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वैश्विक स्वास्थ्य मानकों को मात दे रहा भारत, पर मातृ-शिशु मृत्यु दर अब भी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती

by Sanjay Kumar Srivastava 24 May 2026, 8:41 PM IST
24 May 2026, 8:41 PM IST
वैश्विक स्वास्थ्य मानकों को मात दे रहा भारत, पर मातृ-शिशु मृत्यु दर अब भी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती

Health Services: भारत वैश्विक स्वास्थ्य मानकों को मात दे रहा है यानी स्वास्थ्य सेवाओं, दवाओं के उत्पादन और तकनीकी नवाचार के मामले में भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है. भारत ने मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) और शिशु मृत्यु दर (IMR) को कम करने में वैश्विक रुझानों को पीछे छोड़ते हुए अभूतपूर्व प्रगति दर्ज की है. भारत ने अपनी स्वास्थ्य प्रणालियों को इस कदर सुधारा है कि देश अब दुनिया के अन्य विकासशील राष्ट्रों को इस क्षेत्र में तकनीकी मार्गदर्शन देने के लिए तैयार है. बावजूद इसके मातृ-शिशु मृत्यु दर अब भी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है. केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने 23 मई को जेनेवा में आयोजित 79वीं विश्व स्वास्थ्य सभा में वैश्विक मंच पर भारत की ऐतिहासिक स्वास्थ्य सफलताओं को बताया.

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पार्टनरशिप फॉर मैटरनल, न्यूबॉर्न एंड चाइल्ड हेल्थ की बोर्ड अध्यक्ष हेलेन क्लार्क के साथ मुलाकात में स्वास्थ्य मंत्री ने स्पष्ट कहा कि भारत ने मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) और शिशु मृत्यु दर (IMR) को कम करने में अभूतपूर्व प्रगति दर्ज की है. भारत ने अपनी स्वास्थ्य प्रणालियों को इस कदर सुधारा है कि देश अब दुनिया के अन्य विकासशील राष्ट्रों को इस क्षेत्र में तकनीकी मार्गदर्शन देने के लिए तैयार है. इस बयान ने वैश्विक स्तर पर एक बड़ी बहस को दोबारा जन्म दे दिया है. जब चिकित्सा विज्ञान इतनी प्रगति कर चुका है, तब भी दुनिया में हर दो मिनट में एक मां और हर रोज हजारों मासूम बच्चे दम क्यों तोड़ रहे हैं? क्या इसके पीछे इलाज और देखभाल की कमी है? वैश्विक और भारतीय संदर्भ में इसकी वास्तविक स्थिति क्या है?

विश्व में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर के मुख्य कारण

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ (UNICEF) की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, अधिकांश मातृ और शिशु मृत्यु ऐसे कारणों से होती हैं जिन्हें समय पर सही इलाज मिलने से पूरी तरह रोका जा सकता था.

मातृ मृत्यु के कारण

गंभीर रक्तस्रावः गंभीर रक्तस्राव यानी प्रसव के बाद अत्यधिक खून बहना मातृ मृत्यु का सबसे बड़ा वैश्विक कारण है, जो कुल मौत का लगभग 27% से 47% तक है.

संक्रमण: प्रसव के दौरान या बाद में अस्वच्छता के कारण होने वाला संक्रमण जानलेवा साबित होता है.

उच्च रक्तचाप: गर्भावस्था के दौरान अनियंत्रित ब्लड प्रेशर के कारण महिलाओं के अंगों को नुकसान पहुंचता है और दौरे आते हैं.

असुरक्षित गर्भपात: कानूनी या सामाजिक बाधाओं के कारण असुरक्षित तरीके से कराए गए गर्भपात से संक्रमण और मौत होती है.

प्रसव में रुकावट: बच्चे के फंसने या प्रसव का समय अत्यधिक खिंच जाने से मां की जान जोखिम में पड़ जाती है.

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शिशु मृत्यु के कारण

समय से पहले जन्म: गर्भावस्था के 37 सप्ताह से पहले पैदा होने वाले बच्चों के फेफड़े और अंग पूरी तरह विकसित नहीं होते, जिससे वे बच नहीं पाते.

बर्थ एस्फिक्सिया: जन्म के समय बच्चे को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिल पाना या प्रसव के दौरान आघात लगना.

