Ballot Box Election: लोकसभा हो या विधानसभा भारत में हर बार चुनाव के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को हारने वाली पार्टी अपनी हार का जिम्मेदार मानती है. पिछले कुछ सालों से लगातार ईवीएम को निशाना बनाया जा रहा है. देश में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बीच अब पुरानी चुनावी प्रक्रिया यानी बैलेट बॉक्स वोटिंग को फिर से वापस लाने की मांग तेज होने लगी है.
हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक मीडिया रिपोर्ट सामने आई, जिसमें SIR में कथित गड़बड़ियों का खुलासा किया गया. इसके बाद से ही विपक्षी पार्टियां ईवीएम द्वारा चुनाव पर रोक लगाने की मांग कर रही हैं. आज नई दिल्ली में इंडिया गठबंधन की मीटिंग हुई, जिसमें विपक्षी पार्टियों ने बैलेट पेपर पर चुनाव कराने की मांग की. 2004 के लोकसभा चुनाव से देशभर में यह प्रक्रिया पूरी तरह बंद हो गई थी, इसलिए आज के नए युवाओं को इसके बारे में जानकारी नहीं है. इस खबर में हम जानेंगे कि आखिर बैलेट पेपर पर चुनाव कैसे होते थे. लेकिन इससे पहले जानें आखिर इसकी मांग क्यों हो रही है.
CEC पर आरोप
दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर दो दूसरे चुनाव आयुक्तों ने मनमाने तरीके से फैसले लेने और उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है. एक मीडिया रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने 10 महीने में 14 बार आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सामने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई, जिनकी सुनवाई नहीं की गई. खबर सामने आने बाद से देश की सियासत गरमा गई .
विपक्ष की मांग और आरोप
इंडिया गठबंधन की मीटिंग खत्म होने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भविष्य के चुनावों के लिए SIR से पहले की वोटर लिस्ट का इस्तेमाल करने और EVM के बजाय बैलेट पेपर से वोटिंग कराने की वकालत की. साथ ही, उन्होंने विपक्षी INDIA गठबंधन में एकता और एक साझा एक्शन प्लान पर जोर दिया. INDIA गठबंधन की बैठक में अपनी शुरुआती बात रखते हुए खड़गे ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेंद्र कुमार को इस्तीफा दे देना चाहिए और वोटर लिस्ट में “दखल” देने वाली ताकतों के खिलाफ गवाह बन जाना चाहिए. कांग्रेस प्रमुख ने दावा किया कि CEC की “पोल पूरी तरह खुल चुकी है.”
खड़गे ने कहा, “उनके दो साथी सदस्यों ने 10 महीनों में 14 बार सवाल उठाए हैं! इससे उनकी ईमानदारी और इरादों पर सवाल उठता है. इसलिए, उन्हें उनके पद से हटा दिया जाना चाहिए. अगर उनमें जरा भी संवैधानिक या नैतिक शर्म बची है, तो वे खुद इस्तीफा देंगे और उन ताकतों के खिलाफ गवाह बनेंगे जो हमारी वोटर लिस्ट में दखल दे रही हैं.” उन्होंने जोर देकर कहा कि विपक्षी समूह पारदर्शिता की जगह गोपनीयता को हावी नहीं होने देगा. उन्होंने बैठक में कहा, “हम अपने गणतंत्र के मूल सिद्धांत- एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य- को कमजोर नहीं होने देंगे.” इस बैठक में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी, AICC महासचिव जयराम रमेश और के.सी. वेणुगोपाल, TMC प्रमुख ममता बनर्जी और SP, RJD, CPI, CPI(M), NCP(SP) और शिवसेना (UBT) जैसी पार्टियों के नेता शामिल हुए.
