Gulf Energy Crisis: दुनिया के किसी एक हिस्से में ऊर्जा संकट का असर अब सिर्फ उसी इलाके तक सीमित नहीं रहता. खाड़ी देशों में एनर्जी इन्फ्रास्ट्रक्चर में किसी भी तरह की प्रोब्लम भारत के लिए बड़ा आर्थिक और रणनीतिक खतरा बन सकता है. एक नई रिपोर्ट ने वॉर्निंग दी है कि भारत को ऐसी स्थिति से निपटने के लिए एनर्जी के दूसरे रास्ते, ज्यादा भंडार और रिन्यूएबल एनर्जी पर तेजी से काम करना होगा. हम सभी जानते हैं कि, भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के करीब 60 प्रतिशत कच्चे तेल और LNG इम्पोर्ट और लगभग 85 प्रतिशत LPG शिपमेंट स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से होकर गुजरते हैं. यही वजह है कि इस खास समुद्री रास्ते में किसी भी तरह की रुकावट भारत के लिए परेशानी बढ़ा सकती है.
LPG की सप्लाई में रुकावट
खाड़ी से आने वाली LPG की सप्लाई में रुकावट का सीधा असर आम परिवारों पर पड़ सकता है. LPG सिर्फ इंडस्ट्री की जरूरत नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीय घरों के किचन से जुड़ी है. ऐसे में सप्लाई में प्रोब्लम होने पर महंगाई पर असर पड़ सकता है. एनर्जी क्राइसेस का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल या गैस तक सीमित नहीं रहेगा. अगर लंबे समय तक कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं तो ट्रांसपोर्ट, एविएशन, लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग, पेट्रोकेमिकल्स और एग्रीकल्चर जैसे कई सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं. महंगा तेल भारत का इम्पोर्ट बिल बढ़ा सकता है, चालू खाते पर दबाव डाल सकता है और महंगाई को भी हवा दे सकता है.
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भारत का प्लान B
हालांकि, भारत ने पिछले कुछ समय में अपनी ऊर्जा खरीद को ज्यादा डायवर्सिफाई बनाने की कोशिश की है. पहले खाड़ी देश भारत की LPG जरूरतों के लगभग 88 प्रतिशत आयात का बड़ा सोर्स थे. लेकिन मिडिल ईस्ट में तनाव के बाद भारत ने अमेरिका जैसे देश से LPG खरीद बढ़ाई. इसी तरह LNG के मामले में ओमान, नाइजीरिया, त्रिनिदाद और अंगोला जैसे देशों से सप्लाई बढ़ाई गई है. कच्चे तेल के लिए भी रूस से खरीद बढ़ाकर भारत ने अपनी रिफाइनरी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश की है. रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में एनर्जी क्राइसेस होने के बावजूद भारत का LNG आयात अनुमान से काफी कम प्रभावित हुआ. इससे साफ है कि अलग-अलग देशों से ऊर्जा खरीदने की रणनीति भारत के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है.
ग्रीन एनर्जी पर ज़ोर
अब भारत को बंदरगाह, पाइपलाइन, भंडारण सुविधाएं और समुद्री मार्ग जैसे ऑप्शन्स पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. साथ ही रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने से अचानक पैदा हुए संकट के बीच कुछ समय के लिए सुरक्षा कवच मिल सकता है. रिन्यूएबल एनर्जी और ग्रीन फ्यूल तुरंत तेल-गैस की जगह नहीं ले सकते, लेकिन लंबे समय में ये भारत की बाहरी ऊर्जा निर्भरता कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. यानी मैसेज क्लियर है, भारत की ऊर्जा जरूरतें जितनी बड़ी हैं, उसका प्लान बी भी उतना ही मजबूत होना चाहिए.
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