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महाशक्तियों के बीच नेपाल: विदेश मंत्री खनाल के चीन दौरे से क्या बदलेगा उपमहाद्वीप का समीकरण?

by Sanjay Kumar Srivastava 13 June 2026, 8:38 PM IST
13 June 2026, 8:38 PM IST
महाशक्तियों के बीच नेपाल: दिल्ली के बाद बीजिंग, विदेश मंत्री खनाल के चीन दौरे से क्या बदलेगा उपमहाद्वीप का समीकरण?

India-Nepal-China Relation: नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल का 14 जून से शुरू होने वाला चीन दौरा काठमांडू की ‘संतुलन कूटनीति’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके जरिए नई सरकार भारत और चीन दोनों महाशक्तियों के साथ अपने रिश्तों को एक नए सिरे से परिभाषित कर रही है. मार्च 2026 में नेपाल में प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व में बनी नई सरकार के सत्ता संभालने के बाद विदेश मंत्री खनाल ने 5 से 7 जून तक भारत की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा की थी. इसके ठीक एक हफ्ते बाद 14 से 17 जून 2026 तक उनकी चीन यात्रा, नेपाल की उस पारंपरिक विदेश नीति की तरफ इशारा करती है जिसमें वह किसी एक पड़ोसी की तरफ पूरी तरह झुके बिना दोनों देशों को समान महत्व देने की कोशिश करता है.

शिशिर के चीन दौरे का मुख्य मकसद

नेपाल के विदेश मंत्रालय द्वारा साझा की गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, शिशिर खनाल चीनी विदेश मंत्री वांग यी के विशेष निमंत्रण पर बीजिंग जा रहे हैं. इस चार दिवसीय दौरे के प्रमुख उद्देश्य ये हैं.

  • राजनीतिक विश्वास की बहाली: नेपाल में बालेन शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की सरकार बनने के बाद चीन के शीर्ष नेतृत्व के साथ आपसी विश्वास और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना इस यात्रा का प्राथमिक एजेंडा है.
  • आर्थिक निवेश और व्यापारिक चर्चा: बीजिंग में नेपाली दूतावास द्वारा एक निवेश सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है. इसमें विदेश मंत्री खनाल चीनी व्यापारिक समुदाय को नेपाल में निवेश के अवसरों के लिए आकर्षित करेंगे.
  • लंबित परियोजनाओं की समीक्षा: चीन की महात्वाकांक्षी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत नेपाल में कई बुनियादी ढांचा परियोजनाएं लंबे समय से रुकी हुई हैं. इस बैठक में उन परियोजनाओं को गति देने पर चर्चा होगी.
  • सीमा पार कनेक्टिविटी: नेपाल और चीन के बीच हिमालय पार रेलवे और सड़क नेटवर्क के विस्तार पर ठोस बातचीत प्रस्तावित है.

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भारत के तुरंत बाद चीन जाने की जल्दी के पीछे की रणनीति

कूटनीतिक हलकों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत दौरे के ठीक एक सप्ताह बाद ही बीजिंग जाने की इतनी जल्दी क्या थी? इसके पीछे नेपाल की एक गहरी रणनीतिक सोच है.

  • समान दूरी की नीति: नेपाल खुद को भारत और चीन के बीच फंसा एक ‘भू-आबद्ध’ (Landlocked) देश मानता है. नेपाल की नई सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह किसी भी एक खेमे का हिस्सा नहीं है. भारत की यात्रा के तुरंत बाद चीन जाना यह दिखाता है कि काठमांडू दोनों पड़ोसियों को समान कूटनीतिक तरजीह दे रहा है.
  • विवादों पर स्वतंत्र रुख: नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शिशिर खनाल ने साफ किया था कि नेपाल अपनी नई राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ आगे बढ़ रहा है और वह भारत या चीन के बीच किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं चाहता. चीन जाकर वे चीनी नेतृत्व को भी इसी संप्रभु रुख से अवगत कराना चाहते हैं.

क्या नेपाल भारत से ज्यादा चीन को तरजीह दे रहा है?