संक्रामक बीमारियां: निमोनिया, डायरिया (दस्त) और मलेरिया पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत के सबसे बड़े संक्रामक कारण हैं।

कुपोषण : कुपोषण प्रत्यक्ष रूप से भले न मारे, लेकिन यह बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को इतना कमजोर कर देता है कि वह आम बीमारियों से भी लड़ नहीं पाता.

क्या इलाज और देखभाल में कमी भी है असली कारण?

चिकित्सा विशेषज्ञ कहते हैं कि किसी महिला या बच्चे की मौत इलाज और देखभाल में कमी से भी हो जाती है. इसके साथ ही समय पर पहुंच की कमी भी एक बड़ा कारण है. चिकित्सा विज्ञान में आज इन सभी समस्याओं का सटीक इलाज उपलब्ध है. यदि किसी महिला या बच्चे की मौत हो रही है, तो इसका मतलब है कि स्वास्थ्य प्रणाली उन तक सही समय पर बुनियादी देखभाल पहुंचाने में विफल रही है.

निर्णय लेने में देरी : जागरूकता की कमी, आर्थिक तंगी या सामाजिक रूढ़ियों के कारण परिवार यह तय नहीं कर पाता कि प्रसूता या बीमार बच्चे को अस्पताल कब ले जाना है.

अस्पताल पहुंचने में देरी: ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में खराब सड़कें, परिवहन के साधनों का अभाव और एम्बुलेंस सेवाओं की अनुपलब्धता के कारण मरीज समय पर बड़े केंद्र नहीं पहुंच पाता.

उचित इलाज मिलने में देरी: अस्पताल पहुंचने के बाद भी डॉक्टरों की कमी, आवश्यक दवाओं का न होना, बिजली या उपकरणों की खराबी और रक्त की अनुपलब्धता के कारण इलाज में देरी होती है, जो मौत की अंतिम वजह बनती है.

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भारत की वर्तमान स्थिति: वैश्विक मानकों को कैसे दी मात?

भारत ने पिछले तीन दशकों में मातृ और शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो सुधार किया है, उसे संयुक्त राष्ट्र (UN) भी एक मिसाल मानता है. भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 और यूनाइटेड नेशंस इंटर एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टलिटी एस्टीमेशन के आंकड़ों ने इसकी पुष्टि की है.

  • मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) में ऐतिहासिक गिरावट: साल 1990 में भारत का MMR 398 से अधिक था. भारत सरकार के निरंतर प्रयासों से इसमें 86% की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जबकि इसी अवधि में वैश्विक औसत गिरावट मात्र 48% रही है. भारत ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत 100 से नीचे का लक्ष्य सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है और अब देश 2030 तक सतत विकास लक्ष्य (SDG) के तहत इसे 70 से नीचे लाने की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है.
  • शिशु मृत्यु दर (IMR) में तीव्र सुधार: भारत में शिशु मृत्यु दर में पिछले एक दशक में 37% से अधिक की गिरावट आई है. जहां साल 2013 में प्रति हजार जीवित जन्मों पर 40 शिशुओं की मौत हो जाती थी, वहीं साल 2023-24 तक यह घटकर 25 पर आ गई है.
  • 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर: वर्ष 1990 में भारत में यह दर 127 थी, जो नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार 79% घटकर केवल 26.6 से 27 रह गई है.

घरेलू क्षेत्रीय चुनौतियां

यद्यपि राष्ट्रीय औसत बहुत शानदार है, लेकिन भारत के भीतर राज्यों में अब भी अंतर है. केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने विकसित देशों जैसा प्रदर्शन किया है, वहीं असम (215), उत्तर प्रदेश (192) और मध्य प्रदेश (170) जैसे राज्यों में ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों के कारण अभी भी मृत्यु दर तुलनात्मक रूप से अधिक बनी हुई है, जिस पर सरकार विशेष ध्यान दे रही है.

मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कैसे कम किया जा सकता है?

