Home लाइफस्टाइल बंगाल की सदियों पुरानी कढ़ाई है Kantha Embroidery, जो हर धागे में सुनाती है एक नई कहानी

बंगाल की सदियों पुरानी कढ़ाई है Kantha Embroidery, जो हर धागे में सुनाती है एक नई कहानी

by Preeti Pal 9 July 2026, 2:39 PM IST (Updated 9 July 2026, 4:24 PM IST)
9 July 2026, 2:39 PM IST (Updated 9 July 2026, 4:24 PM IST)
बंगाल की सदियों पुरानी कढ़ाई है Kantha Embroidery, जो हर धागे में सुनाती है एक नई कहानी

Kantha Embroidery: फैशन की दुनिया में आजकल अपसाइक्लिंग और सस्टेनेबल फैशन ज्यादा ट्रेंड में है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसी ट्रेडिशनल कढ़ाई है, जिसने ये सोच सदियों पहले ही अपना ली थी? हम बात कर रहे हैं कांथा एम्ब्रॉयडरी की, जो पश्चिम बंगाल की एक बहुत खूबसूरत और ऐतिहासिक हैंडीक्राफ्ट है. इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये सिर्फ कपड़ों को सजाती नहीं, बल्कि हर टांके के साथ एक कहानी भी बुनती है. आज कांथा एम्ब्रॉयडरी सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं है. ये डिजाइनर साड़ियों, जैकेट, कुर्तों, ड्रेसेस, बैग और यहां तक कि इंटरनेशनल फैशन रनवे तक अपनी खास पहचान बना चुकी है.

कांथा का खूबसूरत सफर

कांथा एम्ब्रॉयडरी की शुरुआत पश्चिम बंगाल के गांवों में हुई थी. उस टाइम महिलाएं पुराने सूती साड़ी और धोती की कई लेयर्स को एक साथ सिलकर रजाई यानी नक्शी कांथा तैयार करती थीं. ये सिर्फ जरूरत का सामान नहीं था, बल्कि परिवार की यादों और इमोशन्स से जुड़ा एक अनमोल हिस्सा होता था. मां अपनी बेटी को ये आर्ट सिखाती थी और दादी अपने एक्सपीरियंस से नए डिज़ाइन बनाना बताती थीं. धीरे-धीरे ये आर्ट एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती गई और बंगाल की सांस्कृतिक पहचान बन गई.

सिंपल टांकों में छिपी खूबसूरती

कांथा एम्ब्रॉयडरी की सबसे बड़ी पहचान इसका रनिंग स्टिच यानी सीधी सिलाई वाला टांका है. देखने में ये बहुत ईजी लगता है, लेकिन इसे खूबसूरती से बनाने के लिए पेशेंस, एक्सपीरियंस और बारीक हुनर की जरूरत होती है. इन्हीं छोटे-छोटे टांकों से फूल, पत्तियां, पक्षी, मछलियां और बेल-बूटी के डिज़ाइन तैयार किए जाते हैं. यही वजह है कि हर कांथा पीस बिल्कुल अलग और यूनिक होता है. दो डिज़ाइन कभी पूरी तरह एक जैसे नहीं दिखते.

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हर डिज़ाइन में कहानी

कांथा एम्ब्रॉयडरी को सिर्फ कढ़ाई कहना इसकी खूबसूरती को कम करना होगा. इसमें बने हर डिज़ाइन का अपना एक मतलब होता है. कहीं कमल समृद्धि का सिंबल होता है, तो कहीं मछली खुशहाली का मैसेज देती है. नाव, पेड़, जानवर, फूल और गांव की जिंदगी को भी इन कपड़ों पर खूबसूरती से उकेरा जाता है. यही वजह है कि हर कांथा कपड़ा अपने आप में एक कहानी कहता है.

जब अपसाइक्लिंग शब्द भी नहीं था

आज फैशन इंडस्ट्री पुराने कपड़ों को दोबारा इस्तेमाल करने की बात करती है. हालांकि, कांथा एम्ब्रॉयडरी ने ये काम सालों पहले शुरू कर दिया था. पुरानी साड़ियों और धोती को फेंकने के बजाय उन्हें कई लेयर्स में जोड़कर नया लुक दिया जाता था. हजारों टांकों से मजबूत बनाकर उनसे रजाई, चादर और दूसरे जरूरी सामान तैयार किए जाते थे. यानी बिना किसी बर्बादी के पुराने कपड़ों को नई लाइफ मिल जाती थी.

मॉडर्न फैशन में जलवा

टाइम के साथ कांथा एम्ब्रॉयडरी ने खुद को नए दौर के हिसाब से ढाल लिया है. अब ये सिर्फ साड़ियों तक सीमित नहीं रही. डिजाइनर इसे जैकेट, को-ऑर्ड सेट, कुर्ते, गाउन, श्रग, बैग, दुपट्टे और होम डेकोर प्रोडक्ट्स में भी यूज कर रहे हैं. इसकी सबसे अच्छी बात ये है कि ये ट्रेडिशनल होने के बावजूद काफी मॉडर्न और स्टाइलिश दिखती है. आज कई इंडियन और इंटरनेशनल फैशन डिजाइनर्स अपने कलेक्शन में कांथा एम्ब्रॉयडरी को जगह दे रहे हैं. इससे न सिर्फ इस आर्ट को नई पहचान मिली है, बल्कि हजारों कारीगरों को रोजगार भी मिल रहा है.

क्यों है आज भी खास?

तेजी से बदलते फैशन ट्रेंड के बीच कांथा एम्ब्रॉयडरी आज भी उतनी ही पॉपुलर है, क्योंकि इसमें ट्रेडिशन, आर्ट और एनवायरमेंट के लिए जिम्मेदारी, तीनों का कॉम्बिनेशन दिखाई देता है. ये सिर्फ एक कढ़ाई नहीं, बल्कि भारतीय विरासत की ऐसी अनमोल धरोहर है, जो हर धागे में हिस्ट्री, इमोशन्स और क्रिएटिविटी को संभाले हुए है.

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