बैलेट पेपर से वोटिंग की वकालत
खड़गे ने जोर दिया कि बैलेट लोगों का है और जनादेश भी लोगों का है. उन्होंने कहा “इसलिए सरकार की शक्ति आखिरकार लोगों के हाथों में होती है.” खड़गे ने कहा, “आज हमारा काम यह सुनिश्चित करना है कि भारत के लोग हमारे लोकतंत्र में अंतिम और निर्विवाद सत्ता बने रहें.” उन्होंने कहा कि INDIA गठबंधन मांग करता है कि भविष्य के चुनावों के लिए SIR पर तुरंत रोक लगाकर पुरानी वोटर लिस्ट को फिर से बहाल किया जाए. INDIA गठबंधन की पार्टियां वोटर लिस्ट में हर तरह के बदलाव (नाम जोड़ने, हटाने और सुधारने) में जिसमें निर्वाचन क्षेत्र-वार और बूथ-वार जानकारी शामिल हो, “पूरी पारदर्शिता” की मांग करता है. खड़गे ने यह भी मांग की कि किसी भी वैध वोटर का नाम लिस्ट से हटाने से पहले उचित सूचना, कारण और अपील करने का असरदार तरीका होना चाहिए. पार्टियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रशासनिक खामियों, अधूरे दस्तावेजों या जानकारी की कमी के कारण योग्य मतदाता वोट देने से वंचित न रह जाएं.
EVM के बजाय बैलेट पेपर से वोटिंग की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि युवा नागरिकों, खासकर पहली बार वोट देने वालों के लिए वोटर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आसान और सुलभ होनी चाहिए. खरगे ने संस्थागत जवाबदेही और ऐसे चुनाव आयोग पर भी ज़ोर दिया जिस पर सभी राजनीतिक दलों का भरोसा हो. उन्होंने कहा, “जब नागरिकों के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार दांव पर हों, तो INDIA गठबंधन की सभी पार्टियां इस बात पर सहमत हैं कि चुनाव EVM की जगह बैलेट पेपर से होने चाहिए. चुनावी सिस्टम में जनता का भरोसा फिर से कायम करने के लिए बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.” TMC प्रमुख ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे और अखिलेश यादव जैसे बड़े नेताओं ने भी खड़गे की बात का पूरा समर्थन किया.
बैलेट पेपर पर चुनाव
भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के आने से पहले, चुनाव बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स के जरिए कराए जाते थे. चुनावी इतिहास में बैलेट पेपर का इस्तेमाल मुख्य रूप से दो तरीकों से किया गया.

शरुआती सिस्टिम
पहले (1951–52) और दूसरे आम चुनावों (1957) के दौरान, हर उम्मीदवार के लिए एक अलग बैलेट बॉक्स रखा जाता था. उस समय बैलेट बॉक्स पर उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिह्न दिखाया जाता था. वोटरों को एक खाली बैलेट पेपर दिया जाता था और उन्हें बिना किसी को दिखाए उसे अपने चुने हुए उम्मीदवार के बॉक्स में डालना होता था.
मार्किंग सिस्टम
तीसरे आम चुनाव (1962) से चुनाव आयोग ने मार्किंग सिस्टम की शुरुआत की गई, जो बैलेट पेपर का सबसे चर्चित तरीका रहा. मतदान केंद्र पर पोलिंग अफसर मतदाता सूची से वोटर की पहचान की जांच करते थे और उसकी उंगली पर अमिट स्याही लगाई जाती थी. इसके बाद वोटर को एक आधिकारिक कागज (बैलेट पेपर) दिया जाता था. इस कागज पर चुनाव लड़ रहे सभी उम्मीदवारों के नाम और सभी चुनाव चिन्ह एक क्रम में छपे होते थे. इसके बाद वोटर एक गुप्त वोटिंग कंपार्टमेंट (ओट) में जाता था. वहां उसे तीर के निशान वाली रबर स्टैम्प और स्याही का पैड मिलता था. मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवार के नाम या चुनाव चिन्ह के आगे उस मुहर को लगा देता था. मुहर लगाने के बाद बैलेट पेपर को खास तरीके से मोड़ा जाता था ताकि लगाई गई स्याही किसी दूसरे उम्मीदवार के नाम पर न छपे. अब मुड़े हुए बैलेट पेपर को पोलिंग अफसरों के सामने रखी मतपेटी के अंदर डाल दिया जाता था.
