Home Latest News & Updates मूर्ति में धड़कता है श्रीकृष्ण का दिल! बिना हाथ-पैरों के क्यों बनती है प्रतिमा, जानें जगन्नाथ प्रभु की पौराणिक कथा

मूर्ति में धड़कता है श्रीकृष्ण का दिल! बिना हाथ-पैरों के क्यों बनती है प्रतिमा, जानें जगन्नाथ प्रभु की पौराणिक कथा

by Neha Singh 16 July 2026, 4:04 PM IST (Updated 16 July 2026, 4:12 PM IST)
16 July 2026, 4:04 PM IST (Updated 16 July 2026, 4:12 PM IST)
Lord Jagannath Story

Lord Jagannath Story: ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ महाप्रभु का मंदिर पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. हर साल होने वाली रथयात्रा में यहां विदेशों से भी भक्त आते हैं. इस साल रथ यात्रा की शुरुआत 16 जुलाई यानी आज से हो गई है और 27 जुलाई को यह खत्म होगी. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को पुरी के श्री जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ अपने मुख्य मंदिर से मौसी के घर के लिए प्रस्थान करते हैं, जिसके लिए भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है. ओडिशा के पुरी में होने वाले इस पवित्र त्योहार में लाखों भक्त भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन करने आते हैं. तीनों के शानदार रथ भक्तों के लिए खास आकर्षण होते हैं.

यात्रा के लिए हर साल नए रथ बनाए जाते हैं और इसकी तैयारी काफी पहले से शुरू हो जाती है. जगन्नाथ महाप्रभु मंदिर के अपने कई रहस्य हैं. यहां पर भगवान की प्रतिमाओं को बदला जाता है और यह देखने में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा से काफी अलग होती हैं. आज भी कई लोगों को भगवान जगन्नाथ के धरती पर अवतरित होने की पौराणिक कथा के बारे में नहीं पता. साथ ही जानेंगे कि मंदिर से जुड़े अन्य रहस्य क्या हैं.

मौसी के घर जाते हैं महाप्रभु

रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े रथ नंदीघोष पर सवार होते हैं, जबकि उनके भाई बलभद्र ‘तालध्वज’ पर और बहन सुभद्रा ‘दर्पदलन’ रथ पर बैठती हैं. इसके बाद भक्त रथों को मोटी रस्सियों से खींचकर गुंडिचा मंदिर ले जाएंगे. इस दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है.

भगवान जगन्नाथ अपने मुख्य मंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर, अपनी मौसी के घर जाते हैं. जगन्नाथ मंदिर और गुंडिचा मंदिर के बीच कुल दूरी लगभग 3 किलोमीटर है. तीनों देवता लगभग 9 दिन गुंडिचा मंदिर में रुकते हैं. अपनी मौसी के घर पर विश्राम करने के बाद, वे अपने मुख्य जगन्नाथ मंदिर लौट आते हैं. इस वापसी यात्रा को ‘बहुदा यात्रा’ कहा जाता है. वापस आते समय, तीनों रथ ‘मौसी मां मंदिर’ पर थोड़ी देर रुकते हैं. यहां, भगवान को उनका पसंदीदा ‘पोड़ा पीठा’ को भोग लगाया जाता है. लाखों भक्त रथ की रस्सी छूने मात्र के लिए पुरी आते हैं. रस्सी खींचना भक्तों की सेवा का प्रतीक है. माना जाता है कि जो श्रद्धालु सच्चे भाव से रथ की रस्सी को खींचता है, उसके कई जन्मों के पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.

भगवान के दर्शन के लिए राजा ने छोड़ा अन्न-जल

जगन्नाथ प्रभु के धरती पर अवतरित होने की कथा बहुत ही रोचक है. मान्यता के अनुसार, जगन्नाथ भगवान पहले ओडिशा के घने जंगलों में कबीलाई आदिवासियों द्वारा गुप्त रूप से पूजे जाते थे, बाद में राजा ने उनकी लकड़ी की मूर्ति बनवाई.

