Ikkis Real Story: अगस्त्य नंदा की नई फिल्म ‘इक्कीस’ को लोग काफी पसंद कर रहे हैं. इस फिल्म में उन्होंने सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल का रोल किया है. आज आपके लिए उसी रीयल हीरो की असली स्टोरी लाए हैं.
07 January, 2026
Ikkis Real Story: बॉलीवुड में इन दिनों एक के बाद एक देशभक्ति फिल्में रिलीज़ हो रही हैं. हालांकि, लेकिन 1 जनवरी, 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म ‘इक्कीस’ (Ikkis) ऑडियन्स के दिलों को एक अलग ही अंदाज में छू रही है. श्रीराम राघवन के डायरेक्शन में बनी ये फिल्म वीरता और शहादत की एक इमोशनल कहानी है. इस फिल्म में अमिताभ बच्चन के नातिन अगस्त्य नंदा ने सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल का रोल किया है. वहीं, दिवंगत स्टार धर्मेंद्र उनके पिता के कैरेक्टर में हैं. ये धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म भी है. आज हम 21 साल के उस नौजवान की असली कहानी लेकर आए हैं, जिसने 1971 की वॉर में इतिहास लिख दिया था.

शानदार शुरुआत
अरुण खेत्रपाल 14 अक्तूबर, 1950 को पुणे की एक मिलिट्री फैमिली में पैदा हुए थे. उनके परिवार की कई पीढ़ियां सेना में सर्विस दे चुकी थीं. अरुण के परदादा सिख खालसा सेना में थे, जिन्होंने पहली वर्ल्ड वॉर लड़ी थी. उनके पिता एम.एल. खेत्रपाल भारतीय सेना के इंजीनियर्स कोर में ब्रिगेडियर थे. अरुण की शुरुआती पढ़ाई हिमाचल प्रदेश के फेमस लॉरेंस स्कूल, सनावर में हुई. वो न सिर्फ पढ़ाई में टॉपर थे, बल्कि स्पोर्ट्स में भी माहिर थे. साल 1967 में उन्होंने NDA ज्वाइन किया और स्क्वाड्रन कैडेट कैप्टन बने. 13 जून, 1971 को उन्हें भारतीय सेना की 17 पूना हॉर्स रेजिमेंट में कमीशन मिला. ये रेजिमेंट अपनी ब्रेवरी के लिए पहले से ही फेमस थी.
बसंतर की लड़ाई
कमीशन मिलने के सिर्फ 6 महीने बाद ही 1971 में भारत-पाकिस्तान की लड़ाई छिड़ गई. अरुण उस वक्त अहमदनगर में एक ट्रेनिंग कोर्स कर रहे थे. हालांकि, वॉर की खबर मिलते ही उन्हें तुरंत मोर्चे पर बुला लिया गया. बसंतर नदी का इलाका वॉर के नजरिए से बहुत खास था. अगर पाकिस्तान इस पर कब्जा कर लेता, तो जम्मू-कश्मीर का भारत से कनेक्शन टूट सकता था. फिर 16 दिसंबर, 1971 की सुबह, पाकिस्तानी सेना ने अपने अमेरिकी पेटन टैंकों के साथ हमला कर दिया. भारतीय सेना की एक टुकड़ी मुश्किल में थी. तभी अरुण खेतरपाल अपने टैंक ‘फमागस्टा’ के साथ उनकी मदद के लिए आए.

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नहीं छोड़ूंगा टैंक
अरुण ने वहां पाकिस्तानी सेना के छक्के छुड़ा दिए. उन्होंने अकेले ही दुश्मन के कई टैंकों को तबाह कर दिया. इसी बीच उनके टैंक ‘फमागस्टा’ पर बम गिरा और उसमें आग लग गई. ये देखकर अरुण के सीनियर ऑफिसर ने उन्हें टैंक छोड़कर पीछे हटने का ऑर्डर दिया. मगर अरुण ने रेडियो पर जवाब दिया- नहीं सर, मैं अपना टैंक नहीं छोड़ूंगा. मेरी गन अभी भी काम कर रही है. मैं दुश्मनों को मजा चखाकर रहूंगा. इसके बाद सिर्फ 100 मीटर की दूरी से आमने-सामने की लड़ाई हुई. अरुण ने एक के बाद एक पाकिस्तान के कई टैंकों को मिट्टी में मिला दिया. इसी बीच एक और बम उनके टैंक पर लगा, जिससे अरुण बुरी तरह घायल हो गए. फिर भी वो अपनी आखिरी सांस तक लड़ते रहे. वो तब तक लड़े, जब तक की उन्हें यकीन नहीं हो गया कि अब दुश्मन का एक भी टैंक उनकी पोजीशन को पार नहीं करेगा.
सबसे बड़ा सम्मान
अरुण खेतरपाल की बहादुरी की वजह से पाकिस्तान का हमला नाकाम हो गया. भारत ने बसंतर की लड़ाई जीत ली. उसी दिन शाम को पाकिस्तान ने सरेंडर कर दिया और फिर बांग्लादेश पैदा हुआ. सिर्फ 21 साल की उम्र में शहीद होने वाले अरुण खेतरपाल को भारत के सबसे बड़े सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से नवाजा गया. वे आज भी इस अवॉर्ड को पाने वाले सबसे यंग सैनिक हैं.

‘इक्कीस’ और विरासत
श्रीराम राघवन के डायरेक्शन में बनी फिल्म ‘इक्कीस’ में अगस्त्य नंदा ने अरुण के कैरेक्टर को शानदार तरीके से निभाया. ये फिल्म दो कहानियों को जोड़ती है. एक तरफ 1971 की वॉर और दूसरी तरफ साल 2001 में उनके पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेतरपाल की कहानी. इसमें वो पाकिस्तान के सरगोधा में अपने पुश्तैनी घर लौटते हैं. वहां उनकी मुलाकात पाकिस्तानी ब्रिगेडियर नासिर यानी जयदीप अहलावत से होती है, जो उस लड़ाई में अरुण के खिलाफ लड़ रहे थे.
21 का कमाल
अरुण खेतरपाल का नाम आज एनडीए के परेड ग्राउंड से लेकर आईएमए के गेट पर लिखा हुआ है. उनका टैंक ‘फमागस्टा’ आज भी अहमदनगर के स्कूल में सेफ रखा हुआ है, जो आने वाली जेनेरेशन को उनकी बहादुरी की याद दिलाता है. 21 साल की उम्र में जहां लड़के-लड़कियां अपने करियर और फ्यूचर के सपने देखते हैं, वहीं अरुण खेतरपाल ने उस उम्र में देश की मिट्टी के लिए अपनी जिंदगी दे दी.
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