High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मुश्किल समय में पत्नी को माता-पिता से मिलने वाली मदद पति को गुजारा-भत्ता देने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती. कोर्ट ने बुलंदशहर फैमिली कोर्ट के दिसंबर 2023 के आदेश के खिलाफ पत्नी और दो बच्चों की याचिका मंजूर की. फैमिली कोर्ट ने बच्चों को 3,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था, लेकिन पत्नी का दावा खारिज कर दिया था. जस्टिस गरिमा प्रसाद ने स्पष्ट किया कि धारा 125 के तहत माता-पिता की आर्थिक सहायता के आधार पर पत्नी को पति से गुजारा-भत्ता पाने से वंचित नहीं किया जा सकता.
ससुरालवालों पर परेशान करने का आरोप
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पत्नी के माता-पिता की आय को उसकी आय नहीं माना जाना चाहिए और माता-पिता की मदद पति की अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने की कानूनी ज़िम्मेदारी की जगह नहीं ले सकती. पत्नी ने शुरू में CrPC की धारा 125 के तहत अपने पति से गुज़ारा-भत्ता पाने के लिए अर्ज़ी दायर की थी. उसने आरोप लगाया था कि शादी के बाद उसे पति और उसके परिवार वालों की तरफ़ से परेशान किया गया, ताने मारे गए और क्रूरता का सामना करना पड़ा.
सेना से रिटायर हैं पति
आरोप लगाया गया कि उनके पति सेना से रिटायर हो चुके हैं. उन्होंने पत्नी के साथ वैवाहिक संबंध खत्म कर दूसरी महिला से शादी कर ली है. पत्नी ने आरोप लगाया कि जनवरी 2020 में उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें बच्चों के साथ ससुराल से निकाल दिया गया. तब से वह अपने माता-पिता के घर रह रही हैं. उनकी अपनी कोई कमाई का ज़रिया नहीं है और वह अपने माता-पिता पर निर्भर हैं.
पति ने कहा- पत्नी बेवजह ससुराल छोड़कर गई
पत्नी की याचिका के जवाब में पति ने कहा कि पत्नी बिना किसी ठोस वजह के ससुराल छोड़कर चली गई थी और आरोप लगाया कि पत्नी के कुछ लोगों के साथ नाजायज संबंध थे. पति ने यह भी बताया कि सेना में नौकरी के दौरान नवंबर 2020 में रिटायरमेंट तक उनकी सैलरी से हर महीने 11,303 रुपये काटकर पत्नी और बच्चों को दिए जाते थे. पत्नी ने दावा किया कि रिटायरमेंट के बाद पति को हर महीने लगभग 21,025 रुपये पेंशन मिलती है और कमाई का कोई दूसरा ज़रिया नहीं है. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैमिली कोर्ट ने पत्नी के मामले पर यकीन नहीं किया क्योंकि वह दहेज की मांग, मारपीट या दूसरी शादी की ठोस घटनाओं को साबित नहीं कर पाईं.
पारिवारिक अदालत ने नहीं मानी पत्नी की बात
अदालत ने आगे कहा कि दोनों पक्षों द्वारा लगाए गए आरोप अप्रमाणित थे और पत्नी क्रूरता साबित करने में विफल रही थी. तदनुसार, पारिवारिक अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि वह बिना पर्याप्त कारण के अलग रह रही थी और इसलिए भरण-पोषण की हकदार नहीं थी. उच्च न्यायालय के समक्ष सुनवाई के दौरान पत्नी ने दलील दी कि पारिवारिक अदालत ने सीआरपीसी की धारा 125 के मूल उद्देश्य के विपरीत दृष्टिकोण अपनाया, क्योंकि उसने कार्यवाही का निर्णय इस तरह किया जैसे कि यह क्रूरता और व्यभिचार पर एक पूर्ण वैवाहिक मुकदमा हो. अपने पति के व्यभिचार के आरोपों के जवाब में पीठ ने कहा कि दावे का समर्थन करने के लिए कोई स्वतंत्र गवाह, दस्तावेज़ या विश्वसनीय सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया था.
कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 125(4) के तहत रोक तभी लागू होती है जब यह साबित हो जाए कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है. कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि सिर्फ़ आरोपों, शक या चरित्र पर सवाल उठाने से पत्नी को गुज़ारा-भत्ता (maintenance) पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने फ़ैमिली कोर्ट द्वारा प्रति बच्चा 3,000 रुपये प्रति माह की राशि तय करने के फ़ैसले पर भी असहमति जताई और इसे पूरी तरह से अपर्याप्त और अवास्तविक बताया.
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बदला
कोर्ट ने कहा कि यह राशि स्कूल जाने वाले बच्चों के न्यूनतम उचित खर्चों, जैसे कि भोजन, कपड़े, शिक्षा, किताबें, परिवहन और चिकित्सा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काफ़ी नहीं थी. इस प्रकार, फ़ैमिली कोर्ट के आदेश में बदलाव करते हुए हाई कोर्ट ने 17 जून के अपने फ़ैसले में पति को पत्नी को 5,000 रुपये का मासिक गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया. साथ ही, कोर्ट ने दो नाबालिग बच्चों के लिए गुज़ारा-भत्ते की राशि को भी बढ़ाकर 4,000 रुपये प्रति बच्चा कर दिया.
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News Source: PTI
