Draupadi Invent Pani Puri: भारत में अगर किसी स्ट्रीट फूड को लेकर सबसे ज्यादा बहस होती है, तो वो निस्संदेह पानी पुरी है. किसी के लिए ये गोलगप्पा है, तो किसी के लिए पुचका. कोई इसे गुपचुप कहता है तो कोई, बताशे और कोई फुल्की. पानी पुरी को लेकर हर शहर का अपना स्वाद, अपनी रेसिपी और अपनी कहानी है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस चटपटे और लाजवाब स्नैक की शुरुआत कैसे, कब और कहां हुई? दिलचस्प बात ये है कि पानी पुरी की उत्पत्ति को लेकर कई पुरानी और अलग-अलग कहानियां फेमस हैं. इनमें से सबसे लोकप्रिय है महाभारत काल से जुड़ी हुई कहानी है. ऐसा कहा जाता है कि पानी पुरी का जन्म पांचाली यानी द्रौपदी की समझदारी और उनकी अनोखी की अनोखी कला का नतीजा थी. हालांकि, इतिहासकार इसकी एक अलग कहानी भी बताते हैं. आज आपको पानी पुरी की उन्हीं दोनों दिलचस्प दास्तानों के बारे में बताएंगे.
पानी पुरी की पौराणिक कहानी
लोककथाओं और अमर चित्र कथा में वर्णन आता है. दरअसल, एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांडव अपने 12 वर्ष के वनवास के मुश्किल दिनों से गुजर रहे थे. उन्हीं दिनों पांडवों का विवाह द्रौपदी के साथ हुआ था. यानी द्रौपदी नई नवेली बहू थीं. नई बहू के रूप में द्रौपदी की समझदारी, धैर्य और गृह प्रबंधन यानी होम मैनेजमेंट की परीक्षा लेना स्वाभाविक माना गया. कहानी के अनुसार, एक दिन उनकी सास और पांडवों की माता कुंती ने द्रौपदी की परीक्षा लेने का फैसला किया. उन्होंने रसोई में बची हुई थोड़ी सी आलू की सब्जी और सिर्फ इतनी गेहूं की लोई दी, जिससे मुश्किल से एक या दो छोटी रोटी बन सकती थी. ये देखकर कुंती ने द्रौपदी से कहा कि इन्हीं सीमित चीजों से वो कुछ ऐसा बनाए जिससे पांचों पांडवों का पेट भर जाए.

ये किसी भी नई गृहिणी के लिए काफी बड़ी चुनौती थी. लेकिन द्रौपदी ने हार मानने के बजाय अपनी बुद्धी का इस्तेमाल किया. उन्होंने गेहूं के आटे की उस छोटी सी लोई को कई हिस्सों में बांट दिया. हर हिस्से की छोटी-छोटी पूरी बेलीं और उन्हे तेल में तलकर फूली हुई कुरकुरी गोल पूरियां बना दिया. फिर द्रौपदी ने बची हुई आलू की सब्जी को छोटी-छोटी पूरियों में भरकर पांचों पांडवों को परोस दिया. पांडवों को द्रौपदी का बनाया ये नया और टेस्टी व्यंजन खूब पसंद आया. कहते हैं कि कुंती द्रौपदी की अनोखी सोच से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने इस व्यंजन को ही आशीर्वाद दे डाला. उन्होंने कहा कि ये व्यंजन आने वाले समय में लोगों के बीच हमेशा लोकप्रिय रहेगा. माना जाता है कि यही व्यंजन आगे चलकर पानी पुरी के रूप में हर तरफ मशहूर हुआ. हालांकि, महाभारत से जुड़ी इस कथा का कोई ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है. लेकिन भारतीय लोक परंपराओं में ये कहानी काफी ज्यादा लोकप्रिय है.
क्या कहता है इतिहास?
पौराणिक कथा पानी पुरी का श्रेय द्रौपदी को देती है. वहीं, इतिहासकार इस डिश की उत्पत्ति को प्राचीन मगध से जोड़ते हैं. ऐसा माना जाता है कि आज के बिहार और उसके आसपास के क्षेत्रों में सदियों पहले इस व्यंजन का शुरुआती रूप तैयार किया गया था. दरअसल, मगध, प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक था. इसका क्षेत्र आज के दक्षिणी बिहार में फैला हुआ था. माना जाता है कि ये राज्य 600 ईसा पूर्व से भी पहले अस्तित्व में था. यही वो धरती थी, जहां से आगे चलकर मौर्य और गुप्त साम्राज्य जैसे महान राजवंश उभरे. इतना ही नहीं, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के विकास में भी मगध की बहुत बड़ी भूमिका रही है. इसके अलावा ये भी माना जाता है कि, इसी ऐतिहासिक धरती पर पानी पुरी के शुरुआती रूप का भी जन्म हुआ. दरअसल, कई इतिहासकारों का मानना है कि, उस समय ये डिश मगध में ‘फुल्की’ के नाम से जानी जाती थी. दिलचस्प बात ये है कि आज भी भारत के कई हिस्सों में पानी पुरी को फुल्की ही कहा जाता है. शुरुआती दौर में इसकी पूरियां आज की तुलना में और थोड़ी छोटी और ज्यादा कुरकुरी हुआ करती थीं. हालांकि, उस समय इनमें किस तरह की फिलिंग भरी जाती थी, इसका कोई स्पष्ट उल्लेख कहीं नहीं मिलता. लेकिन ऐसा माना जाता है कि सदियों पहले भी इसमें आलू या किसी मसालेदार सब्जी का ही इस्तेमाल किया जाता होगा. वहीं, आज की तरह इमली, पुदीना, हरी मिर्च और मसालों से तैयार तीखा खट्टा और मीठा पानी उस समय मौजूद था या नहीं, इसका भी कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता. इसके अलावा इतिहास में किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं मिलता, जिसने पहली बार पानी पुरी को बनाया हो. यानी हो सकता है कि ये कई सालों में धीरे-धीरे विकसित हुई हो और अलग-अलग क्षेत्रों में इसके स्वाद और बनाने के तरीके बदलते रहे हों.

