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इजराइल में त्रिशंकु संसद : नेतन्याहू के भविष्य पर सस्पेंस, ‘किंगमेकर’ की भूमिका में अरब पार्टियां

by Sanjay Kumar Srivastava 4 November 2026, 9:41 PM IST (Updated 4 November 2026, 9:46 PM IST)
4 November 2026, 9:41 PM IST (Updated 4 November 2026, 9:46 PM IST)
इजराइल में नेतन्याहू के भविष्य पर सस्पेंस: 'किंगमेकर' की भूमिका में अरब पार्टियां, सरकार बनाने के लिए मिले 28 दिन

Israel Election: धोखाधड़ी के आरोपों के बीच इजराइल ने चुनाव परिणामों को मंजूरी दे दी है. राष्ट्रपति हर्ज़ोग ने सरकार गठन पर परामर्श शुरू कर दिया है. इज़राइल में हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों के आधिकारिक नतीजे घोषित कर दिए गए हैं. वोट चोरी और चुनावी धांधली के गंभीर आरोपों के बीच, केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नोम सोहलबर्ग ने बुधवार को राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग को 27 अक्टूबर के चुनाव के अंतिम नतीजे सौंप दिए. इन नतीजों के सौंपे जाने के साथ ही देश में नई सरकार के गठन को लेकर राजनीतिक बातचीत और गठबंधन की प्रक्रिया भी आधिकारिक तौर पर शुरू हो गई है.

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नतीजों पर शक जताना लोकतंत्र के लिए खतरा

नतीजे सौंपने के दौरान न्यायाधीश सोहलबर्ग ने चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाले तत्वों को कड़ी चेतावनी दी. राष्ट्रपति आवास पर आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि चुनावी नतीजों की वैधता पर शक जताना इज़राइल के लोकतंत्र के लिए खतरा है. सोहलबर्ग ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अगर चुनावी धांधली की कुछ शंकाएं सच भी साबित हो जाएं, तो भी उनका पैमाना इतना बड़ा नहीं होगा कि पूरे चुनाव परिणामों को ही रद्द करने की नौबत आए.

मतदाताओं की इच्छा सर्वोपरि

उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि लोकतंत्र का सबसे मुख्य आधार सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण है. यह तभी संभव है जब सभी पक्ष यह स्वीकार करें कि मतदाताओं की सामूहिक इच्छा सर्वोपरि और बाध्यकारी है. वहीं, राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने भी राजनीतिक दलों से जल्द से जल्द एक स्थिर सरकार बनाने की दिशा में काम करने की अपील की ताकि देश में जारी राजनीतिक अनिश्चितता को समाप्त किया जा सके.

चुनाव नतीजों पर नहीं लगेगी रोक

इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उनके गठबंधन सहयोगियों ने चुनावी धांधली का आरोप लगाया था और मांग की थी कि चुनाव नतीजों को जारी करने पर रोक लगाई जाए. सोहलबर्ग ने बताया कि बुधवार सुबह CEC के सदस्यों के सामने इन आरोपों की चल रही जांच का सारांश पेश किया गया था. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इन संदेहों की पूरी गहराई से जांच की जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि फिलहाल ये सिर्फ संदेह हैं, लेकिन अगर ये सच भी साबित होते हैं, तो इनका असर सीमित ही होगा. इसलिए, चुनाव नतीजों को जारी न करना और नेसेट (संसद) का कार्यकाल, जो पहले ही खत्म हो चुका है, उसे आगे बढ़ाना संभव नहीं है.

वोटिंग पर न करें शक

सोलबर्ग ने कहा कि इसलिए, हम अभी चुनाव नतीजे जारी कर रहे हैं. अगर आगे चलकर कोई सबूत मिलता है, तो कानून के तहत चुनाव नतीजों को चुनौती देने की प्रक्रिया का पालन किया जा सकता है. उन्होंने अरब समुदायों में हुई वोटिंग पर शक न करने की भी सलाह दी. उन्होंने कहा कि हमें अरब समाज में हुई वोटिंग पर कोई शक नहीं करना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे हमें इजरायली समाज के किसी अन्य समूह पर भी शक नहीं करना चाहिए. सोलबर्ग ने कहा कि वोटों की गिनती खत्म होने के बाद भी मतभेद बने रह सकते हैं, लेकिन चुनाव नतीजे हम सभी पर लागू होते हैं और हमें उन्हें मानना ​​ही होगा.

अरब समुदाय को न करें बदनाम

इस बीच, हर्ज़ोग ने कहा कि उन्हें शिन बेट (सुरक्षा एजेंसी), पुलिस और अन्य कानून लागू करने वाली एजेंसियों के काम पर पूरा भरोसा है, जो चुनाव में विदेशी दखल के आरोपों की जांच कर रही है. उन्होंने धैर्य रखने की अपील करते हुए कहा कि चुनाव नतीजों पर किसी भी बाहरी और नुकसानदेह दखल के संदेह की, शिन बेट और पुलिस द्वारा पूरी तरह से जांच की जानी चाहिए. हर्ज़ोग ने इजरायल के अरब समुदाय को बदनाम करने के खिलाफ भी चेतावनी दी. हाल ही में की गई नस्लवादी टिप्पणियों की निंदा करते हुए उन्होंने कहा कि सामान्यीकरण (सबको एक ही चश्मे से देखने) से बचें. मैं इजरायल के अरब समाज का बहुत सम्मान करता हूं. जीवन के हर क्षेत्र में देश के लिए उनके योगदान और समाज में घुल-मिल जाने की उनकी इच्छा की मैं कद्र करता हूं.

