India-Nepal Border Dispute: भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने घनिष्ठ संबंध सीमा विवाद के कारण एक बार फिर गरमा गए हैं. हाल ही में, नेपाल के नए और सबसे युवा प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने नेपाली संसद में भारत के साथ सीमा विवाद के संबंध में एक बेहद अप्रत्याशित और विवादास्पद बयान दिया. इस बयान ने न केवल नेपाल की घरेलू राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि भारत और नेपाल के राजनयिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न की हैं. नेपाली प्रधानमंत्री ने इस विशुद्ध द्विपक्षीय मामले में चीन और ब्रिटेन जैसे तीसरे पक्षों को घसीटने का प्रयास किया है, जिस पर भारत ने कड़ा विरोध जताया है.
बालेन ने हाल ही में क्या बयान दिया?
प्रधानमंत्री का पद संभालने के लगभग दो महीने बाद नेपाली संसद को संबोधित करते हुए 35 वर्षीय प्रधानमंत्री बालेन शाह ने एक सांसद के प्रश्न के उत्तर में कहा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि न केवल भारत ने नेपाली भूमि पर अतिक्रमण किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारतीय क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया है. उन्होंने यह भी कहा कि विवादित क्षेत्र- लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी औपनिवेशिक काल (ब्रिटिश शासन) से संबंधित है. इसलिए, नेपाल ने इस ऐतिहासिक सीमा मुद्दे के संबंध में भारत के अलावा चीन और ब्रिटेन की सरकारों से भी संपर्क किया है और ब्रिटेन से इस मामले के ऐतिहासिक तथ्यों को साझा करने का अनुरोध किया है.
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नेपाल में इतना हंगामा क्यों?
नेपाल के प्रधानमंत्रियों ने परंपरागत रूप से भारत पर भूमि हड़पने का आरोप लगाया है. बालेन शाह के इस बयान से कि नेपाल ने भी भारतीय भूमि हड़पी है विपक्ष को आपत्ति हुई. नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (सीपीएन) के सांसदों ने संसद में जमकर हंगामा किया और इस बयान को राष्ट्र विरोधी और गैर जिम्मेदाराना बताया. पूर्व उप प्रधानमंत्री कमल थापा और अन्य नेताओं ने कहा कि प्रधानमंत्री के बयान से कालापानी और लिपुलेख पर नेपाल का दावा कमजोर हुआ है और उन्हें तुरंत माफी मांगनी चाहिए. काठमांडू में छात्र संगठनों और युवाओं ने बालेन शाह के खिलाफ नारे लगाए और उनके इस्तीफे की मांग की.

विदेश मंत्रालय का स्पष्टीकरण: स्थिति बिगड़ने पर नेपाल के विदेश मंत्रालय को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा, जिसमें कहा गया कि प्रधानमंत्री का तात्पर्य किसी संप्रभु क्षेत्र पर कब्जे से नहीं था, बल्कि सीमा पर स्थित ‘नो मैन्स लैंड’ क्षेत्र से था, जहां दोनों देशों के स्थानीय किसान एक-दूसरे की जमीन पर खेती कर रहे हैं.
इस पर भारत की क्या प्रतिक्रिया थी?
नेपाली प्रधानमंत्री के बयान, विशेषकर तीसरे देश की मध्यस्थता की मांग पर भारत सरकार ने तीखी और कड़ा जवाब दिया है. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत और नेपाल के पास सीमा संबंधी सभी मुद्दों के समाधान के लिए पहले से ही सक्षम द्विपक्षीय संस्थागत तंत्र मौजूद हैं.भारत ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी तरह से दोनों देशों का आंतरिक और आपसी मामला है. चीन, ब्रिटेन या किसी भी तीसरे देश का हस्तक्षेप या मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं होगी.भारत ने दोहराया है कि कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा ऐतिहासिक और प्रशासनिक रूप से भारत के अभिन्न अंग हैं, और भारत इस रुख पर अडिग है.