एक डिश, कई नाम
भारत की सांस्कृतिक विविधता का सबसे टेस्टी उदाहरण शायद पानी पुरी ही है. हमारे देश के अलग-अलग राज्यों में इसका नाम और स्वाद दोनों बदल जाते हैं. दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में इसे गोलगप्पा कहा जाता है. पश्चिम बंगाल में ये पुचका के नाम से मशहूर है. बंगाल में इमली के खट्टे पानी और मसालेदार आलू का स्वाद इसे खास बनाता है. ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में पानी पुरी को गुपचुप कहा जाता है. वहीं, उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में इसे बताशे के नाम से जाना जाता है. महाराष्ट्र और गुजरात में इसे पानी पुरी कहा जाता है. इन दोनों जगह पर मीठे और तीखे पानी का अनोखा मेल लोगों को खूब पसंद आता है. देखा जाए तो, हर शहर दावा करता है कि उसके यहां मिलने वाली पानी पुरी सबसे ज्यादा स्वादिष्ट है. शायद यही इस डिश की सबसे बड़ी खूबसूरती और स्वाद भी है.
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सिर्फ स्वाद नहीं, अनुभव भी
पानी पुरी सिर्फ एक स्नैक नहीं, बल्कि भारतीय स्ट्रीट फूड संस्कृति का अहम हिस्सा है. सड़क किनारे ठेले पर खड़े होकर दोस्तों और परिवार के साथ एक-एक कर कुरकुरी पूरियां खाना अपने आप में एक अलग अनुभव होता है. भारत में शायद ही कोई ऐसा हो, जिसने सड़क किनारे इस डिश को ना खाया हो. अब तो विदेश में भी पानी पुरी की धूम है. विदेश में कई इंडियन रेस्टोरेंट्स पानी पुरी बेच-बेचकर लाखों रुपये कमाते हैं. सिर्फ भारत के लोग ही नहीं, बल्कि विदेशी भी पानी पुरी के दीवाने हो रहे हैं. आज इस डिश के कई मॉर्डन रूप भी देखने को मिलते हैं. कहीं चॉकलेट वाली पानी पुरी मिलती है तो कहीं चीज़, पनीर, चाइनीज, पास्ता वाली. यहां तक कि आइसक्रीम पानी पुरी भी मार्केट में लॉन्च हो चुकी है और लोगों का ध्यान भी खींच रही है. बड़े रेस्टोरेंट्स, कैफेस और फाइन डाइनिंग मेन्यू में भी इस पारंपरिक स्ट्रीट फूड को नए-नए अंदाज में पेश किया जा रहा है.
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उत्तर भारत की अलग कहानी
वैसे, खाने-पीने के इतिहास पर शोध करने वाले कई विशेषज्ञों का अलग ही मानना है. उनका कहना है कि आज हम जिस पानी पुरी को हम जानते हैं, उसका मॉर्डन रूप करीब 100 से 125 साल पहले उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में विकसित हुआ. माना जाता है कि ये पारंपरिक चाट का एक छोटा, कंफर्टेबल और एक बार में खाए जाने वाला वर्जन था. धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि ये देश के लगभग हर राज्य की पहचान बन गया. समय के साथ ये सिंपल सा स्नैक अलग-अलग राज्यों तक पहुंचा और हर जगह लोगों ने इसे अपने स्वाद के हिसाब से नया रूप दे दिया. उत्तर भारत में ये गोलगप्पा बन गया, जहां सूजी या आटे की कुरकुरी पूरी में आलू और चने भरकर मसालेदार पानी डाला जाता है. हालांकि, इसका असली मजा आज भी किसी ठेले के सामने खड़े होकर एक-एक गोलगप्पा खाने में ही आता है. शायद यही वजह है कि सदियों पुरानी ये डिश आज भी हर उम्र के लोगों की फेवरेट बनी हुई है.
आखिर सच क्या है?
अब सवाल ये है कि क्या सचमुच पांचाल नरेश की पुत्री द्रौपदी ने पानी पुरी का आविष्कार किया था? तो जवाब है कि, इसका कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है. हालांकि, महाभारत से जुड़ी ये कहानी लोककथाओं और पौराणिक परंपराओं का हिस्सा मानी जाती है. दूसरी तरफ, इतिहासकार प्राचीन मगध को पानी पुरी की जन्मभूमि मानते हैं. लेकिन इसके भी स्पष्ट दस्तावेजी प्रमाण सीमित ही हैं. यानी पानी पुरी की असली कहानी आज भी एक रहस्य ही बनी हुई है. लेकिन एक बात तय है कि सदियों का सफर तय करने के बाद ये टेस्टी डिश पूरे भारत की पहचान बन चुकी है. चाहे आप इसे गोलगप्पा कहें, पुचका, गुपचुप, फुल्की या फिर पानी पुरी, इसका हर कुरकुरा और टेस्टी निवाला आपको भारतीय स्वाद, परंपरा और संस्कृति की खूबसूरत झलक जरूर दिखाता है.
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