Chegg Research: चेग (Chegg) की नई रिसर्च ने अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत का एक चौंकाने वाला सच उजागर किया है. स्किल्स की कमी के कारण हर 10 में से 3 एम्प्लॉयर हर हफ्ते 8 घंटे से ज्यादा का समय गंवा रहे हैं. सिर्फ यही नहीं, फ्रंटलाइन सेक्टर्स में AI की रेस और कम स्टाफ के तनाव के कारण 45% एम्प्लॉयर्स और 35% एम्प्लॉईज़ नौकरी छोड़ने का मन बना चुके हैं. ग्लोबल लर्निंग और वर्कफोर्स स्किलिंग कंपनी Chegg की नई रिसर्च से पता चलता है कि अमेरिका में स्किल्स की भारी कमी है, जिससे अमेरिका में फ्रंटलाइन-प्रधान उद्योगों में एम्प्लॉयर्स और एम्प्लॉइज पर दबाव बढ़ रहा है.
दिखने लगे हैं नतीजे
इसके नतीजे पहले ही दिखने लगे हैं: 10 में से तीन एम्प्लॉयर्स (30%) का कहना है कि वे हर हफ़्ते आठ घंटे से ज़्यादा समय कर्मचारियों में स्किल्स की कमी को पूरा करने में लगाते हैं. Chegg का ‘फ्रंटलाइन वर्कर्स स्किल्स इंडेक्स’ रिटेल, मैन्युफैक्चरिंग और फाइनेंस जैसे दस फ्रंटलाइन प्रधान उद्योगों के 1,000 अमेरिकी एम्प्लॉयर्स और 1,005 अमेरिकी एम्प्लॉइज के सर्वे पर आधारित है जो स्किल्स की कमी, AI को अपनाने और ट्रेनिंग की असरदारता को लेकर एम्प्लॉयर्स और एम्प्लॉइज के बीच बढ़ती सोच के अंतर को उजागर करता है. इससे पता चलता है कि पुराने तरीके अब काफी नहीं हैं. सर्वे में एम्प्लॉयर्स से मतलब उन लोगों से है जो अपनी कंपनी में हायरिंग के फैसलों में पूरी तरह या आंशिक रूप से शामिल हैं. एम्प्लॉइज से मतलब उन लोगों से है जिनकी हायरिंग की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है यानी वे कर्मचारी हैं.

ट्रेनिंग प्रोग्राम से भी फायदा नहीं
Chegg के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर डैन रोसेनस्वेइग ने कहा कि इस रिसर्च की सबसे अहम बात यह है कि एम्प्लॉयर्स और एम्प्लॉइज अक्सर कर्मचारियों की एक जैसी चुनौतियों को तो देखते हैं, लेकिन बिल्कुल अलग-अलग समस्याओं की पहचान करते हैं. एम्प्लॉयर्स AI के लिए तैयारी, हालात के हिसाब से ढलने की क्षमता और ऑपरेशनल परफॉर्मेंस पर ध्यान देते हैं, जबकि एम्प्लॉइज करियर में आगे बढ़ने, लीडरशिप और तरक्की पर ध्यान देते हैं. दोनों में से कोई भी गलत नहीं है लेकिन ज़्यादातर ट्रेनिंग प्रोग्राम कभी भी इस अंतर को पाटने के लिए नहीं बनाए गए थे.
कर्मचारी हमें साफ़ तौर पर बता रहे हैं कि ऐसी सामान्य ट्रेनिंग, जिसका कोई प्रैक्टिकल इस्तेमाल न हो या जिससे करियर पर कोई मापने लायक असर न पड़े, अब काम नहीं आती. ऐसे समय में जब AI तेज़ी से काम करने की जगह को बदल रहा है, कंपनियों को ऐसी ट्रेनिंग की ज़रूरत है जो कर्मचारियों को उनकी मौजूदा भूमिकाओं में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद करे और साथ ही भविष्य के लिए ज़रूरी क्षमताएं भी विकसित करे.
स्किल की कमी से बिजनेस पर असर
रिसर्च से पता चलता है कि कर्मचारियों में स्किल की कमी की वजह से अलग-अलग इंडस्ट्रीज़ में ऑपरेशनल और ह्यूमन कॉस्ट (कामकाज और कर्मचारियों से जुड़ी लागत) बढ़ रही है. लगभग एक-तिहाई (30%) एम्प्लॉयर का कहना है कि वे हर हफ़्ते आठ घंटे से ज़्यादा समय यानी पूरे एक वर्किंग डे के बराबर समय कर्मचारियों में स्किल की कमी को पूरा करने में बिताते हैं. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में यह आंकड़ा बढ़कर 46% हो जाता है. इसका असर रोज़मर्रा के कामकाज पर भी पड़ रहा है.
