Home Top News दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत का प्रवेश द्वार है म्यांमार, चीनी चुनौतियों के बीच कितने अहम हैं ये रिश्ते?

दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत का प्रवेश द्वार है म्यांमार, चीनी चुनौतियों के बीच कितने अहम हैं ये रिश्ते?

by Amit Dubey 30 May 2026, 8:54 PM IST (Updated 30 May 2026, 8:55 PM IST)
30 May 2026, 8:54 PM IST (Updated 30 May 2026, 8:55 PM IST)
India- Myanmar

India-Myanmar: म्यांमार के राष्ट्रपति और पूर्व कमांडर-इन-चीफ सीनियर जनरल यू मिन आंग ह्लाइंग अपने पांच दिवसीय दौरे पर भारत आए हुए हैं. आज 30 मई को उन्होंने इस यात्रा की शुरुआत बिहार के बोधगया से की. यहां एयरपोर्ट पर उनका भव्य स्वागत किया गया और गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया. इस दौरान बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन और बिहार सरकार के मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने उनका स्वागत किया. प्रेसिडेंट यू मिन का गयाजी में बौद्ध धर्म के पवित्र प्रमुख स्थलों का भ्रमण और पूजा-अर्चना के बाद दिल्ली रवाना होने का प्लान रहा. वे दिल्ली में 1 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे. इनके 2 जून को मुंबई जाने का भी कार्यक्रम है. प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठक के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच व्यापार, सुरक्षा, रक्षा समेत कई मुद्दों पर बातचीत और डील होने की संभावना है.

वहीं, म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग की इस पहली आधिकारिक यात्रा पर भारत और म्यांमार के रिश्तों की खास चर्चा हो रही है. भारत का इस देश के साथ करीब 1643 किलोमीटर लंबा बॉर्डर है. इतना ही नहीं म्यांमार को दक्षिण एशिया में भारत का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है. बता दें कि फरवरी 2021 में म्यांमार में आंग सान सू ची की सरकार का तख्तापलट हो गया था. तब देश की कमान सेना के हाथों में चली गई थी. यह तख्तापलट तब हुआ जब 1 फरवरी 2021 को चुनाव के बाद संसद की पहली बैठक होने वाली थी. जानकारी के अनुसार, 2021 में तख्तापलट के बाद ह्लाइंग ने कड़े और सख्त सैन्य नियंत्रण के साथ म्यांमार का नेतृत्व किया.

अप्रैल 2026 में उन्हें देश के निर्वाचित राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई गई. म्यांमार में दिसंबर से जनवरी तक संसदीय चुनाव हुए थे. इसमें आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी सहित कई राजनीतिक दलों ने हिस्सा लेने मना कर दिया था. भारत का एक पड़ोसी देश होने के नाते म्यांमार की भूमिका देश के लिए खास हो जाती है. वहीं, बीते कुछ सालों में इतनी सारी राजनीतिक उठा-पटक के बाद म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग पहली बार अपनी आधिकारिक यात्रा पर भारत आए हैं. आइए इस मौके पर दोनों देशों के बीच के रिश्ते पर एक नजर डालते हैं. इसके साथ ही भारत के पूर्वोत्तर इलाके के लिए चीन की चुनौतियों के बीच म्यांमार भारत के लिए कितना अहम है, इसके बारे में भी जानेंगे. इसकी शुरुआत म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग की भारत की यात्रा और कार्यक्रमों से करते हैं.

भारत दौरे पर म्यांमार के राष्ट्रपति

म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग भारत की पांच दिनों की यात्रा आज बिहार के बोधगया पहुंचे. इस यात्रा का उद्देश्य व्यापार और रक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के तरीकों का पता लगाना है. दिसंबर से जनवरी तक पड़ोसी देश म्यांमार में हुए संसदीय चुनावों के बाद भारत की यह पहली उच्च स्तरीय यात्रा है. म्यांमार के राष्ट्रपति को 1 जून को अंतर्राष्ट्रीय बिग कैट एलायंस शिखर सम्मेलन (International Big Cat Alliance Summit) में भाग लेने के लिए भारत आना था, लेकिन शिखर सम्मेलन स्थगित होने के कारण उनकी इस यात्रा का समय बदल दिया गया.

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विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, म्यांमार के राष्ट्रपति के साथ कई कैबिनेट मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों और व्यापारिक नेताओं सहित एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी है. मंत्रालय ने कहा कि राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग 1 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दोनों देशों के बीच “ऐतिहासिक और सभ्यतागत” संबंधों को और मजबूत करने के लिए चर्चा करेंगे. बोधगया के बाद म्यांमार के राष्ट्रपति दिल्ली में होंगे. वे 1 जून को पीएम मोदी के साथ मीटिंग करेंगे. उसके बाद वह 2 जून को मुंबई की यात्रा करेंगे, जहां वे व्यापार और उद्योग जगत से बातचीत करेंगे और विभिन्न स्थलों का दौरा करेंगे. जानकारी के मुताबिक, म्यांमार भारत की ‘पड़ोसी पहले’, ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘महासागर’ नीतियों के संगम पर स्थित है. विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग की भारत की आधिकारिक यात्रा से दोनों देशों के बीच बहुआयामी संबंधों को और मजबूत और गहरा करने की उम्मीद है.”

