Chhath Puja Rituals Importance: छठ व्रत में नहाय-खाय से लेकर अंतिम दिन के अर्घ्य तक, हर दिन का अलग महत्व और नियम है. इस लेख में विस्तार से जानें.
24, October 2025
Chhath Puja Rituals Importance: बिहार महापर्व की शुरूआत कल, 25 अक्तूबर से हो जाएगी. छठ व्रत को सनातन धर्म में सबसे कठिन माना जाता है, क्योंकि यह निर्जला व्रत चार दिनों तक चलता है. छठ यूपी और बिहारवासियों के लिए केवल एक पर्व नहीं बल्कि उनकी पहचान है और उनका गौरव है. सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित यह पर्व बिहार और यूपी में बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है. देश के अलग-अलग कोनों में रहने वाले बिहारी इस समय अपने गांव लौट जाते हैं. बहुत कम लोगों को पता है कि छठ महापर्व की विधियां किस तरह से होती हैं. इस लेख में हम आपको नहाय-खाय से लेकर अंतिम दिन के अर्घ्य तक, हर दिन के नियम और उनके महत्व के बारे में बताएंगे.
नहाय-खाय से शुरू होता छठ (25 अक्तूबर)

छठ का पहला दिन नहाय- खाय का होता है. इस दिन व्रती महिलाएं और पुरूष सूर्योदय से पहले उठते हैं. गंगा या फिर यमुना में स्नान करते हैं और सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं. पूरे घर और रसोई को साफ करके सात्विक भोजन बनाया जाता है. नहाय खाय के दिन चने की दाल, चावल और लौकी या कद्दू की सब्जी का प्रसाद बनाया जाता है. इसमें लहसुन और प्याज का इस्तेमाल करना वर्जित है और सेंधा नमक का इस्तेमाल किया जाता है. व्रती छठी मैया का पूजन करते हैं. इसके बाद भोजन को ग्रहण करते हुए छठ व्रत करने का संकल्प लेते हैं. इसी के साथ छठ व्रत की शुरूआत हो जाती है.
खरना पर बनता है खीर का प्रसाद ( 26 अक्तूबर)

नहाय-खाय के अगले दिन खरना होता है. नहाय खाय पर सात्विक भोजन करने वाले व्रती इस दिन निर्जला व्रत रखते हैं. इस दिन शाम के समय छठी मैया और सूर्यदेव की पूजा की जाती है. शाम के समय गुड़ और चावल की खीर और रोटी का प्रसाद बनता है. यह खीर आम की लकड़ी जलाकर चूल्हे पर बनाई जाती है. पूजा के समय केले के पत्ते पर सिंदूर, फल खीर और रोटी का प्रसाद छठी मैया को चढ़ाया जाता है. व्रती अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए पूजा करते हैं. इसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और बांटते हैं.
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संध्या अर्घ्य पर घाट जाते हैं व्रती (27 अक्तूबर)

संध्या अर्घ्य का तीसरा दिन बेहद खास होता है. तीसरे दिन भी व्रती पूरा दिन अन्न-जल ग्रहण नहीं करते. इस दिन ठेकुआ का विशेष प्रसाद बनाया जाता है. शाम के समय व्रती सूर्य को अर्घ्य देने के लिए गंगा या यमुना घाट पर जाते हैं. घाट पर ठेकुआ, फल, गन्ना, नारियल और कई प्रकार के फलों का प्रसाद सूर्यदेव और छठी मैया को चढ़ाया जाता है. व्रती पानी में खड़े होकर सूप और बांस की टोकरी में सूर्यदेव को प्रसाद चढ़ाते हैं और सूरज की अंतिम किरण को जल और दूध का अर्घ्य देते हैं. डूबते हुए सूरज को अर्घ्य देने का मतलब है जीवन के सभी उतार-चढ़ाव को स्वीकार करना. जिस प्रकार सूरज हर दिन उगता और डूबता है, उसी प्रकार जीवन में सुख और दुख आते-जाते रहते हैं.
उषा अर्घ्य के साथ संपन्न होता है छठ व्रत (28 अक्तूबर)

छठ का चौथा और अंतिम दिन उषा अर्घ्य का है. संध्या अर्घ्य की अगली सुबह व्रती सभी प्रकार के प्रसाद लेकर उसी स्थान पर दोबारा पहुंचते हैं और पानी में खड़े होकर सूरज की पहली किरण का इंतजार करते हैं. इसके बाद उगते हुए सूरज को भी प्रसाद चढ़ाया जाता है और जल-दूध का अर्घ्य दिया जाता है. उगते हुए सूरज का अर्घ्य देने का मतलब है जीवन में नई शुरूआत का स्वागत करना. सूर्य की रोशनी से नई ऊर्जा ग्रहण कर व्रती अपने परिवार के स्वास्थ्य और सफलता के लिए भगवान को धन्यवाद करते हैं. इसके बाद व्रती प्रसाद खाकर व्रत का पारण करते हैं. इसी के साथ छठ व्रत का समापन होता है.
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