Home Latest News & Updates घर, मॉल, बैंक…, सब होने के बावजूद खाली है अमेरिका का यह Ghost Town, मकसद जानकर हैरान हो जाएंगे

घर, मॉल, बैंक…, सब होने के बावजूद खाली है अमेरिका का यह Ghost Town, मकसद जानकर हैरान हो जाएंगे

by Neha Singh 17 June 2026, 7:33 PM IST (Updated 17 June 2026, 7:34 PM IST)
17 June 2026, 7:33 PM IST (Updated 17 June 2026, 7:34 PM IST)
Kinetic Cyber Range

Kinetic Cyber Range: क्या आपने कभी ऐसे शहर के बारे में सोचा है, जहां घर से लेकर अस्पताल और बैंक तक सब कुछ मौजूद हो लेकिन फिर भी पूरा शहर खाली रहे. अमेरिका में इसी तरह का एक शहर बनाया गया है, जहां घरों की दीवारें खड़ी हैं लेकिन उसमें लोग नहीं रहते, जहां दुकान और मॉल की बिल्डिंग सजी हुई हैं, लेकिन अंदर कस्टमर नहीं है, अस्पताल और बैंक भी खाली हैं. यह बिल्कुल एक भूतिया शहर जैसा है. अमेरिका ने खास तौर पर इस पूरे शहर को बनाया है और खाली रखा है. इस शहर का नाम है काइनेटिक साइबर रेंज (Kinetic Cyber Range). इस डमी शहर को बनाने का मकसद जानकर आप हैरान हो जाएंगे.

आपको नाम से समझ आ गया होगा कि इस शहर का कनेक्शन साइबर सिक्योरिटी से जुड़ा है. आज की डिजिटल दुनिया में सबसे बड़ा खतरा साइबर अपराधियों से है. हैकर्स बड़ी-बड़ी कंपनियों से लेकर सरकारी संस्थाओं को भी निशाना बना रहे हैं, जिससे बचने के लिए जरूरी है कि सरकार हमेशा हैकर्स से एक कदम आगे रहे. साइबर अपराध के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए ही अमेरिका में काइनेटिक साइबर रेंज नाम का एक शहर बनाया गया है, जो साइबर ट्रेनिंग सेंटर की तरह काम करता है. यहां जानें अमेरिका के इस अनोखे साइबर सिटी की खासियत.

22,000 स्क्वायर फुट में बना शहर

काइनेटिक साइबर रेंज को अलबामा राज्य के हंट्सविले शहर में फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) कैंपस में बनाया गया है. इसकी जानकारी खुद FBI ने दी है. यह शहर देखने में बिल्कुल असली शहर जैसा है, लेकिन यहां कोई आम नागरिक नहीं रहता. काइनेटिक साइबर रेंज को सुरक्षा बल और साइबर अधिकारियों की ट्रेनिंग के लिए डिजाइन किया गया है. हर जगह ऐसे सिस्टम, नेटवर्क और डिवाइस से जुड़ी है, जो असल दुनिया की तरह काम करने के लिए डिजाइन किए गए हैं.

अमेरिका का यह शहर करीब 22,000 वर्गफीट में बनाया गया है. काइनेटिक साइबर रेंज की एक और खासियत यह है कि यहां के पूरे नेटवर्क को बाहरी इंटरनेट से अलग रखा गया है. इससे ट्रेनिंग के दौरान इस्तेमाल होने वाला मैलवेयर या साइबर हमला बाहरी दुनिया में नहीं फैल सकता. इस नकली शहर में 200 से ज्यादा सर्वर वाला एक बड़ा डेटा सेंटर भी बनाया गया है. अमेरिकी एजेंसी का मानना है कि असली ट्रेनिंग असली माहौल में ग्राउंड पर होती है. साइबर सिक्योरिटी को सिर्फ क्लासरूम में किताबें पढ़कर नहीं सीखा जा सकता. प्रोग्राम मैनेजर ने बताया कि इन सर्वर रूम को जानबूझकर शोर भरे और अनकम्फर्टेबल माहौल में बनाया गया है, ताकि उन कॉर्पोरेट माहौल की हूबहू नकल की जा सके, जिसका सामना साइबर एक्सपर्ट्स को असल में करना पड़ता है.

