चुनाव से हटने की सार्वजनिक घोषणा के बावजूद क्यों नहीं निकाला गया. चूंकि जहांगीर को अभिषेक का करीबी माना जाता था, इसलिए इस आलोचना को बड़े पैमाने पर TMC के नेशनल जनरल सेक्रेटरी के लिए एक चुनौती के रूप में देखा गया. टर्निंग पॉइंट तीन दिन बाद आया, जब 22 मई को, ऋतब्रत अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद राज्यसभा की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए दिल्ली में थे. वे लंच के लिए बंग भवन पहुंचे. वहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हुई. इसके बाद, उन्होंने प्रशासनिक रिव्यू मीटिंग में विपक्षी विधायकों और सांसदों को बुलाने के सीएम के फैसले का सार्वजनिक रूप से स्वागत किया और इस कदम को एक स्वस्थ लोकतांत्रिक तरीका बताया. इस टिप्पणी ने तुरंत राजनीतिक हलकों में ध्यान खींचा.
फर्जी हस्ताक्षर पर गुस्साए विधायक
कुछ ही दिनों में TMC में एक अलग विवाद छिड़ गया. 25 मई को आरोप सामने आए कि विधायक दल के लीडरशिप स्ट्रक्चर के बारे में स्पीकर को सौंपे गए दस्तावेजों पर कई विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे. इस विवाद ने 27 मई को कानूनी रूप ले लिया जब ऋतब्रत और संदीपन ने फर्जीवाड़े का आरोप लगाते हुए स्पीकर से औपचारिक रूप से शिकायत की. इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने पुलिस से संपर्क किया, जिससे CID जांच शुरू हुई. जैसे ही जांचकर्ताओं ने अगले दो दिनों में विधायकों से पूछताछ शुरू की, यह विवाद एक प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे से राजनीतिक विवाद में बदल गया. यह सिग्नेचर विवाद नाराज विधायकों के लिए एक रैली पॉइंट बन गया, जिससे पूरे राज्य में जोरदार लॉबिंग और स्ट्रैटेजी मीटिंग्स शुरू हो गईं.
अभिषेक पर हुए हमले पर चुप रहा एक गुट
30 मई को यह संकट और गहरा गया जब सोनारपुर के दौरे के दौरान अभिषेक बनर्जी पर भीड़ ने हमला कर दिया. जहां राजनीतिक पार्टियों ने इस घटना की निंदा की, वहीं कई TMC नेताओं ने इस मामले पर चुप्पी साधी रखी, इसे लीडरशिप और चुने हुए प्रतिनिधियों के एक हिस्से के बीच बढ़ते अलगाव का सबूत माना. 31 मई तक, बगावत की तस्वीर साफ होने लगी. ममता बनर्जी द्वारा अपने कालीघाट घर पर बुलाई गई विधायकों की एक मीटिंग में कथित तौर पर कम लोग आए. ऋतब्रत और संदीपन भी इस मीटिंग में नहीं पहुंचे, जिससे लीडरशिप वह एकता नहीं दिखा पाई जिसकी उसे उम्मीद थी.

1 जून को निष्कासित हुए ऋतब्रत
1 जून को निर्णायक दरार आई. सीएम शुभेंदु के यह बताने के कुछ ही घंटों बाद कि ऋतब्रत और संदीपन की शिकायतों के आधार पर CID जांच शुरू कर दी गई है, TMC ने दोनों नेताओं को पार्टी से निकाल दिया. ममता बनर्जी के इस फैसले ने बगावत को और तेज कर दिया. निकाले गए नेताओं ने अभिषेक बनर्जी पर हमला तेज कर दिया, उन पर संगठन के अंदर पावर को सेंट्रलाइज करने का आरोप लगाया. बागी ग्रुप में, इस कैंपेन को जल्द ही एक नाम मिल गया “ऑपरेशन क्राउन प्रिंस”. ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन ने अपने साथ बागी विधायकों का गुट तैयार किया और पार्टी पर अपना असली हक पाने का फैसला किया. उन्होंने 2 जून को स्पीकर को संदेश भेजा कि असली टीएमसी उनकी है.
ऋतब्रत बने विपक्ष के नेता और टूट गई TMC
नतीजा बुधवार को सामने आया. 58 विधायकों के ग्रुप ने स्पीकर को एक समर्थन पत्र सौंपा, जिसमें ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी का लीडर चुना गया और अपने गुट के लिए असली टीएमसी का दावा किया गया. स्पीकर ने दावे को मान लिया और बागी गुट को TMC की ऑफिशियल लेजिस्लेचर विंग के तौर पर मान्यता दे दी. कुछ मिनट बाद, उन्हीं में से कई MLA राज्य सेक्रेटेरिएट नबन्ना में अधिकारी द्वारा बुलाई गई सरकारी रिव्यू मीटिंग में शामिल हुए. एक बगावत जो दिल्ली में शुरू हुई और धीरे-धीरे बढ़ती गई. टीएमसी के इस गुट ने विपक्ष के चार उपनेता प्रतिपक्ष बनाए हैं, जिनके नाम हैं जावेद अहमद खान, शबीना यास्मीन, शीलू शाह और संदीपन शाह. विधायक अखरुज्जमां TMC के चीफ व्हिप होंगे. बता दें, एंटी-डिफेक्शन लॉ के तहत, अलग हुए गुट को डिसक्वालिफिकेशन से बचने के लिए पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सपोर्ट की जरूरत होती है. तृणमूल के 80 विधायकों का दो-तिहाई हिस्सा 54 है और ऋतब्रत को इससे ज्यादा विधायकों को सपोर्ट मिल गया है.