भारत और म्यांमार रिश्ता व बॉर्डर

विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत और म्यांमार के रिश्ते ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दोनों ही रहे हैं. इन दोनों देशों की जड़े ऐतिहासिक परंपराओं और सांस्कृतिक व धार्मिक संबंधों से जुड़ी हुई हैं. भगवान बुद्ध की धरती के रूप में भारत, म्यांमार और वहां के लोगों के लिए काफी पवित्र और आस्था वाला माना जाता है. एक वजह यह भी है कि आज म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग ने भारत में अपनी आधिकारिक यात्रा की शुरुआत भगवान बुद्ध की ज्ञानस्थली कही जाने वाली बिहार की धरती बोधगया से की. वे म्यांमार से सीधे बोधगया ही पहुंचे.

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म्यांमार में भारतीय दूतावास की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, भारत का म्यांमार के साथ कुल 1643 किलोमीटर की सीमा लगती है. इनमें से करीब 510 किलोमीटर चीन और मिजोरम के बीच, 398 किलोमीटर मणिपुर और चीन व सागाइंग क्षेत्र के बीच, 215 किलोमीटर नागालैंड और सागाइंग क्षेत्र के बीच, वहीं 520 किलोमीटर अरुणाचल प्रदेश और सागाइंग/काचिन क्षेत्र के बीच स्थित है.

म्यांमार को दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है. दोनों देशों के बीच भाषाई, धार्मिक और जातीय संबंधों की समृद्ध विरासत है. इसके अलावा म्यांमार एकमात्र आसियान देश है जो भारत की सीमा से लगा हुआ है. यही वजह से है कि इसे दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंचने के लिए भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है.

भारत-म्यांमार व्यापार

जुलाई 2025 के आंकड़ों के अनुसार, म्यांमार भारत का एक खास और बड़े व्यापारिक साझदार देशों में से एक देश रहा है. दोनों देशों के बीच 1970 में व्यापार समझौता हुआ था, उसके बाद भारत और म्यांमार के बीच द्विपक्षीय व्यापार में लगातार बढ़ोतरी देखी गई. वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच 2.1 अरब अमेरिकी डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार था. इनमें भारत का करीब 614 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निर्यात और म्यांमार से करीब 1533 मिलियन अमेरिकी डॉलर का आयात शामिल है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत और म्यांमार के बीच वित्त वर्ष 2020-21 में 1.29 मिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार था, जो 2021-22 में बढ़कर 1.89 मिलियन अमेरिकी डॉलर, 2022-23 में 1.76 मिलियन अमेरिकी डॉलर और 2023-24 में 1.74 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया था.

जानकारी के अनुसार, भारत मुख्य रूप से म्यांमार को पशु उत्पाद, दवाइयां, अनाज, कपास, वाहन, बिजली की मशीनरी, खाद्य पदार्थ, पशु अहार समेत अन्य चीजों की सप्लाई करता है. वहीं, म्यांमार, भारत को दाल, कृषि उत्पाद और लकड़ी के उत्पाद समेत अन्य चीजों को देता है. भारत की ओर से दवाइयां का जहां अधिक मात्रा में निर्यात किया जाता है, वहीं म्यांमार से भारत मसूर और सेम जैसी दालों का अधिक मात्रा में आयात करता है.

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भारत और म्यांमार रक्षा सहयोग

भारत और म्यांमार के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग को लेकर भी रिश्ते खास मजबूत हैं. यह बीते कई वर्षों में और भी मजबूत हुए हैं. आधिकारिक जानकारी के अनुसार, साल 2019 में तब भारत के तत्कालीन रक्षा सचिव संजय मित्रा ने म्यांमार का दौरा किया था. उसके बाद म्यांमार के डिफेंस फोर्सेज के कमांडर-इन-चीफ सीनियर जनरल यू मिन आंग ह्लाइंग ने जुलाई 2019 में भारत का दौरा किया था. फरवरी 2020 में तब भारत के नौसेना प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह ने म्यांमार का दौरा किया था. उसके बाद वहां के रक्षा सेवाओं के उप कमांडर-इं-चीफ वाइस सीनियर जनरल सो विन ने फरवरी 2020 में ही एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए भारत आए थे.

वहीं, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जून 2020 में म्यांमार के डिफेंस फोर्सेज के कमांडर-इन-चीफ सीनियर जनरल यू मिन आंग ह्लाइंग से रूस की राजधानी मॉस्को में मुलाकात की थी. इन दोनों की यह मीटिंग 24 जून 2020 को मॉस्को में रूस के विजय दिवस परेड के दौरान हुई थी. म्यांमार भारत का पड़ोसी देश होने के नाते सीमा और देश की सुरक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है. इसलिए दोनों देशों के बीच सुरक्षा और रक्षा को लेकर कई बार बातचीत होती रही है और आगे भी होने की संभावना है.