कैसे होती है ट्रेनिंग

फरवरी 2025 में खुलने के बाद से इस शहर में 1,400 से ज्यादा स्टूडेंट्स को ट्रेनिंग दी गई है, जिसमें FBI के लोग और दूसरी एजेंसियों के पार्टनर शामिल हैं. FBI के काइनेटिक साइबर रेंज को मैनेज करने वाले डेव बीचबोर्ड ने कहा, “एक्सपर्ट्स के फील्ड में जाने से पहले उन्हें उतना ही असली अनुभव दिया जाता है जितना वो रियल में हो सकता है.” रियल एक्सपीरियंस ट्रेनिंग के लिए ट्रेनर जानबूझकर अस्पतालों, बिजली नेटवर्क, बैंक जैसी जरूरी सेवाओं पर नकली साइबर हमला करते हैं. इसके बाद साइबर ट्रेनीज को टास्क दिया जाता है कि वे कम से कम समय में समस्या को खोजें और सिस्टम को फिर से नॉर्मल कर दें. इससे सीखने वाले स्टूडेंट्स को अलग-अलग तरह के साइबर अटैक को समझने और उसे सुलझाने का एक्सपीरियंस मिलता है.

साइबर इन्वेस्टिगेटर का काम सिर्फ कंप्यूटर या मोबाइल डिवाइस जब्त करने तक ही सीमित नहीं होता. उनका मुख्य मकसद साइबर हमले की जड़ को समझना होता है, खासकर यह पता लगाना कि हमलावर ने नेटवर्क में सेंध कैसे लगाई और अपना मैलवेयर कैसे फैलाया. क्योंकि अपराधी अक्सर दूसरे देशों में होते हैं, इसलिए उनके डिवाइस तक सीधे पहुंचना अक्सर नामुमकिन होता है. इसलिए, इन्वेस्टिगेटर डिजिटल सबूतों और ऑनलाइन एक्टिविटीज की जांच करके अपराधियों का पता लगाने की कोशिश करते हैं. इन एक्सरसाइज में, लोग कंपनी के मालिक, एग्जीक्यूटिव और कानूनी सलाहकार जैसी भूमिकाएं निभाते हैं. ट्रेनी उनसे बातचीत करते हैं और उन्हें जांच के दौरान जुटाई जा रही जानकारी और उसके मकसद के बारे में बताते हैं. यह प्रैक्टिस इसलिए जरूरी है ताकि प्रभावित कंपनी को ठीक-ठीक पता हो कि इन्वेस्टिगेटर कौन सा डेटा इकट्ठा कर रहे हैं और कौन सा नहीं. यह प्रोसेस प्राइवेसी स्टैंडर्ड्स और कानूनी सीमाओं का पालन पक्का करता है.

सॉफ्ट स्किल्स पर फोकस और गलतियां करने की छूट

एक और एक्सरसाइज में, स्टूडेंट्स को और भी मुश्किल स्थिति का सामना करना पड़ता है. एक नकली रैंसमवेयर हमला जो अस्पताल के नेटवर्क को बंद कर देता है. अलार्म बजते हैं, जिससे ऐसा माहौल बनता है जहां मरीजों की सुरक्षा खतरे में लगती है. इस स्थिति में, ट्रेनी को न सिर्फ तकनीकी समस्याओं को संभालना होता है, बल्कि लोगों की चिंताओं और दबाव को भी मैनेज करना होता है. ऐसी एक्सरसाइज का मकसद सिर्फ तकनीकी जानकारी देना नहीं होता, स्टूडेंट्स तनावपूर्ण स्थितियों में सही फैसले लेना भी सीखते हैं. जब समय कम हो और दबाव ज्यादा हो, तो बातचीत, सही समझ और स्थिति पर काबू रखने की क्षमता तकनीकी जानकारी जितनी ही जरूरी होती है.

इस साइबर रेंज की एक खास बात यह है कि इसमें ट्रेनी को गलतियां करने की छूट होती है. इंस्ट्रक्टर मानते हैं कि सीखने की प्रक्रिया में गलतियां होना भी बहुत जरूरी है. अगर कोई किसी एक्सरसाइज के दौरान गलती करता है, तो उन्हें समझाया जाता है कि ऐसी गलती के असल दुनिया में क्या नतीजे हो सकते हैं, ताकि भविष्य में ज्यादा सावधानी बरती जाए.

अमेरिका को साइबर हमलों से हुआ करोड़ों का नुकसान

साइबर क्राइम दुनिया के लिए कितना गंभीर खतरा है, यह FBI के डेटा से पता चलता है. अमेरिका को हाल के सालों में साइबर क्राइम से $20.9 बिलियन का नुकसान हुआ है, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 26 प्रतिशत ज्यादा है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि रैंसमवेयर अटैक सबसे खतरनाक होते हैं. इस तरह, हैकर्स किसी ऑर्गनाइजेशन के डिजिटल सिस्टम को लॉक कर देते हैं और उन्हें ठीक करने के लिए फिरौती मांगते हैं.