तनाव की वजह से नौकरी छोड़ने का विचार
एम्प्लॉयर ने अपनी ऑर्गनाइज़ेशन में स्किल की कमी के कुछ सबसे आम असर बताए हैं, जैसे गलतियों और दोबारा काम करने (रीवर्क) में बढ़ोतरी (34%), तनाव और बर्नआउट (33%), काम का ज़्यादा बोझ या दूसरों का काम संभालना (31%) और ओवरटाइम या लंबी शिफ्ट (29%). इस दबाव का असर कर्मचारियों के मनोबल और उनके नौकरी में बने रहने (रिटेंशन) पर भी पड़ रहा है.
लगभग आधे (45%) एम्प्लॉयर और एक-तिहाई से ज़्यादा (35%) कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने कम स्टाफ या वर्कफोर्स की क्षमता में कमी के कारण होने वाले तनाव की वजह से नौकरी छोड़ने के बारे में सोचा है. फ़ूड सर्विस और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में 57% एम्प्लॉयर और 43% कर्मचारियों ने बताया कि उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ने के बारे में सोचा था. सर्वे किए गए सभी सेक्टर में यह आंकड़ा सबसे ज़्यादा है.
ट्रेनिंग के बाद भी सैलरी में बदलाव नहीं
ट्रेनिंग प्रोग्राम कर्मचारियों की मदद नहीं कर पा रहे हैं और कर्मचारी यह बात जानते हैं. वर्कफोर्स में स्किल की कमी की समस्या कर्मचारियों के काम पर आने से पहले ही शुरू हो जाती है. आधे से ज़्यादा (56%) एम्प्लॉयर का कहना है कि छोटे पदों पर काम करने वाले कर्मचारी काम के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होते, जबकि एक-चौथाई से ज़्यादा (26%) एम्प्लॉयर अपने सेक्टर में स्किल गैप को गंभीर बताते हैं.
जब कर्मचारी काम करना शुरू करते हैं तो स्थिति में कोई सुधार नहीं होता. जहां ज़्यादातर एम्प्लॉयर (काम पर रखने वाले) मानते हैं कि वर्कफोर्स ट्रेनिंग प्रोग्राम असरदार हैं, वहीं कर्मचारी इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं. वे ट्रेनिंग के डिज़ाइन और उसे देने के तरीके में एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करते हैं. 77% एम्प्लॉयर का कहना है कि ट्रेनिंग प्रोग्राम कुल मिलाकर असरदार हैं, जबकि 58% कर्मचारी ही ऐसा मानते हैं. हालांकि, ज़्यादातर कर्मचारियों (71%) का कहना है कि ट्रेनिंग से उनकी सैलरी या भूमिका (रोल) में कोई बदलाव नहीं आया है.
नए कर्मचारियों में काम की तैयारी नहीं
नतीजों से पता चलता है कि समस्या निवेश या मोटिवेशन की कमी नहीं, बल्कि ट्रेनिंग के काम के हिसाब से सही न होने और उसका कोई खास असर न दिखने की है. जिन लोगों को ट्रेनिंग असरदार नहीं लगी, उनमें से 51% कर्मचारियों का कहना है कि उनकी ट्रेनिंग बहुत सामान्य थी या उनके रोज़मर्रा के कामों से सीधे तौर पर जुड़ी नहीं थी. कर्मचारियों ने सफल ट्रेनिंग नतीजों में रुकावट के तौर पर प्रैक्टिकल लर्निंग की कमी (39%), अपर्याप्त कोचिंग (34%) और कमज़ोर मैनेजर सपोर्ट (27%) का भी ज़िक्र किया.
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एम्प्लॉयर और कर्मचारी इस बात पर तो सहमत हैं कि स्किल्स की समस्या है, लेकिन वे इस बात पर सहमत नहीं हैं कि समस्या असल में क्या है. रिसर्च से पता चलता है कि आज के वर्कप्लेस में किन स्किल्स की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, इस बारे में एम्प्लॉयर और कर्मचारियों की सोच में अंतर बढ़ रहा है. हालांकि दोनों ग्रुप इस बात पर सहमत हैं कि वर्कफोर्स की काबिलियत में कमियां हैं, लेकिन समस्या कहां है, इस पर उनकी राय काफ़ी अलग है.

