Home Latest News & Updates राहुल का हमला, भागवत का कवच, बालाघाट बना नया सियासी अखाड़ा, 6 अक्टूबर को जाएंगे RSS चीफ

राहुल का हमला, भागवत का कवच, बालाघाट बना नया सियासी अखाड़ा, 6 अक्टूबर को जाएंगे RSS चीफ

by Nitin Thakur 3 October 2026, 11:35 AM IST
3 October 2026, 11:35 AM IST
Mohan Bhagwat Balaghat Visit

Mohan Bhagwat Balaghat Visit: मध्यप्रदेश की राजनीति में जब भी आदिवासियों की बात होती थी, तो निगाहें झाबुआ और अलीराजपुर की तरफ उठती थीं, लेकिन अब मध्य प्रदेश का सियासी पावर सेंटर 400 किलोमीटर दूर खिसक चुका है, नया ठिकाना है बालाघाट. वही बालाघाट जो कभी घने जंगलों और लाल गलियारे (नक्सल प्रभावित क्षेत्र) के लिए जाना जाता था. आज देश के दो सबसे बड़े ध्रूवों का ठिकाना बन गया है. पहले राहुल गांधी का दौरा और अब 6 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की एंट्री. आखिर आदिवासियों की इस धरती पर ऐसा क्या पका रहा है.

मासूमों की मौत से गरमाया मध्य प्रदेश का सियासी पारा

कहते हैं सियासत में जब कोई इलाका अचानक चर्चा में आए तो उसके पीछे कोई गहरा दर्द होता है. बालाघाट में मासूम आदिवासी बच्चों की बीमारियों से हुई मौतों ने पूरे देश को सन्न कर दिया. विपक्ष ने इसे सीधे प्रशासनिक संवेदनहीनता का नाम दिया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी खुद बालाघाट पहुंचे, पीडि़त परिवारों के आंसू पोंछे और सीधे सरकार की घेराबंदी कर दी. राहुल का मैसेज साफ था अधिकारों और बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर सिस्टम पूरी तरह नाकाम रहा है. इस दौरे ने सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी. राहुल के इस हमले के ठीक बाद… अब संघ का सबसे बड़ा चेहरा मैदान में है. 6 अक्टूबर को सरसंघचालक मोहन भागवत बालाघाट के लांजी ब्लॉक स्थित कारंजा पहुंच रहे हैं.

आदिवासियों के बीच जाएंगे भागवत

बता दें कारंजा कोई आम गांव नहीं है. यह दशकों से वनवासी कल्याण आश्रम के जरिए संघ की जमीनी प्रयोगशाला रहा है. भागवत का यह दौरा सिर्फ एक सामान्य कार्यक्रम नहीं है. संघ प्रमुख यहां सीधे आदिवासी, वनवासी और जनजातीय समूहों के बीच बैठेंगे, उनके साथ संवाद करेंगे और आरएसएस के सामाजिक सेवा तंत्र को नई धार देंगे. राजनीतिक पंडित इसे राहुल गांधी के सियासी नैरेटिव की काट के तौर पर देख रहे हैं. संघ का जोर इस बात पर है कि आदिवासियों के बीच सेवा और संस्कारों की डोर को और मजबूत किया जाए.

47 आरक्षित सीटें और 2028 की तैयारी

बता दें मध्यप्रदेश में सत्ता की कुर्सी का रास्ता 47 आदिवासी सीटों से होकर गुजरता है. जिस पार्टी के साथ आदिवासी वोट बैंक खड़ा हुआ, भोपाल के वल्लभ भवन की चाबी उसी को मिलती है. एक तरफ राहुल गांधी आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों की बात कर आक्रामक राजनीतिक गोलबंदी में जुटे हैं. दूसरी तरफ मोहन भागवत और संघ वनवासी कल्याण आश्रम के जरिए सेवा, स्वास्थ्य, शिक्षा और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर गहरी सामाजिक पैठ बना रहे हैं. बालाघाट की यह जंग अब सिर्फ दो नेताओं या दो दौरों तक सीमित नहीं है. यह अधिकार बनाम सेवा के उस दोहरे मॉडल की जंग है, जो 2028 के विधानसभा चुनाव तक मध्य प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करेगी.

मासूम बच्चों की मौतों से उपजा आक्रोश…प्रशासनिक लापरवाही का दाग… और उस पर राहुल गांधी व मोहन भागवत का यह भारी-भरकम जमावड़ा. देखना दिलचस्प होगा कि क्या दिग्गज नेताओं की इस आवाजाही से बालाघाट के आदिवासियों की जिंदगी में वाकई कोई बदलाव आएगा या फिर बालाघाट सिर्फ दौरों का शहर बनकर रह जाएगा.

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