भारत में कैसे होती है साइबर ट्रेनिंग

भारत में अमेरिका की तरह, पूरा साइबर ट्रेनिंग शहर तो नहीं है, लेकिन यहां भी साइबर ट्रेनिंग के लिए खास इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाए गए हैं. यहां साइबर अधिकारियों की ट्रेनिंग मुख्य रूप से नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल, सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसियों और टॉप टेक्निकल इंस्टीट्यूशन (जैसे IITs) के साथ कोऑर्डिनेशन से की जाती है. IIT Kanpur C3iHub में पावर प्लांट स्टेशन, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स के फिजिकल कंट्रोलर और छोटे पैमाने पर पेट्रोल पंप लगाए गए हैं, जिससे असली माहौल बनाया जा सके. यहां भारतीय साइबर ट्रेनीज को यह सिखाया जाता है कि अगर कोई दुश्मन देश भारत की संस्थाओं या नेशनल ग्रिड पर हमला करे, तो उसे नुकसान होने से पहले कैसे रोका जाए. नेशनल साइबर रेंज ( NCR) में अधिकारियों को टीमों में बांटकर लाइव नेटवर्क वॉरफेयर की प्रैक्टिस कराई जाती है.

साइबर ट्रेनीज को बदलते वैश्विक खतरों से निपटने के लिए कुछ मैलवेयर और रैनसमवेयर एनालिसिस कराया जाता है, जिसमें उन्हें किसी हमले के बाद वायरस के कोड को डिकोड करना सिखाया जाता है. इसके साथ ही डार्क वेब और ओसिंट जैसे खुले सोर्स पर आतंकवादियों और अपराधियों के डिजिटल फुटप्रिंट्स को ट्रैक करना सिखाया जाता है. साइबर सिक्योरिटी का मतलब सिर्फ अटैक को रोकना ही नहीं, बल्कि सबूत इकट्ठे करना भी होता है, जिसे अदालत में पेश किया जा सके. इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक जैसे फ्रॉड की जांच करना भी सिखाया जाता है.

नेशनल स्पेशलाइज्ड अकादमी

भारत में अलग-अलग लेवल के अधिकारियों के लिए स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर बनाए गए हैं.

I4C (इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर): केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत यह विंग राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के अधिकारियों को मॉडर्न साइबर क्राइम, डार्क वेब इन्वेस्टिगेशन और क्रिप्टोकरेंसी फोरेंसिक की ट्रेनिंग देता है.

राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी (RRU): गुजरात में मौजूद राष्ट्रीय महत्व का यह इंस्टीट्यूट खास तौर पर आर्म्ड फोर्स, इंटेलिजेंस अधिकारियों और पैरामिलिट्री के लिए साइबर सिक्योरिटी, डेटा फोरेंसिक और डिजिटल इंटेलिजेंस में स्पेशल पोस्ट-ग्रेजुएट लेवल की ट्रेनिंग और डिप्लोमा देता है.

CDTI (सेंट्रल डिटेक्टिव ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट): ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (BPR&D) के तहत ये इंस्टीट्यूट, ग्राउंड-लेवल इन्वेस्टिगेशन अधिकारियों को कंप्यूटर फोरेंसिक, मोबाइल डेटा एक्सट्रैक्शन और डिजिटल सबूत इकट्ठा करने के कानूनी तरीके सिखाते हैं.

बदलता युद्ध स्टाइल

अमेरिका की साइबर सिटी बताती है कि भविष्य में होने वाले युद्ध केवल तोपों और मिसाइलों से नहीं लड़े जाएंगे. समय के साथ साइबर अटैक का खतरा और बढ़ता जाएगा, जो पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती है. एक भी खतरनाक साइबर अटैक पूरे देश को घुटनों पर ला सकता है. जैसे कोई देश अपने बॉर्डर की सुरक्षा के लिए सालों पहले मिसाइलें खरीदता है और अपने सैनिकों को कड़ी ट्रेनिंग देता है, वैसे ही “एडवांस्ड तैयारी” ही साइबरस्पेस को सुरक्षित करना और नए साइबर एक्सपर्ट तैयार करना ही एकमात्र तरीका है.

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News Source: FBI

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