सफलता के लिए टीमवर्क सबसे जरूरी
एम्प्लॉयर ने अपनी वर्कफोर्स में AI और ऑटोमेशन स्किल्स (36%) और डिजिटल या IT काबिलियत (24%) की सबसे ज़्यादा कमी बताई है, जो तेज़ी से बदलती टेक्नोलॉजी के हिसाब से खुद को ढालने के बढ़ते दबाव को दिखाता है. हालांकि, कर्मचारियों ने अपने वर्कप्लेस में लीडरशिप और लोगों को मैनेज करने की क्षमता (25%) को सबसे बड़ी कमी बताया, इसके बाद कम्युनिकेशन और टीमवर्क स्किल्स (24%) का नंबर आता है. नतीजों से पता चलता है कि कई कर्मचारी इस चुनौती को सिर्फ़ टेक्निकल स्किल्स की समस्या के तौर पर नहीं, बल्कि मैनेजमेंट और वर्कप्लेस कल्चर की समस्या के तौर पर भी देखते हैं. वहीं, एम्प्लॉयर्स ने प्रॉब्लम-सॉल्विंग और क्रिटिकल थिंकिंग (36%) और कम्युनिकेशन और टीमवर्क (34%) को लंबे समय की सफलता के लिए दो सबसे ज़रूरी स्किल्स माना है. इससे पता चलता है कि टिकाऊ ह्यूमन स्किल्स और टेक्निकल जानकारी, दोनों की ही मांग है.
AI अपनाने में कर्मचारी पीछे
AI तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन कर्मचारी उतनी तेज़ी से उसे अपना नहीं पा रहे हैं.रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि एम्प्लॉयर्स जितनी तेज़ी से AI को अपना रहे हैं और कर्मचारी अपने रोज़मर्रा के काम में उसे जितनी धीमी गति से अपना रहे हैं, उनके बीच एक अंतर है. जहां 83% एम्प्लॉयर्स का कहना है कि वे अपनी मौजूदा भूमिका में AI टूल्स का इस्तेमाल करने में कॉन्फिडेंट महसूस करते हैं, वहीं सिर्फ़ 44% कर्मचारी ही ऐसा कहते हैं. करियर में आगे बढ़ने की ज़रूरत के मामले में यह अंतर और भी साफ़ दिखता है.
हैरानी की बात है कि सिर्फ़ 3% कर्मचारी मानते हैं कि अपनी भूमिका में आगे बढ़ने के लिए AI में माहिर होना ज़रूरी है, जबकि 18% एम्प्लॉयर्स ऐसा मानते हैं. नतीजों से पता चलता है कि सबसे बड़ी चुनौती शायद सिर्फ़ AI स्किल्स की कमी नहीं, बल्कि जानकारी की कमी है. कई कर्मचारी अभी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके आस-पास काम की जगह पर उम्मीदें कितनी तेज़ी से बदल रही हैं.
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आधे से ज़्यादा कर्मचारियों (52%) का कहना है कि उनके काम में अभी AI का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं होता है, जिसका मतलब है कि उन्हें काम के दौरान इस टेक्नोलॉजी में प्रैक्टिकल महारत हासिल करने का बहुत कम मौका मिलता है. वहीं दूसरी ओर, एम्प्लॉयर कामकाज और फ़ैसले लेने की प्रक्रियाओं में AI को शामिल कर रहे हैं. सिर्फ़ 14% एम्प्लॉयर का कहना है कि उनके काम में अभी AI का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं होता है, और एक-चौथाई (25%) का कहना है कि उनके काम में AI का इस्तेमाल अब ज़रूरी माना जाने लगा है.
- हर दस में से तीन नियोक्ता (30%) हर हफ़्ते आठ घंटे से ज़्यादा समय कर्मचारियों की स्किल्स में कमी को पूरा करने में लगाते हैं.
- फ्रंटलाइन कर्मचारियों पर ज्यादा निर्भर उद्योगों में 77% एम्प्लॉयर का कहना है कि उनकी स्किल ट्रेनिंग असरदार है, लेकिन 71% कर्मचारियों का कहना है कि इससे उनकी सैलरी या भूमिका पर कोई असर नहीं पड़ा.
- 45% एम्प्लॉयर और एक-तिहाई से ज़्यादा (35%) एम्प्लॉई का कहना है कि उन्होंने कम स्टाफ़ या स्किल्स की कमी की वजह से होने वाले तनाव के कारण नौकरी छोड़ने के बारे में सोचा है.
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