Home Latest News & Updates IIT मंडी की बड़ी कामयाबी: भूस्खलन की पहले ही मिलेगी सटीक जानकारी, इस नई तकनीक से नहीं होगा नुकसान

IIT मंडी की बड़ी कामयाबी: भूस्खलन की पहले ही मिलेगी सटीक जानकारी, इस नई तकनीक से नहीं होगा नुकसान

by Sanjay Kumar Srivastava 8 July 2026, 3:53 PM IST (Updated 8 July 2026, 3:54 PM IST)
8 July 2026, 3:53 PM IST (Updated 8 July 2026, 3:54 PM IST)
IIT मंडी की बड़ी कामयाबी:भूस्खलन की पहले ही मिलेगी सटीक जानकारी, नई तकनीक से नहीं होगा जान-माल का नुकसान

IIT Mandi: IIT मंडी ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है. अब भूस्खलन की पहले ही सटीक जानकारी मिल जाएगी, जिससे जान-माल का कम नुकसान होगा. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी ने हिमालयी क्षेत्र के लिए एक अत्याधुनिक ‘लैंडस्लाइड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ (समय से पहले चेतावनी देने वाला सिस्टम) विकसित किया है. यह सिस्टम ज़मीन की बनावट और रियल-टाइम बारिश के डेटा का विश्लेषण करके भूस्खलन (लैंडस्लाइड) की सटीक भविष्यवाणी करता है. इस तकनीक की मदद से आपदा आने से पहले ही समय पर चेतावनी मिल सकेगी, जिससे प्रभावित इलाकों में जोखिम को कम किया जा सकेगा. भारतीय हिमालयी क्षेत्र में ढलान धंसने और भूस्खलन की अत्यधिक घटनाओं के कारण होने वाले जान-माल के भारी नुकसान को रोकने में यह सिस्टम एक गेम-चेंजर साबित होगा और आपदा प्रबंधन को नई मजबूती देगा.

आपदा प्रबंधन में मिलेगी मदद

संस्थान ने कहा कि भारत में लैंडस्लाइड की चेतावनी देने वाले दूसरे सिस्टम की भौगोलिक दायरे के मामले में अपनी सीमाएं हैं, जबकि IIT मंडी का ‘लैंडस्लाइड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम'(LEWS) पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र में लागू किया गया है. इसलिए यह देश के लिए बनाए गए सबसे बड़े सिस्टम में से एक है. इसमें कहा गया है कि LEWS उन इलाकों के लिए चेतावनी जारी करता है जहां लैंडस्लाइड का खतरा होता है, ताकि संबंधित अधिकारी और आपदा प्रबंधन एजेंसियां ​​ज़रूरी सावधानी बरत सकें. इस रिसर्च का नेतृत्व इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (IIT) मंडी के स्कूल ऑफ़ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के प्रोफ़ेसर डेरिक्स प्रेज़ शुक्ला ने किया. उनके साथ रिसर्च स्कॉलर अंकित सिंह और नितेश धीमान भी शामिल थे.

बारिश में लैंडस्लाइड का सबसे ज्यादा खतरा

प्रोफ़ेसर शुक्ला ने कहा कि मानसून की शुरुआत में ही हमारा LEWS एक वेब-बेस्ड एप्लीकेशन के ज़रिए रोज़ाना लैंडस्लाइड का अनुमान बताता है. इस सिस्टम को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि यह ज़्यादा जोखिम वाले इलाकों की पहले ही पहचान कर सके, जिससे प्रशासन समय रहते लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचा सकें और आपदा की तैयारी कर सकें. उन्होंने कहा कि सैटेलाइट-आधारित शुरुआती चेतावनी सिस्टम आपदा के जोखिम को कम करने के लिए सबसे असरदार निवेशों में से एक हैं. ये वैज्ञानिक डेटा को समय पर और सही कदम उठाने लायक फैसलों में बदलते हैं. शुक्ला ने कहा कि खासकर मॉनसून के मौसम में जब लैंडस्लाइड का खतरा सबसे ज्यादा होता है.

GSI का भी लिया सहयोग

रिसर्च ग्रुप ने कई चरणों वाले तरीके से यह सिस्टम बनाया है. सबसे पहले, लैंडस्लाइड की संभावना वाला नक्शा बनाने के लिए जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) के डेटाबेस से लगभग 26,000 लैंडस्लाइड की पहचान की गई. संस्थान ने बताया कि इसे ‘एनसेंबल मशीन लर्निंग मॉडल’ का इस्तेमाल करके लैंडस्लाइड की वजह बनने वाले कारकों के डेटा के साथ मिलाया गया. इसके बाद, NASA के ग्लोबल लैंडस्लाइड कैटलॉग से मिली जानकारी और IMERG सैटेलाइट डेटासेट से इकट्ठा किए गए बारिश के सात पैमानों का इस्तेमाल करके P-RIL (बारिश से होने वाले लैंडस्लाइड की संभावना) मॉडल बनाया गया.

P-RIL मॉडल से सटीक भविष्यवाणी

चूंकि बारिश की स्थिति हमेशा बदलती रहती है, इसलिए P-RIL मॉडल डायनामिक (बदलाव के साथ चलने वाला) है क्योंकि यह पिछले 15 दिनों के बारिश के डेटा का इस्तेमाल करता है. संभावना विश्लेषण के आधार पर स्टैटिक (स्थिर) संभावना वाले नक्शे और डायनामिक P-RIL मॉडल को मिलाकर हर दिन लैंडस्लाइड की अंतिम भविष्यवाणी की जाती है. संस्थान के अनुसार, भविष्यवाणियों को बेहतर ढंग से समझने के लिए जोखिम की परसेंटाइल-आधारित श्रेणियों का इस्तेमाल किया जाता है. यूज़र्स के लिए जानकारी को समझने लायक बनाने के लिए लैंडस्लाइड (भूस्खलन) की भविष्यवाणियां परसेंटाइल का इस्तेमाल करके रिस्क कैटेगरी के तौर पर दी जाती हैं.

लोगों के लिए आसान हुई लैंडस्लाइड की जानकारी

IIT मंडी की टीम ने Google Earth Engine पर आधारित एक वेब पोर्टल बनाया है, जिसके ज़रिए यूज़र्स मौजूदा दिन और पिछले तीन दिनों की लैंडस्लाइड की भविष्यवाणियां भी देख सकते हैं. संस्थान ने कहा कि इस कदम का मकसद स्टेकहोल्डर्स तक जानकारी आसानी से पहुंचाना और उसका प्रसार करना है. इसके अलावा, यूज़र्स PDF फ़ॉर्मेट में बुलेटिन डाउनलोड कर सकते हैं और चुनिंदा जगहों के लिए WhatsApp अलर्ट भी पा सकते हैं. रिसर्चर्स के मुताबिक, LEWS का संचालन समय पर और जगह-जगह के हिसाब से चेतावनी जारी करके आर्थिक नुकसान को कम करने में मदद करेगा, जिससे इस इलाके में आपदा की तैयारी और रिस्क कम करने की कोशिशों को बहुत बढ़ावा मिलेगा.

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News Source: PTI

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