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मौत के आंकड़ों को शून्य के करीब लाने के लिए वैज्ञानिक और व्यावहारिक स्तर पर निम्नलिखित पांच रणनीतियों को कड़ाई से लागू करना होगा:

  • शत-प्रतिशत संस्थागत प्रसव : हर बच्चे का जन्म घर के बजाय अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में कुशल डॉक्टरों और नर्सों की देखरेख में होना चाहिए ताकि प्रसवकालीन जटिलताओं को तुरंत संभाला जा सके.
  • प्रसव पूर्व जांच : गर्भावस्था के दौरान कम से कम 4 बार व्यापक स्वास्थ्य जांच अनिवार्य हो. इससे उच्च रक्तचाप, एनीमिया (खून की कमी) और गर्भस्थ शिशु की बीमारियों का पहले ही पता लगाकर इलाज शुरू किया जा सकता है.
  • मदर केयर और स्तनपान: नवजात शिशुओं को जन्म के तुरंत बाद (1 घंटे के भीतर) मां का गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम) देना और समय से पहले जन्मे बच्चों को मां के शरीर की गर्मी देना शिशुओं की जान बचाता है.
  • पूर्ण टीकाकरण : बच्चों को खसरा, निमोनिया, रोटावायरस और टिटनेस जैसी जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए समय पर टीके लगाना अनिवार्य है.
  • पोषण और परिवार नियोजन: किशोरियों और गर्भवती महिलाओं के खानपान में सुधार करना ताकि वे एनीमिया से मुक्त रहें. साथ ही, दो बच्चों के जन्म के बीच कम से कम 3 साल का अंतर रखना मां के शरीर को दोबारा स्वस्थ होने का मौका देता है.

सरकार का क्या योगदान हो सकता है?

स्वास्थ्य प्रणालियों को दुरुस्त करने और वित्तीय बाधाओं को दूर करने में सरकार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है. भारत सरकार ने इसके लिए कई गेम-चेंजर नीतियां लागू की हैं, जिन्हें वैश्विक स्तर पर सराहा जा रहा है.

1.वित्तीय सहायता और मुफ्त इलाज : इस योजना के तहत गर्भवती महिलाओं और बीमार नवजात शिशुओं को सरकारी अस्पतालों में पूरी तरह से मुफ्त प्रसव, सिजेरियन ऑपरेशन, दवाएं, भोजन और परिवहन (एम्बुलेंस) की सुविधा दी जाती है, जिससे जेब से होने वाला खर्च खत्म हो गया है.

2.प्रधान मंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA): इसके तहत हर महीने की 9 तारीख को देश भर में गर्भवती महिलाओं की मुफ्त विशेष जांच की जाती है, ताकि जोखिम वाली गर्भधारण की पहचान की जा सके.

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3.डिजिटल और सूचना तकनीक का उपयोग: भारत सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में डिजिटल क्रांति का उपयोग किया है. पोषण ट्रैकर और एएनएम ऑनलाइन जैसे डिजिटल माध्यमों से देश की हर गर्भवती महिला और बच्चे के टीकाकरण व पोषण की रियल टाइम मॉनिटरिंग की जा रही है.

4.बुनियादी ढांचे का सुदृढ़ीकरण: ग्रामीण स्तर पर ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ (हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर) स्थापित कर प्राथमिक स्तर पर ही प्रसव पूर्व देखभाल पहुंचाई जा रही है. साथ ही विशेष नवजात देखभाल इकाइयां (SNCU) ब्लॉक स्तर तक स्थापित की गई हैं.

5.अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता (आशा और एएनएम): भारत की आशा कार्यकर्ताओं ने ग्रामीण भारत में घर-घर जाकर जागरूकता फैलाई है और संस्थागत प्रसव को एक जनांदोलन बना दिया है.

उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों ने पिछले कुछ वर्षों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है, जो देश के समग्र स्वास्थ्य प्रदर्शन को बेहतर बनाने में रीढ़ की हड्डी साबित हुए हैं. इन राज्यों में जमीनी बदलाव लाने और गरीब परिवारों की मदद करने में जननी सुरक्षा योजना (JSY) जैसी योजनाओं की बहुत बड़ी भूमिका रही है.

उत्तर प्रदेश

  • मातृ मृत्यु दर (MMR): यूपी में कभी MMR 200 से काफी ऊपर था, लेकिन ‘विजन 2030’ और इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट (IHAT) के तकनीकी सहयोग से राज्य ने इसे तेज़ी से नीचे लाने का लक्ष्य रखा है.
  • शिशु स्वास्थ्य: ‘मिशन इंद्रधनुष’ के तहत पूर्ण टीकाकरण कवरेज को बढ़ाया गया है. प्रसव पूर्व जांच (ANC) और ब्लॉक स्तर पर विशेष नवजात देखभाल इकाइयों (SNCU) के सुदृढ़ीकरण से शिशुओं की असमय मृत्यु में भारी कमी आई है.