‘ममता बनर्जी हमारी लीडर हैं’
ऋतब्रत बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हमारी लीडर ममता बनर्जी हैं और हम TMC से हैं. समाज में यह मजाक का विषय बन गया है कि TMC को विपक्ष का नेता (LOP) चुनना नहीं आता, इसलिए हम पार्टी को बचाने के लिए आगे आए हैं. हम अपनी लीडर ममता बनर्जी से अपील करते हैं कि वे इस पर अपनी सहमति दें. बनर्जी ने कहा कि ममता बनर्जी हमारी चीफ एडवाइजर हैं और हम उनसे अपील करते हैं कि वे हमें निर्देश देती रहें. ऋतब्रत ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी, तो हम बिलों का विरोध करेंगे, लेकिन सदन से कभी वॉकआउट नहीं करेंगे. उन्होंने आगे कहा कि हम न केवल सरकार का विरोध करेंगे, बल्कि सरकार के कुछ कंस्ट्रक्टिव कामों की तारीफ भी करेंगे.

ऋतब्रत ने ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर भी हमला किया. उन्होंने कहा कि अभिषेक बनर्जी असेंबली के मेंबर नहीं हैं. इसलिए, ऐसा व्यक्ति स्पीकर को लेटर नहीं लिख सकता जैसा कि किया गया. ऋतब्रत ने कहा कि वे सरकार से आग्रह करते हैं कि जिले में सत्ताधारी पार्टी के विधायक और विपक्ष के विधायकों के बीच एक मीटिंग ऑर्गनाइज कराई जाए.
क्या मुश्किल को मौके में बदल पाएंगी ममता बनर्जी
अब भी, नाराज खेमे ने ममता बनर्जी को ही पार्टी चेयरपर्सन माना है, जिससे पता चलता है कि बगावत मौजूदा लीडरशिप स्ट्रक्चर के खिलाफ ज्यादा है, खुद बनर्जी के खिलाफ उतनी नहीं. सीनियर TMC लीडर सौगत रॉय ने कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि बनर्जी मौजूदा संकट से उबर जाएंगी, क्योंकि उनका फाइटर के तौर पर ट्रैक रिकॉर्ड रहा है. उन्होंने कहा, “पॉलिटिकल लाइफ में ऐसे संकट के दौर टेम्पररी होते हैं.” पॉलिटिकल जानकारों का कहना है कि बनर्जी अब ऐसी चुनौती का सामना कर रही हैं, जिसका सामना उन्होंने लगभग तीन दशकों के पब्लिक जीवन में कभी नहीं किया. जानकारों का मानना है कि मुख्य सवाल यह है कि क्या बनर्जी एक बार फिर मुश्किल को मौके में बदल सकती हैं. अगर वह खुद को पॉलिटिकल इंजीनियरिंग का शिकार दिखाने में कामयाब हो जाती हैं, तो पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच उनका रुतबा बना रह सकता है. अगर वह नाकाम रहती हैं, तो यह संकट बंगाल में लेफ्ट फ्रंट के पतन के बाद से देखे गए सबसे बड़े पॉलिटिकल उलटफेर की शुरुआत हो सकती है.
ममता बनर्जी के साथ हो गया खेला! ऋतब्रत होंगे नेता विपक्ष, 60 MLA के गुट को स्पीकर की मंजूरी
News Source: PTI
