Ancient India Cooling System: आज गर्मी से बचने के लिए एयर कंडीशनर, कूलर और पंखे हमारी पहली जरूरत बन चुके हैं. ऐसे में ये सोचकर हैरानी होती है कि सदियों पहले राजा-महाराजा बिना किसी बिजली और मशीन के भी अपने महलों को ठंडा कैसे रखते थे. उस दौर में न एसी था, न बिजली, फिर भी महलों के अंदर का टेंपरेचर बाहर से काफी कम रहता था. वैसे, ये कोई जादू नहीं, बल्कि भारत की शानदार वास्तुकला और नेचर के साथ तालमेल बिठाने वाली सोच थी. दरअसल, प्राचीन भारतीय आर्किटेक्टर ऐसे डिजाइन तैयार करते थे, जो मौसम के मुताबिक खुद ही घर और महलों को कंफर्टेबल बना देते थे. आज हम आपको उन 5 अनोखी तकनीकों के बारे में बताएंगे, जिनकी वजह से भीषण गर्मी में भी महल ठंडे बने रहते थे.
सही जगह चुनना
पुराने टाइम में महल बनाने से पहले उसकी लोकेशन पर सबसे ज्यादा फोकस किया जाता था. राजा अपने महल अक्सर झील, तालाब, नदी, बगीचे या पहाड़ियों के पास बनवाते थे. पानी के सोर्स आसपास के एनवायरमेंट को नेचुरली ठंडा रखते थे. वहीं, पेड़-पौधे हवा में नमी बनाए रखते थे, जिससे गर्मी कम लगती थी. इसके अलावा महलों के आंगन में सुंदर फव्वारे भी लगाए जाते थे. जब हवा पानी से होकर गुजरती थी तो वो ठंडी हो जाती थी. फिर कमरों में पहुंचकर पूरे महल का टेंपरेचर कम कर देती थी. ये नेचुरल एयर कूलिंग सिस्टम जैसा ही काम करता था.
विंड कैचर
प्राचीन कूलिंग सिस्टम का सबसे दिलचस्प हिस्सा था विंड कैचर, जिसे ‘बादगीर’ भी कहा जाता है. ये महलों की छत पर बना हाई राइज स्ट्रक्चर होता था, जो ठंडी हवा को पकड़कर अंदर की तरफ भेजता था. साथ ही गर्म हवा ऊपर उठकर इन खुले हिस्सों से बाहर निकल जाती थी. इस तरह बिना किसी बिजली के लगातार वेंटिलेशन बना रहता था. माना जाता है कि इस टेक्निक की शुरुआत ईरान के यज़्द से हुई थी, लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल भारत की कई ऐतिहासिक इमारतों में भी देखने को मिला.
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मोटी दीवारें
आज भी पुराने किले और महलों में जाते ही ठंडक फील होती है. इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी मोटी दीवारें थीं. इन दीवारों को मिट्टी, चूना, बलुआ पत्थर और ईंट जैसी नेचुरल चीज़ों से बनाया जाता था. ये दीवारें बाहर की गर्मी को तुरंत अंदर नहीं आने देती थीं. दिनभर कमरों को ठंडा बनाए रखती थीं और रात में धीरे-धीरे जमा हुई गर्मी बाहर छोड़ देती थीं. खासतौर पर बलुआ पत्थर गर्मियों में ठंडक और सर्दियों में गर्माहट बनाए रखने के लिए जाना जाता था.
पानी का इस्तेमाल
प्राचीन भारत में पानी सिर्फ पीने या सिंचाई के लिए नहीं, बल्कि घरों और महलों को ठंडा रखने के लिए भी यूज किया जाता था. बावड़ियां या वाव यानी स्टेपवेल अपने आसपास के इलाके को नेचुरली ठंडा रखती थीं. कई महलों में दीवारों और छतों के अंदर मिट्टी की बनी छिपी हुई नालियां बनाई जाती थीं, जिनसे पानी बहता रहता था. इससे दीवारें ठंडी रहती थीं और पूरे महल का टेंपरेचर कंट्रोल रहता था. कर्नाटक के हम्पी लोटस महल और आगरा किला इस शानदार तकनीक के बेहतरीन उदाहरण माने जाते हैं.
ऊंची छत, आंगन और छज्जे
एंसिएंट इंडियन आर्किटेक्चर में ऊंची छतें, खुले आंगन, बरामदे और ढलानदार छज्जे बहुत सोच-समझकर बनाए जाते थे. ऊंची छतों की वजह से गर्म हवा ऊपर चली जाती थी और नीचे का हिस्सा नॉर्मली ठंडा रहता था. वहीं चौड़े छज्जे सीधे धूप को कमरों में आने से रोकते थे, लेकिन ताजी हवा के आने का रास्ता खुला रखते थे. बरामदे और खुले आंगन हवा के नेचुरल फ्लो को बनाए रखते थे, जिससे पूरे महल में ठंडक बनी रहती थी.
मॉर्डन आर्किटेक्ट
आज जब बिजली की बढ़ती खपत और एनवायरमेंट की चिंता लगातार बढ़ रही है, तब प्राचीन भारत की ये वास्तुकला तकनीकें फिर से चर्चा में हैं. मॉर्डन आर्किटेक्ट भी अब ऐसे डिजाइन अपनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो कम एनर्जी खर्च करें और नेचुरल तरीके से घरों को ठंडा रखें. ये साबित करता है कि सदियों पुरानी भारतीय बुद्धिमत्ता आज भी दुनिया के लिए इंस्पिरेशन बन सकती है.
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