भारत-नेपाल सीमा विवाद क्या है?
भारत और नेपाल लगभग 1,850 किलोमीटर लंबी खुली सीमा साझा करते हैं, जिसका 98% भाग पूरी तरह से सीमांकित और स्वीकृत है. विवाद सीमा के केवल 2% भाग से संबंधित है, जो दो क्षेत्रों पर केंद्रित है.
- कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा विवाद (उत्तराखंड सीमा): यह विवाद लगभग 210 साल पुराना है और इसकी जड़ें 1816 की सुगौली संधि में हैं. यह संधि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के गोरखा राजा के बीच युद्ध के बाद हस्ताक्षरित की गई थी.
- नदी के उद्गम को लेकर विवाद: सुगौली संधि में यह निर्धारित किया गया था कि महाकाली (शारदा) नदी भारत और नेपाल के बीच पश्चिमी सीमा बनाएगी. हालांकि, संधि में नदी के वास्तविक स्रोत का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था.
नेपाल का दावा: नेपाल का मानना है कि महाकाली नदी का वास्तविक स्रोत लिम्पियाधुरा से निकलने वाली धारा है. इसके आधार पर, लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी (लगभग 370 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र) नेपाल का हिस्सा होना चाहिए.
भारत का दावा: भारत का मानना है कि महाकाली नदी का उद्गम कालापानी पर्वतमाला में स्थित अन्य जलस्रोतों व धाराओं से होता है, जिसे वह प्रशासनिक रूप से लंबे समय से मान्यता देता आ रहा है. भारत ने 1950 के दशक से, और विशेष रूप से 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से, रणनीतिक सुरक्षा कारणों से इस क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखा है.
2020 का मानचित्र विवाद: 2020 में, भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से चीन सीमा पर स्थित लिपुलेख दर्रे तक 80 किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन किया (जो कैलाश मानसरोवर यात्रा को सुगम बनाती है). तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने इसका कड़ा विरोध किया और नेपाल का एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को आधिकारिक तौर पर नेपाल का हिस्सा दिखाया गया. नेपाल ने इसके लिए अपने संविधान में संशोधन भी किया, जिसे भारत ने पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया.
सुस्ता क्षेत्र विवाद (बिहार सीमा): एक अन्य प्रमुख विवाद बिहार सीमा पर स्थित सुस्ता क्षेत्र से संबंधित है. यह विवाद समय के साथ गंडक नदी (नारायणी नदी) के प्रवाह में हुए परिवर्तनों से उत्पन्न हुआ है. सुगौली संधि में गंडक नदी को सीमा रेखा के रूप में निर्धारित किया गया था. हालांकि, पिछले कुछ दशकों में नदी ने अपना मार्ग बदल लिया है, जिससे नेपाल की ओर दिखाई देने वाली कुछ भूमि भारतीय क्षेत्र में स्थानांतरित हो गई है, और दोनों देशों के किसान इस पर स्वामित्व का दावा करते हैं.

भारत ने नेपाल सीमा विवाद में चीन या ब्रिटेन जैसे किसी भी तीसरे देश के हस्तक्षेप को नकारा
इस विवाद पर चीन का क्या रुख है?
नेपाल-भारत सीमा विवाद पर चीन का रुख हमेशा से रणनीतिक और अवसरवादी रहा है. चीन इस विवाद को भारत को सीधे घेरने और नेपाल को अपने पाले में लाने के एक हथियार के रूप में देखता है. 2015 में, जब भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने पर सहमति जताई, तो नेपाल ने दोनों देशों के समक्ष विरोध दर्ज कराया. उस समय चीन ने नेपाल के दावों को नजरअंदाज कर दिया था.