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नीलांचल पर्वत पर भगवान विष्णु ‘नीलमाधव’ के रूप में निवास करते थे. भगवान के इस रूप के बारे में केवल वहां के आदिवासी जानते थे. कबीले के मुखिया विश्ववसु गुप्त रूप उनकी पूजा करते थे और किसी भी बाहरी व्यक्ति को वहां जानें नहीं देते थे. मालव देश के राजा इंद्रद्युम विष्णु भक्त थे. जब उन्हें नीलमाधव के बारे में पता चला, तो उन्होंने मुख्य पुजारी के भाई विद्यापति को उनकी खोज करने के लिए भेजा. विद्यापति ने विश्ववसु का विश्वास जीतने के लिए उनकी बेटी से शादी कर ली. अपनी पत्नी से जरिए उन्होंने विश्ववसु से कहा कि उन्हें नीलमाधव से दर्शन कराएं. इसके बाद विश्ववसु विद्यापति को दर्शन कराने के लिए गुफा ले गए, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि गुफा के बारे में किसी को भी पता चले, इसलिए उन्होंने विद्यापति की आंखों पर पट्टी बांध दी ताकि वे रास्ता न देख सकें. लेकिन विद्यापति बहुत चालाक थे. उन्होंने रास्ते में सरसों के बीज गिरा दिए. बारिश के बाद जब बीजों से पौधे उगे, तो उन्हें गुफा का रास्ता मिल गया.

विद्यापति ने राजा को जाकर गुफा और नीलमाधव भगवान के बारे में बता दिया. जब राजा इंद्रद्युम अपनी सेना को लेकर गुफा पहुंचे तो भगवान वहां से अंतर्ध्यान हो गए यानी गायब हो गए. राजा इससे बहुत दुखी हुए. उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया. इसके बाद भगवान जगन्नाथ राजा के सपने में आकर कहा कि “हे राजन! इस युग में मैं कलि काल के उद्धार के लिए काष्ठ (लकड़ी) के रूप में पुनः अवतरित होऊंगा.”

समुद्र से आया लकड़ी का टुकड़ा

एक दिन राजा समुद्र के तट पर टहल रहे थे, उसी दौरान वहां एक बड़ा सुगंधित लकड़ी का टुकड़ा तैरता हुआ आया, जिस पर शंख, चक्र, गदा और पद्म जैसे चिन्ह बने हुए थे. उसे देखते ही राजा को भगवान का वादा याद आ गया. इस पवित्र लकड़ी का ‘दारू ब्रह्म’ कहा गया. जब समुद्र से उस बड़े लट्ठे को निकालकर मंदिर लाने की कोशिश की गई, तो राजा के सबसे ताकतवर सैनिक और सबसे बड़े हाथी भी उसे हिला नहीं पाए. भगवान ने फिर से राजा को सपने में इशारा दिया. बाद में विश्ववसु और राजा के मुख्य पुजारी विद्यापति ने लट्ठे को छुआ, तो उसे आसानी से रथ पर रख दिया गया.

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लट्ठा मंदिर परिसर में आ गया. जब राज्य के सबसे काबिल मूर्तिकार ने उससे मूर्ति बनाना चाहा तो और उनके औजार उसे तराशने में नाकाम रहे. औजार उसे छूते ही टूट जाते. राजा परेशान हो गए. माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा खुद एक बूढ़े और कमजोर मूर्तिकार के भेष में राजा के दरबार में आए. उन्होंने राजा से कहा कि वह इस दिव्य लट्ठे से मूर्तियां बना सकते हैं, लेकिन एक सख्त शर्त के साथ.

राजा ने नहीं मानी मूर्तिकार की शर्त

विश्वकर्मा ने राजा के सामने शर्त रखी कि वे बंद कमरे में 21 दिनों तक मूर्तियां बनाएंगे और जब तक काम पूरा नहीं हो जाता तब तक कोई भी कमरे में प्रवेश नहीं करेगा. उस समय राजा ने शर्त मान ली. कमरे के अंदर कई दिनों तक लकड़ी तराशने की आवाजें आती रहीं. लेकिन 14-15 दिनों के बाद कमरे के अंदर से आवाज आना अचानक पूरी तरह बंद हो गई. राजा और उनकी रानी घबरा गए. उन्हें लगा कि बूढ़ा मूर्तिकार शायद भूख-प्यास से मर गया होगा. उन्होंने घबराहट में अपनी शर्त तोड़ दी और दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खुलते ही विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और वहां तीन अधूरी मूर्तियां रखी हुई थीं. भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा की अधूरी मूर्तियां बनी हुई थी, लेकिन उनके हाथ और पैर नहीं थे.