नहीं, नेपाल चीन को भारत से ज्यादा तरजीह नहीं दे रहा है, बल्कि वह दोनों के बीच संतुलन साध रहा है. शिशिर खनाल ने भारत में स्पष्ट शब्दों में कहा था कि भारत-नेपाल के संबंध केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और गहरे मानवीय जुड़ाव पर आधारित हैं. नेपाल के लिए भारत को छोड़ना व्यावहारिक रूप से असंभव है क्योंकि नेपाल का तीन तरफ से खुला बॉर्डर भारत के साथ है, जबकि चीन के साथ तिब्बत की दुर्गम हिमालयी सीमा लगती है. नेपाल चीन के साथ संबंध बढ़ाकर भारत पर अपनी पूर्ण निर्भरता को कम करना चाहता है, न कि भारत को पूरी तरह रिप्लेस करना चाहता है.

हाल ही में बनी नई सरकार के भारत से रिश्ते

नेपाल की वर्तमान सरकार भारत को पिछली सदी के चश्मे से नहीं देखती. विदेश मंत्री खनाल के मुताबिक, नेपाल आज के भारत को एक उभरती हुई वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में देखता है और इस विकास यात्रा का हिस्सा बनना चाहता है.

सीमा विवाद पर कूटनीतिक रुख: कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे सीमा मुद्दों पर नेपाल ने कड़ा रुख तो बरकरार रखा है, लेकिन उसने स्पष्ट किया है कि इन मुद्दों का समाधान युद्ध या तनाव से नहीं, बल्कि द्विपक्षीय कूटनीतिक वार्ताओं के जरिए शांतिपूर्ण ढंग से किया जाएगा.

नेपाल अपनी विभिन्न जरूरतों के लिहाज से भारत और चीन को अलग-अलग तराजू में तौलता है. इसे इस तरह आसानी से समझा जा सकता है.

  • आर्थिक व व्यापारिक: नेपाल का 65% से अधिक व्यापार भारत के साथ होता है. दैनिक उपभोग की चीजें, ईंधन (पेट्रोल-डीजल) और दवाइयां भारत से आती हैं. चीन नेपाल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन वहां से मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक सामान और मशीनरी आती है. आर्थिक मोर्चे पर नेपाल भारत को अधिक महत्व देता है, क्योंकि नेपाल की दैनिक अर्थव्यवस्था पूरी तरह भारत पर निर्भर है.
  • रणनीतिक व कनेक्टिविटीः नेपाल के पास कोलकाता और विशाखापत्तनम बंदरगाहों के जरिए समुद्र तक सीधी पहुंच है. चीन ने नेपाल को अपने बंदरगाहों के इस्तेमाल की अनुमति दी है, लेकिन तिब्बत का पहाड़ी रास्ता अत्यधिक लंबा और खर्चीला है. नेपाल हमेशा भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहता है क्योंकि भारत के रास्ते व्यापार करना भौगोलिक रूप से बेहद आसान और सस्ता है.

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  • सुरक्षा व सैन्यः भारतीय सेना और नेपाली सेना के बीच ऐतिहासिक संबंध हैं. दोनों देशों के प्रमुख एक-दूसरे की सेना के मानद जनरल होते हैं. चीन के साथ नेपाल की सेना संयुक्त सैन्य अभ्यास करती है, लेकिन यह केवल प्रतीकात्मक है. रक्षा मामले में भी नेपाल भारत को अधिक महत्व देता है, क्योंकि दोनों देशों की सुरक्षा और खुली सीमाएं एक-दूसरे से सीधे जुड़ी हैं.
  • बुनियादी ढांचा (Infrastructure): भारत नेपाल में जलविद्युत परियोजनाओं (Hydro power) और ट्रांसमिशन लाइनों का बड़ा विकास कर रहा है.चीन हवाई अड्डों (जैसे पोखरा एयरपोर्ट), सड़कों और फैक्ट्रियों के निर्माण में भारी ऋण और सहायता देता है. बुनियादी ढांचे के मामले में नेपाल चीन को ज्यादा महत्व देता है, क्योंकि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए चीन के पास अधिक वित्तीय क्षमता है.

चीन नेपाल की कैसे करता है मदद ?

चीन पिछले एक दशक में नेपाल के भीतर एक बड़े ‘दाता और विकास भागीदार’ के रूप में उभरा है. चीन ने नेपाल के पोखरा और लुंबिनी में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के निर्माण में वित्तीय मदद दी है. भारत पर निर्भरता कम करने के लिए चीन ने नेपाल को अपने चार समुद्री बंदरगाहों और तीन सूखे बंदरगाहों (Dry Ports) के इस्तेमाल की अनुमति दी है.