वोटों की गिनती
चुनाव के बाद वोटों की गिनती की प्रक्रिया में बहुत चुनौतियां का सामना करना पड़ता था. चुनाव के बाद सभी बैलेट बॉक्स को एक सुरक्षित ‘स्ट्रॉन्ग रूम’ में रखा जाता था. गिनती के दिन बॉक्स को कड़ी सुरक्षा के बीच और उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंटों की मौजूदगी में गिनती हॉल में लाया जाता था और यह पक्का किया जाता था कि सील सही-सलामत हैं. निष्पक्षता बनाए रखने और यह पता चलने से रोकने के लिए कि किसी खास पोलिंग बूथ से किसी उम्मीदवार को कितने वोट मिले, कई बॉक्स के बैलेट पेपर को एक बड़े ड्रम में या मेज पर मिला दिया जाता था.
इसके बाद, गिनती करने वाले कर्मचारी हर बैलेट पेपर को खोलते और उसकी जांच करते थे. वोट उस उम्मीदवार के खाते में जोड़ा जाता था जिसके नाम पर सरकारी मुहर लगी होती थी. आमतौर पर बैलेट पेपर को 50 या 100 के बंडलों में व्यवस्थित किया जाता था और मेजों पर बैठे अधिकारी इन बंडलों की गिनती हाथ से करते थे. सोचिए, करोड़ों वोटों की गिनती हाथों से करना कितना कठिन काम होता होगा.
उम्मीदवारों के एजेंट हर मेज पर कड़ी नजर रखते थे ताकि यह पक्का किया जा सके कि कोई बंडल गलती से गलत उम्मीदवार के खाते में न चला जाए. जब सभी मेजों पर गिनती पूरी हो जाती थी, तो रिटर्निंग ऑफिसर (RO) हर राउंड के आंकड़ों को जोड़ते थे. इस पूरी प्रक्रिया में तीन से पांच दिन लगते थे. अगर मुकाबला कड़ा हो, तो गिनती हफ्तों तक चल सकती थी.
बैलेट पेपर के चुनाव कराने में बहुत ज्यादा कागज और समय लगता था. वोटों की गिनती पूरी होने में कई दिन लग जाते थे. इसके अलावा, उस दौर में ‘बूथ कैप्चरिंग’ (बैलेट बॉक्स पर कब्जा करना या फर्जी वोट डालना) और ‘अमान्य वोट’ (गलत मुहर लगने के कारण वोट अयोग्य हो जाना) जैसी बड़ी समस्याएं भी होती थीं. इन्हीं कमियों को दूर करने के लिए देश में धीरे-धीरे EVM का इस्तेमाल शुरू किया गया.
कब आई EVM मशीन

भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) का इस्तेमाल सबसे पहले 1982 में ट्रायल के तौर पर शुरू किया गया था. भारत की चुनावी प्रक्रिया में EVM को धीरे-धीरे अपनाया गया. शुरुआत में EVM का इस्तेमाल कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए किया गया. 2004 में 14वां लोकसभा चुनाव भारत के इतिहास का पहला आम चुनाव था, जिसमें सभी 543 संसदीय क्षेत्रों के हर पोलिंग बूथ पर सिर्फ EVM का इस्तेमाल करके वोट डाले गए थे. तब से भारत में सभी लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव इसी तरीके से हो रहे हैं.
EVM सिस्टम में और पारदर्शिता लाने के लिए, VVPAT (वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) मशीनें शुरू की गईं. इनकी शुरुआत 2013 में नागालैंड के नोकसेन विधानसभा क्षेत्र के चुनाव से हुई थी. इस सिस्टम से वोटर सात सेकंड तक एक पर्ची देख सकता है, जिससे यह पुष्टि होती है कि उसका वोट उसी उम्मीदवार को गया है जिसके लिए उसने बटन दबाया था. 2019 के लोकसभा चुनावों से देश भर के सभी पोलिंग बूथों पर EVM के साथ-साथ VVPAT का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया गया.
News Source: ANI