बड़ी आंखों का मतलब

राजा अपनी इस गलती पर बहुत दुखी हुए और पश्चाताप करने लगे. राजा को दुखी देख भगवान विष्णु ने आकाशवाणी की और कहा “हे राजन! दुखी मत हो. यह मेरी ही इच्छा थी. मैं इसी रूप में पृथ्वी पर निवास करना चाहता हूं. मेरे इस रूप को ‘महाबाहु’ कहा जाएगा.” इसके बाद राजा इंद्रद्युम ने उन्हीं अधूरी मूर्तियों को मंदिर में स्थापित कर दिया और उनकी पूजा होने लगी. उनके महाबाहू रूप का गहरा आध्यात्मिक संदेश है. इसका मतलब है कि बिना पैरों के भी भगवान सृष्टि का संचालन करते हैं और बिना हाथों के भी भक्तों का चढ़ाया हुआ प्रसाद ग्रहण करते हैं. भगवान की बड़ी गोल आंखे यह दिखाती हैं कि वे हर समय अपने भक्तों पर समान रूप नजर रखते हैं.

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श्री कृष्ण का दिल आज भी धड़कता है

पुरानी मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग के अंत में, जब भगवान श्री कृष्ण ने अपना मनुष्य जीवन खत्म किया और पांडवों ने उनके शरीर का अंतिम संस्कार किया, तो उनका पूरा शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन उनका दिल जलती हुई चिता पर धड़कता रहा. पांडवों ने श्री कृष्ण के दिल को लकड़ी के एक बड़े टुकड़े में रखकर समुद्र में बहा दिया. लकड़ी का यह पवित्र टुकड़ा, जो सदियों से तैर रहा. यह पुरी के समुद्र तट पर आकर राजा इंद्रद्युम्न को मिला. बाद में विश्वकर्मा ने इसी से मूर्तियां बनाई और दिल को उसमें स्थापित कर दिया. भगवान के दिल को “ब्रह्म तत्व” के नाम से जाना जाता है.

नवकलेवर परंपरा

बता दें, जगन्नाथ पुरी में हर 8, 12 या 19 साल में (जब आषाढ़ मास में अधिकमास आता है) मूर्तियों को बदला जाता है. नीम की लकड़ी से नई मूर्तियां बनाई जाती हैं. नवकलेवर के दौरान आधी रात को पूरे पुरी शहर की बिजली काट दी जाती है. मंदिर में पूरी तरह अंधेरा होता है. मंदिर के चारों ओर सिक्योरिटी फोर्स तैनात रहते हैं ताकि कोई अंदर न झांक सके. मूर्ति बदलने वाले दैतापति सेवकों की आंखों पर मोटे कपड़े की पट्टी बांधी जाती है. आंखों पर पट्टी होने की वजह से, वह “ब्रह्म तत्व” को नहीं देख पाते. हालांकि, जब वह इसे अपने हाथों में पकड़ते हैं तो उन्हें धड़कन महसूस होती है, जैसे किसी जिंदा धड़कते दिल को पकड़ने पर महसूस होता है.

ध्वज का रहस्य

जगन्नाथ मंदिर के रहस्यों में से एक यह है कि यहां का दिव्य झंडा हमेशा हवा की उल्टी दिशा में लहराता है। मंदिर का यह विशाल झंडा हर दिन बदला जाता रहा है. परंपरा के अनुसार, चुनारा समुदाय के खास सेवक ही इस झंडे को बदलने के लिए 214 फुट ऊंचे मुख्य गुंबद पर चढ़ते हैं. वे हमेशा उल्टे पैर मुंह करके गुंबद पर चढ़ते हैं, जो अपने आप में बहुत खतरनाक काम है. इसके अलावा दिन के किसी भी समय, चाहे सूरज कितना भी तेज क्यों न हो, मंदिर के इस मुख्य गुंबद और इसके ऊपर लहराते झंडे की परछाई कभी जमीन पर नहीं पड़ती.

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