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Cannes 2026 तक पहुंची Amma Ariyan, क्यों 40 साल बाद भी बेचैन कर देती है ये कल्ट मास्टरपीस?

by Preeti Pal
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Cannes 2026 तक पहुंची Amma Ariyan, क्यों 40 साल बाद भी बेचैन कर देती है मलयालम सिनेमा की ये कल्ट मास्टरपीस?

14 May, 2026

Cannes 2026: भारतीय सिनेमा में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो रिलीज़ के वक्त भले ही हर किसी की समझ में न आएं, लेकिन टाइम बीतने के साथ उनकी अहमियत और गहरी होती चली जाती है. मलयालम फिल्ममेकर जॉन अब्राहम की 1986 में रिलीज़ हुई ‘अम्मा अरियान’ ऐसी ही फिल्मों में शामिल है. अब जब इस फिल्म का रिस्टोर्ड 4K वर्जन कान्स फिल्म फेस्टिवल 2026 में स्क्रीनिंग के लिए चुना गया है, तो एक बार फिर इसकी चर्चा दुनियाभर में शुरू हो गई है. करीब चार दशक पहले बनी ये फिल्म आज भी ऑडियन्स को अंदर तक हिला देती है. इसकी वजह सिर्फ ‘अम्मा अरियान’ की कहानी नहीं, बल्कि उसका अंदाज़, उसकी राजनीतिक बेचैनी और समाज की टूटती हुई सच्चाइयों को बहुत ईमानदार तरीके से सामने रखने का तरीका है. ‘अम्मा अरियान’ ऐसी फिल्म है, जो खत्म होने के बाद भी आपके अंदर चलती रहती है.

एक अलग शुरुआत

फिल्म की शुरुआत ही आपको एक अलग दुनिया में ले जाती है. सबसे पहले नजर आते हैं एक्टर जॉय मैथ्यू, जिन्हें आज की जेनेरेशन ‘स्ट्रिक फादर’, सीरियस बुजुर्ग या कैरेक्टर रोल्स में पहचानती है. लेकिन इस फिल्म में उन्हें यंग कैरेक्टर में देखना अपने आप में चौंकाने वाला एक्सपीरियंस है. घने बाल, भारी आवाज़ और चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी. जॉय मैथ्यू का कैरेक्टर पुरुषन शुरुआत से ही ऑडियन्स को अपने साथ जोड़ लेता है. फिल्म में पुरुषन वायनाड से दिल्ली रिसर्च के लिए निकल रहा होता है. घर से जाते हुए वो अपनी मां से कहता है कि दिल्ली पहुंचकर चिट्ठी लिखेगा. यहीं से फिल्म का टाइटल ‘अम्मा अरियान’ यानी ‘मां को बताना’ मायने लेने लगता है. लेकिन रास्ते में एक ऐसी घटना होती है, जो पुरुषन की पूरी जर्नी ही बदल देती है.

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एक लाश ने बदली कहानी

रेलवे स्टेशन जाते टाइम पुलिस उनकी गाड़ी रोक लेती है. पुलिस को एक अंजान लड़के की लाश ले जानी होती है, जिसने पहाड़ी पर आत्महत्या कर ली है. जब पुरुषन उस मरे हुए लड़के का चेहरा देखता है, तो उसे लगता है कि वो उसे जानता है. यहीं से उसकी बेचैनी शुरू होती है. वो दिल्ली जाने का फैसला छोड़ देता है और उस लड़के की पहचान ढूंढ़ने के लिए निकल पड़ता है. जल्द ही उसे पता चलता है कि मरे हुए लड़के का नाम हरी था और वो तबला बजाने वाला आर्टिस्ट था. पुरुषन तय करता है कि वो खुद जाकर हरी की मां को उसके बेटे की मौत की खबर देगा. इसके बाद वायनाड से कोच्चि तक की उसकी जर्नी शुरू होती है. लेकिन ये सिर्फ एक सफर नहीं रह जाता. ये धीरे-धीरे समाज, पॉलिटिक्स, स्ट्रगल और टूटते हुए इंसानों की परतें खोलने लगता है.

हर याद में अलग

फिल्म का सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि हरी कभी सीधे तौर पर पूरी तरह ऑडियन्स के सामने नहीं आता. हम उसे उन लोगों की यादों के जरिए जानते हैं, जो कभी उसके करीब रहे थे. किसी के लिए हरी एक शानदार तबला प्लेयर था. किसी के लिए वो पॉलिटिकल सोच रखने वाला यंगस्टर था. कुछ लोग उसे डरपोक मानते हैं, तो कुछ उसे सिस्टम का शिकार बताते हैं. वहीं, उसके पिता की नजर में वो बेकार क्रांतिकारी था. उसकी मां के लिए वो एक ऐसा बेटा था, जिसके दर्द को वो कभी समझ ही नहीं पाईं. फिल्म यहां कोई एक सच तय नहीं करती. हर इंसान के पास हरी का अपना ही अलग वर्जन है. यही चीज़ फिल्म को बहुत रियलिस्टिक और सेंसिटिव बनाती है.

