Shankaracharya Avimukteshwaranand: मौनी अमावस्या के दिन विवाद के बाद माघ मेला प्रशासन ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजकर सवाल उठाया था, अब शंकराचार्य ने भी प्रशासन को जवाब दिया है.
21 January, 2026
मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान पर छिड़ा विवाद अब कानूनी नोटिस तक पहुंच गया है. माघ मेला प्रशासन ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजकर उनकी उपाधि पर सवाल उठाए हैं. माघ मेला प्रशासन की तरफ से शंकराचार्य उपाधि पर इस्तेमाल करने पर मिले नोटिस के जवाब में शंकराचार्य के वकील ने माघ मेला प्रशासन को भी 8 पन्नों का नोटिस भेजकर जवाब दिया है.
कैसे शुरू हुआ विवाद
रविवार को तब विवाद शुरू हुआ जब शंकराचार्य सरस्वती अपने समर्थकों के साथ मौनी अमावस्या के मौके पर संगम में डुबकी लगाने जा रहे थे और पुलिस ने कथित तौर पर उन्हें रोक दिया. घटना के बाद, शंकराचार्य अपने कैंप के बाहर खाना-पानी छोड़कर प्रोटेस्ट पर बैठ गए और मेला एडमिनिस्ट्रेशन और पुलिस के सीनियर अधिकारियों से माफी मांगने की मांग की. उनका प्रदर्शन अभी भी जारी है. इसके बाद मेला प्रशासन ने सोमवार को शंकराचार्य को एक नोटिस जारी करके पूछा कि वह खुद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य कैसे बता रहे हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर है कि अपील के निपटारे तक किसी भी धार्मिक नेता को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य नहीं बनाया जा सकता. शंकराचार्य ने मेला प्रशासन के नोटिस का जवाब मंगलवार को ईमेल से भेजा और उसमें पूछा कि वह सुप्रीम कोर्ट के अधूरे ऑर्डर का हवाला क्यों दे रहा है.
वकील ने दिया जवाब
शंकराचार्य के वकील ने जवाब में कहा कि स्वर्गीय शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अपने जीवनकाल में ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का 11 सितंबर, 2022 को निधन के अगले दिन, 12 सितंबर, 2022 को वैदिक रीति-रिवाजों के साथ औपचारिक रूप से अभिषेक किया गया था. इसका ज़िक्र सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर, 2022 के आदेश में भी है. जवाब में यह भी कहा गया है कि शंकराचार्य पद को लेकर किसी भी कोर्ट से कोई स्टे ऑर्डर नहीं है. श्रृंगेरी, द्वारका और पुरी पीठों के शंकराचार्यों के समर्थन का भी दावा किया गया है. इसके अलावा, स्वर्गीय स्वरूपानंद सरस्वती की रजिस्टर्ड वसीयत को वैध घोषित किया गया है, जिसमें कहा गया है कि गुजरात हाई कोर्ट ने वसीयत को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी.
वकील ने आरोप लगाया कि 19 जनवरी की आधी रात के बाद, मेला अथॉरिटी के अधिकारियों और पुलिस ने उनके क्लाइंट (शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती) के माघ मेला कैंप के गेट पर एक नोटिस चिपका दिया, जब वह सो रहे थे. जवाब में दावा किया गया है कि नोटिस गलत इरादे से जारी किया गया था, जिसका मकसद शंकराचार्य को बदनाम करना और सनातन धर्म के मानने वालों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना था. जवाब में कहा गया है कि नोटिस से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की सामाजिक, आर्थिक और इज्ज़त को नुकसान पहुंचा है. वकील ने मेला प्रशासन के लेटर को सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग एक केस में दखल बताया, जो कोर्ट की अवमानना के बराबर है. वकील ने चेतावनी दी कि अगर मेला अथॉरिटी 24 घंटे के अंदर नोटिस वापस नहीं लेती है, तो उनके क्लाइंट कोर्ट की अवमानना समेत ज़रूरी कानूनी कार्रवाई शुरू करेंगे.
मौनी अमावस्या के बाद उठाया उपाधि पर सवाल
सरस्वती ने दावा किया कि कि महाकुंभ प्रयागराज 2025 में उनकी तस्वीर पर ‘जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर’ लिखा था, जबकि मेला प्रशासन अब उनके टाइटल के इस्तेमाल पर सवाल उठा रहा है. सरस्वती मेला प्रशासन की आलोचना तब से कर रहे हैं जब कथित तौर पर पुलिस और अधिकारियों ने उन्हें रविवार को माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या पर पवित्र डुबकी लगाने से रोक दिया था.
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