SC-ST Case Relief Funds: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पीड़ितों को मिलने वाली आर्थिक राहत राशि को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने जहां वास्तविक पीड़ितों को समय से राहत देने पर जोर दिया, वहीं योजना के संभावित दुरुपयोग को गंभीरता से लेते हुए पूरे उत्तर प्रदेश में निगरानी और जांच की व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए हैं.
यह आदेश न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने झांसी निवासी अरविंद कुमार व दो अन्य तथा संतोष कुमार धोहरे की आपराधिक अपीलों की सुनवाई करते हुए दिया. दोनों अपीलें झांसी की विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) अदालत के 23 जुलाई 2024 के फैसले के खिलाफ दाखिल की गई थीं.
समय पर नहीं मिली राहत राशि
मामले में अपीलकर्ताओं का कहना था कि विवेचक ने प्रत्येक पीड़ित को दो लाख रुपये राहत राशि दिए जाने का प्रस्ताव भेजा था. नियमों के मुताबिक चार्जशीट दाखिल होने तक 75 प्रतिशत यानी 1.50 लाख रुपये जारी होने थे, लेकिन जिला समाज कल्याण अधिकारी, झांसी ने केवल 37.5 प्रतिशत यानी 75 हजार रुपये ही जारी किए. बकाया राशि के लिए दिए गए प्रत्यावेदनों के बावजूद भुगतान नहीं हुआ. इसके बाद विशेष अदालत में आवेदन किया गया, जिसे खारिज कर दिया गया. हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत ने नियम 12(7) की व्याख्या में गलती की है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशेष अदालत केवल औपचारिक संस्था नहीं है, बल्कि वह यह जांच सकती है कि पीड़ित को समय पर और पर्याप्त राहत मिली या नहीं. जरूरत पड़ने पर बकाया राशि के भुगतान का आदेश भी दिया जा सकता है.
तीन महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि संतोष कुमार धोहरे, जो स्वयं अधिवक्ता हैं और उनके परिवार के सदस्यों को विभिन्न आपराधिक मामलों में अब तक कुल 23.36 लाख रुपये की राहत राशि मिल चुकी है. करीब 10 से 12 अन्य मामले जिला स्तरीय समिति के समक्ष लंबित होने की जानकारी भी दी गई. कोर्ट ने कहा कि केवल बार-बार मुकदमे दर्ज होना दुरुपयोग का प्रमाण नहीं है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में मामलों और राहत राशि के पैटर्न की अनदेखी भी नहीं की जा सकती. इसे जांच योग्य मामला माना गया.
कोर्ट ने झांसी के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को तीन महीने के भीतर निष्पक्ष जांच पूरी करने का निर्देश दिया है. जांच में योजना के दुरुपयोग की पुष्टि होने पर दोषी व्यक्तियों के साथ जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जाएगी. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पूरे प्रदेश में एससी/एसटी एक्ट के तहत बार-बार राहत राशि का दावा करने वाले मामलों की व्यापक जांच और प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित करने के निर्देश दिए हैं. सभी जिलों के विशेष न्यायाधीशों को सतर्क रहने को कहा गया है, ताकि राहत योजना का लाभ वास्तविक पीड़ितों तक पहुंच सके.
पूरे यूपी में होगी जांच
झांसी की विशेष अदालत को दोनों मामलों में छह सप्ताह के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने का आदेश दिया गया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश संतोष कुमार धोहरे या अन्य पीड़ितों के दावों के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं है. हाईकोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट के तहत राहत योजना वास्तविक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कल्याणकारी प्रावधान है. इसकी पवित्रता बनाए रखना जरूरी है और सरकारी धन हासिल करने के लिए इसके दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. रजिस्ट्रार जनरल को फैसले की प्रति दस दिनों के भीतर प्रदेश के सभी जिलों के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डीएम, एसएसपी/एसपी, पुलिस आयुक्त, विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) समेत मुख्य सचिव और संबंधित विभागों के प्रमुख सचिवों को भेजने का निर्देश दिया गया है.
-प्रयागराज से विकास मिश्र की रिपोर्ट
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