इसके अलावा कोरोना महामारी के दौरान और 2015 के विनाशकारी भूकंप के समय चीन ने नेपाल को बड़े पैमाने पर चिकित्सा सामग्री, टीके और पुनर्निर्माण सहायता भेजी थी. चीन अपने नागरिकों को नेपाल की यात्रा करने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिससे नेपाल के पर्यटन उद्योग को बड़ा आर्थिक सहारा मिलता है. नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार ने देश की विदेश नीति में बड़ा बदलाव करते हुए चीन और अमेरिका दोनों के प्रति कड़ा और सतर्क रुख अपनाया है.

चीन के BRI और अमेरिका के MCC पर स्टैंड

  • BRI पर कड़ा प्रहार: बालेन शाह सरकार ने चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत पिछले सालों में हुए बुनियादी ढांचा समझौतों की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं. जांच पूरी होने तक चीन के साथ सभी नए प्रोजेक्ट्स पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है. चुनावी घोषणापत्र से भी चीनी प्रोजेक्ट्स को बाहर किया गया था.
  • MCC पर सतर्कता: अमेरिकी सहायता कार्यक्रम मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (MCC) और रणनीतिक गतिविधियों को लेकर सरकार पूरी तरह सतर्क है. बालेन शाह गुटनिरपेक्षता की नीति पर जोर दे रहे हैं ताकि नेपाल महाशक्तियों की भू-राजनीतिक जंग का मैदान न बने.

भारत के सुरक्षा हितों पर प्रभाव

  • चीन के बढ़ते प्रभाव पर लगाम: नेपाल द्वारा चीनी परियोजनाओं की समीक्षा से हिमालयी क्षेत्र में भारत के खिलाफ चीन के रणनीतिक घेराव की कोशिशों को झटका लगा है.
  • सीमा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन: बालेन शाह ने नेपाल को एक ‘बफर जोन’ की जगह दोनों देशों के बीच ‘सेतु’ बनाने की बात कही है. हालांकि, सीमा विवाद और सरकार की ‘प्रो-नेपाल’ नीति के कारण भारत को खुली सीमा के जरिए होने वाली घुसपैठ और भारत-विरोधी तत्वों पर नजर रखने के लिए अपनी सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी होगी.

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नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह की विदेश नीति पुरानी सरकारों की तुलना में अत्यधिक व्यावहारिक, परिणाम-उन्मुख और ‘राष्ट्र-प्रथम’ के सिद्धांत पर आधारित है. पारंपरिक कम्युनिस्ट या कांग्रेस सरकारों के विपरीत, जो अक्सर वैचारिक रूप से भारत या चीन के प्रति झुकाव रखती थीं, बालेन शाह की नीति पूरी तरह से गैर-वैचारिक है.

नेपाल की कूटनीति के तीन सबसे मुख्य बदलाव

  • समान दूरी और सख्त संतुलन: बालेन शाह दोनों पड़ोसियों से एक समान कूटनीतिक दूरी बनाए रखते हैं. वे भारत या चीन के बीच चल रही भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में मोहरा बनने के बजाय दोनों से केवल आर्थिक लाभ लेने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.
  • मुखर रुख: पुरानी सरकारों की तुलना में उनकी नीति अधिक आक्रामक है. सीमा विवाद (जैसे कालापानी) हो या राष्ट्रीय संप्रभुता के मुद्दे, वे बिना किसी हिचकिचाहट के डिजिटल और कूटनीतिक मंचों पर नेपाल का पक्ष मजबूती से रखते हैं.
  • आर्थिक कूटनीति को प्राथमिकता: वे पुरानी राजनीतिक बहसों को छोड़कर व्यापार, जलविद्युत (Hydro-power), और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को कूटनीति का मुख्य केंद्र बना रहे हैं.

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल का यह चीन दौरा इस बात का प्रमाण है कि काठमांडू में बैठी नई सरकार बेहद परिपक्वता के साथ कदम बढ़ा रही है. वह बीजिंग जाकर ड्रैगन को साधने की कोशिश कर रही है, लेकिन इसके ठीक पहले नई दिल्ली का दौरा कर उसने भारत को यह आश्वस्त भी कर दिया है कि भारत के साथ उसके ‘रोटी-बेटी’ के पारंपरिक संबंध हमेशा सर्वोच्च रहेंगे. नेपाल किसी भी महाशक्ति के हाथों का खिलौना बनने के बजाय अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता और आर्थिक विकास को केंद्र में रखकर दोनों पड़ोसियों से लाभ उठाने की नीति पर चल रहा है.

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