भारत और म्यांमार के प्रोजेक्ट्स

पड़ोसी देश म्यांमार में भारत ने अपने कई अहम प्रोजेक्ट्स लगा रखे हैं. इनमें से एक है लादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट. इसके जरिए भारत के कोलकाता बंदरगाह को म्यांमार के रास्ते देश के मिजोरम से जोड़ने का प्लान रहा है. इसके अलावा भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग का प्रोजेक्ट भी है. इसके तहत सड़क की कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए रास्तों के निर्माण पर भारी निवेश किया जा रहा है. इनके अलावा बैंकिंग क्षेत्र में म्यांमार ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को कमर्शियल बैंकिंग लाइसेंस दे रखा है. यह 2016 में बैंक को म्यांमार सरकार के द्वारा दिया गया था. वहीं, पंजाब नेशनल बैंक का प्रतिनिधि ऑफिस यांगोन में है. इन सभी के साथ ही दोनों देशों के बीच संस्कृति, आपदा राहत, विकास सहयोग, निवेश, बैंकिंग और वित्तीय सहयोग समेत अन्य सहयोग समय के साथ-साथ जारी रहता है.

चीन की चुनौतियों के बीच कितने अहम भारत-म्यांमार रिश्ते?

दुनिया जानती है कि 1 फरवरी 2021 को म्यांमार में सेना ने तख्तापलट कर दिया था. तब म्यांमार की सेना के कमांडर इन-चीफ सीनियर जनरल यू मिन आंग ह्लाइंग ने देश की कमान को अपने हाथों में ले ली थी. वे सेना के इस सर्वोच्च पद पर 2011 से 2026 तक रहे. चुनाव के बाद उन्होंने 2026 में म्यांमार के राष्ट्रपति के रूप में पदभार ग्रहण किया. उनके बाद जनरल विन ऊ को म्यांमार का नया कमांडर इन-चीफ नियुक्त किया गया.

म्यांमार में चाहें फरवरी 2021 से पहले आंग सान सू ची की सरकार हो या फिर उसके बाद तख्तापलट और अब यू मिन आंग ह्लाइंग की सरकार हो, दोनों समय पर भारत का इसके साथ रिश्ता अच्छा रहा है. म्यांमार का भारत के साथ 1600 किलोमीटर से अधिक की सीमा लगती है और यह देश भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए भी चीन के बढ़ते आक्रामक तेवर के बीच खास है.

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भारत ने म्यांमार में सत्ता परिवर्तन के दौरान और उसके बाद अपनी शानदार कूटनीतिक बैलेंस को बनाए रखा है. चीन की बढ़ती विस्तारवादी नीति और उसके आक्रामकता के बीच म्यांमार के साथ भारत का संबंध अच्छे रहना बहुत जरूरी है. जैसा कि हमने ऊपर भी बताया है कि म्यांमार भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है. इसको देखते हुए भारत इस देश में अपनी सड़क, एनर्जी और हेल्थ से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को काफी मजबूत कर रहा है ताकि चीन के बढ़ते आर्थिक फैलावे और लालच का अच्छे से जवाब दिया जा सके. इसके अलावा, घुसपैठ को रोकने में भी यह पड़ोसी देश काफी अहम माना जाता रहा है.

भारत का बॉर्डर चीन और म्यांमार दोनों के साथ लगता है. कुछ हिस्से ऐसे हैं, जहां म्यांमार के साथ चीन के भी कुछ इलाके हैं. इसको देखते हुए म्यांमार से भारत का रिश्ता काफी अहम है. खासकर के देश के पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर के. चीन हमेशा से भारत के अरुणाचल प्रदेश समेत अन्य भागों पर अपनी नजर टिकाए हुए बैठा रहता है. उसकी इस आदत और विस्तारवादी नीति का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए कई जगहों पर म्यांमार भारत के लिए खास हो जाता है.

बता दें कि दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान) में कुल 11 देश शामिल हैं – ब्रुनेई दारुस्सलाम, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, तिमोर-लेस्ते और वियतनाम. दक्षिण चीन सागर में, जो दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापार मार्गों में से एक है, फिलीपींस और वियतनाम सहित कई आसियान सदस्य देशों के चीन के साथ समुद्री दावे ओवरलैप करते हैं. इस क्षेत्र में भारत म्यांमार के जरिए अपना अहम योगदान निभा सकता है. मतलब कि दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र में भारत इसके जरिए कई बड़े कामों को कर सकता है. इसमें उसे चीन का इंतजार करने की जरूरत भी नहीं होगी. इसलिए भी म्यांमार को भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वारा कहा जाता है.

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