क्यों अलग है ‘अम्मा अरियान’?

आज के दौर में जब ज्यादातर फिल्में चमकदार कैमरा वर्क, तेज एडिटिंग और बड़े-बड़े ड्रामेटिक मोमेंट्स पर टिकी होती हैं, तब ‘अम्मा अरियान’ बिल्कुल अलग एक्सपीरियंस देती है. ये काफी स्लो मूवी है. कई जगह एक्टिंग इतनी रॉ लगती है कि आपको लगता है जैसे आप कोई डॉक्यूमेंट्री को देख रहे हों. डायलॉग्स भी पूरी तरह फिल्मी नहीं लगते. लेकिन यही चीज़ इसे खास बनाती है. फिल्म के डायरेक्टर जॉन अब्राहम ट्रे़डिशनल कहानी कहने के खिलाफ थे. वो सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज से बात करने का ज़रिया मानते थे. यही वजह है कि ‘अम्मा अरियान’ किसी पॉलिश्ड फिल्म की तरह नहीं लगती. ये रीयल लाइफ की तरह बिखरी हुई, अधूरी और बेचैन लगती है. शायद इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत भी यही है.

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मजबूरी बनी खूबसूरती

फिल्म के सिनेमैटोग्राफर वीनू ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जॉन अब्राहम इस फिल्म को कलरफुल बनाना चाहते थे. लेकिन बजट की कमी की वजह से इसे ब्लैक एंड व्हाइट में ही शूट करना पड़ा. दिलचस्प बात ये है कि यही मजबूरी फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती बन गई. ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम्स फिल्म को एक उदास, डरावना और बेचैन माहौल देते हैं. ऐसा लगता है जैसे हर फ्रेम लोगों और समाज के दर्द से भरा हुआ है. फिल्म के विजुअल्स में चमक नहीं है, लेकिन एक अजीब सी सच्चाई है. यही वजह है कि ये फिल्म आज भी इतनी फ्रेश लगती है.

पहली क्राउड-फंडेड फिल्मों में से एक

‘अम्मा अरियान’ सिर्फ अपनी कहानी की वजह से खास नहीं है. इसका बनने का तरीका भी उतना ही अनोखा था. कहा जाता है कि ये मलयालम सिनेमा की पहली क्राउड-फंडेड फिल्मों में से एक थी. यानी इसे आम लोगों ने मिलकर फंड किया था. जॉन अब्राहम का मानना था कि सिनेमा सिर्फ बड़े प्रोड्यूसर्स का नहीं होना चाहिए. आम लोगों की कहानियां आम लोगों के पैसों से भी बन सकती हैं. अजीब बात है कि जिन लोगों ने इस फिल्म को बनाने के लिए पैसे दिए, ये उन्हीं के स्ट्रगल और दर्द की कहानी कहती है.

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टूटते रिश्तों की कहानी

फिल्म का टाइटल जितना सिंपल लगता है, उसका ही गहरा इसका मतलब है. शुरुआत में पुरुषन अपनी मां से वादा करता है कि वो दिल्ली पहुंचकर चिट्ठी लिखेगा. लेकिन सफर के दौरान वो कई ऐसी मांओं से मिलता है, जिनके बेटे टूट चुके हैं, भटक चुके हैं या सिस्टम के शिकार बन चुके हैं. फिल्म का सबसे दर्दनाक सीन तब आता है, जब पुरुषन हरी की मां को उसके बेटे की मौत की खबर देता है. हरी की मां तुरंत समझ जाती है कि उसका बेटा आत्महत्या कर चुका है. फिल्म यहां कोई बड़ा मेलोड्रामा नहीं करती. कोई तेज़ बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं बजता. बस एक मां खामोशी से टूटती हुई दिखाई देती है. यही सादगी उस सीन को और ज्यादा इंपैक्टफुल बना देती है.