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बिहार

  • संस्थागत प्रसव में ऐतिहासिक उछाल: बिहार में साल 2005 में केवल 19.9% प्रसव अस्पतालों में होते थे, जो हालिया वर्षों में बढ़कर 76% से अधिक हो चुके हैं.
  • टीकाकरण: बिहार का पूर्ण टीकाकरण कवरेज जो कभी मात्र 18% के आसपास था, वह अब 90% तक पहुंच गया है, जिसने शिशु मृत्यु दर (IMR) को गिराने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है.

राजस्थान

  • संस्थागत प्रसव: राजस्थान ने आशा सहयोगिनियों और मुफ्त एम्बुलेंस नेटवर्क (104 और 108 सेवा) के दम पर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाली महिलाओं को शत-प्रतिशत अस्पतालों तक पहुंचाया है.
  • अतिरिक्त वित्तीय सुरक्षा: राजस्थान में ‘राजस्थान प्रसूति सहायता योजना’ जैसी पूरक योजनाएं भी चलाई जा रही हैं, जो केंद्र सरकार के लाभों के अतिरिक्त प्रसूताओं को आर्थिक संबल देती हैं.

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जननी सुरक्षा योजना (JSY): गेम चेंजर राष्ट्रीय पहल

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत संचालित जननी सुरक्षा योजना (JSY) भारत सरकार की एक पूर्ण प्रायोजित सुरक्षित मातृत्व योजना है. इसका मुख्य उद्देश्य गरीब गर्भवती महिलाओं में संस्थागत प्रसव (अस्पतालों में डिलीवरी) को बढ़ावा देकर मातृ और नवजात शिशु मृत्यु दर को कम करना है.

  • नकद प्रोत्साहन राशि: अस्पताल में सुरक्षित प्रसव होने पर सरकार लाभार्थी महिला के बैंक खाते में सीधे वित्तीय सहायता भेजती है. ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिला को 1,400 रुपए दिए जाते हैं. जबकि शहरी क्षेत्रों में गर्भवती महिला को 1,000 रुपए दिए जाते हैं.
  • आशा कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन: प्रसूता को अस्पताल लाने, उसकी प्रसव पूर्व जांच कराने और संस्थागत प्रसव सुनिश्चित कराने के लिए ‘आशा’ कार्यकर्ता को भी ग्रामीण क्षेत्रों में 600 और शहरी क्षेत्रों में 400 रुपए दिए जाते हैं.

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  • कम प्रदर्शन वाले राज्यों पर विशेष ध्यान: उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में यह योजना सभी गर्भवती महिलाओं के लिए खुली है (चाहे उनकी उम्र या बच्चों की संख्या कुछ भी हो), ताकि प्रसव को पूरी तरह सुरक्षित बनाया जा सके.
  • 48 घंटे के भीतर भुगतान: बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में अब प्रसव के बाद अस्पताल से छुट्टी मिलने के 48 घंटों के भीतर प्रोत्साहन राशि सीधे लाभार्थी के आधार लिंक्ड बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी जाती है. इससे गरीब परिवारों को प्रसव के समय होने वाले फुटकर खर्चों से तुरंत राहत मिलती है.

वैश्विक मंच पर जेपी नड्डा का यह दावा पूरी तरह तथ्यों पर आधारित है कि भारत ने इस क्षेत्र में दुनिया के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है. हालांकि, दक्षिण सूडान जैसे देशों की भयावह स्थिति और भारत के ही कुछ पिछड़े जिलों के आंकड़े यह चेतावनी देते हैं कि जब तक स्वास्थ्य सेवाओं में असमानता को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता, तब तक यह लड़ाई अधूरी है. सरकारों को बुनियादी स्वास्थ्य बजट बढ़ाना होगा, डॉक्टरों की ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी और डिजिटल ट्रैकिंग को वैश्विक स्तर पर अपनाना होगा, तभी हम ‘हर मां सुरक्षित, हर बच्चा सुरक्षित’ के संकल्प को पूरा कर पाएंगे.

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