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राष्ट्रपति करेंगे राजनीतिक दलों से चर्चा

हर्ज़ोग ने आगे कहा कि चुनाव खत्म हो चुके हैं. अब हकीकत का सामना करने का समय है. राष्ट्रपति, नेसेट (संसद) के लिए चुने गए राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ चर्चा करेंगे. इसके आधार पर वे तय करेंगे कि सरकार बनाने की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए. हर्ज़ोग द्वारा चुने गए उम्मीदवार के पास गठबंधन बनाने के लिए 28 दिन होंगे. अगर राष्ट्रपति को लगता है कि और समय की जरूरत है, तो वे 14 दिन का अतिरिक्त समय दे सकते हैं. इससे पहले बुधवार को, CEC (केंद्रीय चुनाव समिति) ने 15-14 के वोट से चुनाव परिणामों को मंजूरी दे दी (दो सदस्यों ने वोट नहीं दिया). समिति ने कहा कि अनियमितताओं के आरोपों की जांच अभी चल रही है, लेकिन ये आरोप इतने गंभीर नहीं हैं कि चुनाव परिणामों को खारिज कर दिया जाए.

जांच में साबित नहीं हुए आरोप

सोलबर्ग ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े आरोप साबित नहीं हुए हैं. इनसे पूरी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर कोई सवाल नहीं उठता और न ही ये परिणाम खारिज करने का आधार बनते हैं. समिति ने बताया कि उन्होंने 9,000 से अधिक मतदान केंद्रों (जो कुल मतदान केंद्रों का लगभग 75 प्रतिशत हैं) की समीक्षा की. उन्हें ऐसी कोई अनियमितता नहीं मिली, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर असर पड़ा हो या नतीजों में कोई बदलाव आया हो.
CEC ने बताया कि यह समीक्षा छह दिनों तक चली, जिसमें समिति के कर्मचारियों के साथ 250 से अधिक वकीलों ने हिस्सा लिया. 350 मतदान केंद्रों पर, उन्होंने मतदान सामग्री और दस्तावेजों की गहन जांच की.

लिकुद पार्टी ने लगाया था गड़बड़ी का आरोप

समिति ने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की ओर से 1,350 मतदान केंद्रों के संबंध में मिली लगभग 2,400 शिकायतों की भी जांच की. इसके अलावा, आम जनता की ओर से 750 मतदान केंद्रों से जुड़ी लगभग 1,200 शिकायतों की भी समीक्षा की गई. खबरों के अनुसार, अकेले लिकुद पार्टी ने अरब समुदायों के मतदान केंद्रों पर गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए लगभग 1,200 शिकायतें दर्ज कराईं. यह फैसला तब आया जब शिन बेट (इजरायली खुफिया एजेंसी) ने समिति को बताया कि उन्हें ऐसी खुफिया जानकारी मिली है, जिसके मुताबिक कुछ विदेशी ताकतों ने, जिनके इरादे गुप्त या शत्रुतापूर्ण हो सकते हैं, चुनाव को प्रभावित करने के लिए विदेश से बड़ी रकम भेजी है.

सरकार बनाने के लिए छोटी पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण

स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, शिन बेट का कहना है कि अब तक मिली जानकारी से पता चलता है कि इसमें शामिल रकम काफी बड़ी है और यह गतिविधि हजारों लोगों तक फैली हुई है. हालांकि, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और पुलिस सूत्रों का कहना है कि उन्हें इस दावे के बारे में कोई जानकारी नहीं है कि इसमें बहुत बड़ी रकम शामिल है या यह गतिविधि हजारों लोगों तक फैली हुई है. विदेशी हस्तक्षेप के संदेह की जांच अभी भी जारी है. 27 अक्टूबर को हुए चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला.

लिकुद बनी सबसे बड़ी पार्टी

नेतन्याहू की लिकुद पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उनके गुट को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर थोड़ी बढ़त तो मिली, लेकिन वे संसदीय बहुमत हासिल करने से पीछे रह गए. न तो नेतन्याहू के गुट को और न ही उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी ‘परिवर्तन गुट’ को संसद में बहुमत मिल सका. ऐसे में सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों सहित अन्य छोटी पार्टियों के साथ बातचीत की संभावना बन गई है. विपक्षी गुट ने इज़राइल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए काम करने का संकल्प लिया है. अरब पार्टियों ने नेसेट (इज़राइली संसद) की 120 में से 19 सीटें जीती हैं, जिससे वे इस बुरी तरह बंटी हुई संसद में ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा सकती हैं. अगर नेतन्याहू और आइसेनकोट में से कोई भी सरकार बनाने में सफल नहीं होता है, तो अगले साल की शुरुआत में इज़राइल में एक और चुनाव हो सकता है.

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