नेपाल के राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना: हालांकि, हाल के वर्षों में (विशेषकर 2020 के बाद से), चीन ने नेपाल के भारत विरोधी राष्ट्रवाद और नए राजनीतिक मानचित्र का परोक्ष रूप से समर्थन किया है. चीन भारत की उत्तरी सीमा पर रणनीतिक दबाव डालने के लिए नेपाल में बड़े पैमाने पर अवसंरचना निवेश के माध्यम से काठमांडू सरकार पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है.
त्रिकोणीय जंक्शन का महत्व: कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र भारत, नेपाल और चीन के त्रिकोणीय जंक्शन पर स्थित हैं. चीन यह मानता है कि यह भारत का सबसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील हिस्सा है, जहां से चीनी गतिविधियों पर नज़र रखी जा सकती है. इसलिए चीन चाहता है कि यह क्षेत्र भारत के नियंत्रण से बाहर रहे.
भारत और नेपाल के इन जिलों से होकर गुजरती है विवादित सीमा ?
यह सीमा विवाद मुख्य रूप से भारत के दो राज्यों (उत्तराखंड और बिहार) तथा नेपाल के सुदूर-पश्चिम और दक्षिणी प्रांतों के जिलों को प्रभावित करता है. उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले (धारचुला तहसील) और नेपाल के सुदूरपश्चिम प्रांत दार्चुला जिले से विवादित क्षेत्र कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा लगा है.
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दोनों देश सीमा विवाद सुलझाने के लिए क्या कर रहे हैं?
यद्यपि हालिया बयानों से कूटनीतिक तनाव बढ़ा है, लेकिन दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे सीमा विवाद के तकनीकी और व्यावहारिक समाधान के लिए प्रयास जारी हैं.
संयुक्त सीमा कार्य समूह : भारत और नेपाल ने सीमाओं के तकनीकी सीमांकन के लिए इस उच्चस्तरीय समूह का गठन किया है. इस तंत्र के तहत दोनों देशों के सर्वेक्षण अधिकारी आधुनिक जीपीएस और डिजिटल मैपिंग के जरिए विवादित स्थलों का संयुक्त निरीक्षण कर रहे हैं.
नो मैन्स लैंड का मानचित्रण: विदेश मंत्रालय के अनुसार, सीमा पर जहां-जहां अतिक्रमण या स्थानीय किसानों द्वारा एक-दूसरे की ज़मीन पर ‘क्रॉस-होल्डिंग’ की गई है, वहां संयुक्त रूप से नए सिरे से मानचित्रण (Mapping) का काम किया जा रहा है ताकि स्थानीय स्तर पर विवादों को सुलझाया जा सके.
राजनयिक संवाद : दोनों देशों के विदेश सचिवों की बैठकों में सीमा मुद्दे को एजेंडे में रखा जाता है. भारत का हमेशा से मानना रहा है कि स्थापित ऐतिहासिक साक्ष्यों और मैत्रीपूर्ण संवाद के जरिए ही 2% बचे हुए विवाद को हल किया जा सकता है, न कि एकतरफा नक्शे बदलकर या घरेलू राजनीति के लिए बयानबाजी करके.
भारत और नेपाल के संबंध केवल कागजी संधियों पर नहीं, बल्कि ‘रोटी-बेटी और खुली सीमा’ की अनूठी जन-सांस्कृतिक विरासत पर टिके हैं. प्रधानमंत्री बालेन शाह द्वारा संसद में दिया गया बयान और उसमें चीन व ब्रिटेन को शामिल करने की वकालत कूटनीतिक रूप से अपरिपक्व कदम माना जा रहा है, जिससे नेपाल के भीतर ही उनकी किरकिरी हो रही है. भारत ने साफ कर दिया है कि पड़ोसी देशों के साथ किसी भी सीमा मुद्दे में तीसरे पक्ष की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी. उम्मीद यही है कि दोनों देश जल्द ही इस ऐतिहासिक उलझन का एक तार्किक समाधान निकालेंगे, ताकि इस क्षेत्र की शांति और सुरक्षा बनी रहे .
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