सिस्टम के खिलाफ गुस्सा

‘अम्मा अरियान’ सिर्फ एक लड़के की कहानी नहीं है, बल्कि ये पूरे सिस्टम पर सवाल उठाती है. फिल्म में मजदूरों की समस्याएं दिखाई गई हैं. खदानों में काम करने वाले विकलांग मजदूरों को मुआवज़ा नहीं मिलता. पुलिस का अत्याचार होता है. मेडिकल इंस्टीट्यूट के प्राइवेटाइजेशन के खिलाफ प्रोटेस्ट होते हैं. इसके अलावा ये फिल्म दिखाती है कि कैसे गरीब और मजदूर वर्ग हमेशा सबसे ज्यादा प्रॉब्लम झेलता है. सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि 1986 में उठाए गए ये मुद्दे आज भी उतने ही रेलेवेंट लगते हैं. आज दुनिया भले ही टेक्नोलॉजी और ग्लैमर से भर गई हो, लेकिन आम लोगों की परेशानियां बहुत ज्यादा नहीं बदलीं.

लोकल कहानी, ग्लोबल दर्द

जॉन अब्राहम की पॉलिटिक्स साफ तौर पर लेफ्ट झुकाव वाली थी. लेकिन फिल्म आंख बंद करके किसी विचारधारा को सपोर्ट नहीं करती. फिल्म ये भी दिखाती है कि कैसे यूनियन लीडर, नेता और पुलिस कई बार मिलकर मजदूरों की आवाज दबाते हैं. यानी यहां पॉलिटिक्स सिर्फ नारेबाज़ी नहीं है. यहां राजनीति इंसानों की जिंदगी पर असर डालने वाली सच्चाई है. इसके अलावा फिल्म में साउथ अफ्रीका के नेता नेल्सन मंडेला की रिहाई की मांग वाला एक स्ट्रीट प्ले रिहर्सल भी दिखाया गया है. इसके अलावा दुनियाभर में हो रहे अत्याचारों और नरसंहारों की अखबारी कटिंग्स भी नजर आती हैं. इनके ज़रिए जॉन अब्राहम ये बताना चाहते थे कि शोषण सिर्फ भारत की समस्या नहीं है. दुनिया के हर हिस्से में गरीब और कमजोर लोग ही सबसे ज्यादा परेशान होते हैं.

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याद रह जाता है सीन

फिल्म का एक बहुत छोटा लेकिन डरावना सीन लंबे टाइम तक याद रहता है. जब पुरुषन पहली बार मुर्दाघर में हरी की लाश पहचानने जाता है, तो कैमरा कुछ सेकंड के लिए वहां रखी दो बच्चों की डेड बॉडी भी दिखाता है. ये सीन सिर्फ एक पल के लिए आता है, लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद भी दिमाग से नहीं निकलता. यही ‘अम्मा अरियान’ की ताकत है. ये फिल्म आपको तुरंत झटका नहीं देती, बल्कि धीरे-धीरे आपके अंदर उतरती है.

आखिरी और खास हिस्सा

फिल्म के आखिरी हिस्से में जॉन अब्राहम एक बहुत दिलचस्प सिनेमाई एक्सपेरिटमेंट करते हैं. फिल्म के किरदार खुद वही फिल्म देखते नजर आते हैं, जो ऑडियन्स देख रहे होते हैं. इसे ‘फोर्थ वॉल ब्रेक’ कहा जाता है. जैसे डायरेक्टर ऑडियन्स से कह रहे हों कि, ये सिर्फ कहानी नहीं है. ये उन्हीं की जिंदगी है, जो स्क्रीन पर दिखाई जा रही है. 1980 के दशक में ऐसा एक्सपेरिमेंट करना बहुत हिम्मत का काम था.

आज भी क्यों जरूरी है?

आज जब दुनिया सोशल मीडिया रील्स, तेज़ कंटेंट और दो घंटे के एंटरटेनमेंट तक लिमिटेड होती जा रही है, वहीं, ‘अम्मा अरियान’ जैसी फिल्में हमें याद दिलाती हैं कि सिनेमा सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं होता. ये सवाल पूछ सकता है. ये परेशान कर सकता है. ये आपको अपनी ही दुनिया को नए नजरिए से देखने पर मजबूर कर सकता है. खैर, कॉन्स 2026 में इस फिल्म की वापसी सिर्फ एक पुरानी फिल्म का सम्मान नहीं है. ये उस दौर के सिनेमा को सलाम है, जब फिल्ममेकर जोखिम लेते थे, सिस्टम से सवाल पूछते थे और ऑडियन्स को आसान जवाब देने से बचते थे. ‘अम्मा अरियान’ देखने के बाद शायद आपको तुरंत सब कुछ समझ न आए. लेकिन ये फिल्म आपके अंदर कहीं ना कहीं रह जाएगी. शायद किसी भी कल्ट फिल्म की सबसे बड़ी पहचान यही होती है.

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