Ganga Basin: नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) ने ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के तहत उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के पांच महत्वपूर्ण वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) की बहाली का काम शुरू कर दिया है. वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) की बहाली यानी किसी नष्ट या खराब हो चुके दलदली इलाके, तालाब, झील या नदी के किनारे की ज़मीन को दोबारा उसके प्राकृतिक और स्वस्थ रूप में वापस लाया जाएगा. इसका उद्देश्य गंगा बेसिन की पारिस्थितिकी को मजबूत करना है. मिशन के आंकड़ों के अनुसार, इस योजना में उत्तर प्रदेश की कालेवाला झील (मुज़फ़्फ़रनगर), नुमैया डाह झील (प्रयागराज) और रेवती डाह (बलिया) शामिल हैं. इसके अलावा, बिहार के भोजपुर का नाथमलपुर भागड़ वेटलैंड और झारखंड के साहिबगंज की प्रसिद्ध रामसर साइट ‘उधवा लेक बर्ड सैंक्चुअरी’ में संरक्षण कार्य जारी है.
मछली पालन, खेती से मिलेगी आजीविका
NMCG ने उत्तराखंड की ‘आसन वेटलैंड’ रामसर साइट के लिए भी प्रबंधन प्रस्ताव तैयार किया है. ये आर्द्रभूमि गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल, कछुए, ऊदबिलाव और प्रवासी पक्षियों जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों का आशियाना हैं. साथ ही, यह पहल स्थानीय समुदायों को मछली पालन, खेती और इको-टूरिज्म के जरिए आजीविका भी प्रदान करेगी. अधिकारियों ने बताया कि इन वेटलैंड्स में बहाली के काम का फोकस प्राकृतिक हाइड्रोलॉजिकल कनेक्टिविटी को फिर से बहाल करने, वेटलैंड के हैबिटैट की क्वालिटी सुधारने, जलीय जैव-विविधता के संरक्षण, टिकाऊ खेती के तरीकों को बढ़ावा देने, समुदाय की भागीदारी और स्टेकहोल्डर्स को शामिल करने और वैज्ञानिक निगरानी व अडैप्टिव मैनेजमेंट करने पर है. एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि इन जगहों से मिली जानकारी गंगा बेसिन में भविष्य में वेटलैंड बहाली के कामों में मार्गदर्शन करेगी.
राज्य सरकारों से मांगे गए और प्रस्ताव
अधिकारी ने कहा कि NMCG वैज्ञानिक जांच से पहचाने गए और ज़रूरी वेटलैंड्स को शामिल करके वेटलैंड बहाली के काम को धीरे-धीरे बढ़ाने की योजना बना रहा है. बेसिन में दूसरे ज़रूरी वेटलैंड्स में संरक्षण के काम को बड़े पैमाने पर करने के लिए संबंधित राज्य सरकारों से और प्रोजेक्ट प्रस्ताव मांगे जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि इसका लंबे समय का मकसद पूरे बेसिन में स्वस्थ फ्लडप्लेन वेटलैंड्स (बाढ़ के मैदानों वाले आर्द्रभूमि) का एक नेटवर्क बनाना है. इससे नदी की सेहत बेहतर होगी, जैव विविधता का संरक्षण होगा, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता बढ़ेगी और वेटलैंड्स पर निर्भर समुदायों की आजीविका में सुधार होगा.
बाढ़ को नियंत्रित करते हैं वेटलैंड्स
NMCG ने कहा कि हालांकि देश भर में वेटलैंड्स का संरक्षण पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के तहत यह गंगा और उसकी मुख्य सहायक नदियों के 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले फ्लडप्लेन वेटलैंड्स के संरक्षण और बहाली पर ध्यान केंद्रित करता है. मिशन ने कहा कि ये वेटलैंड्स नदी की सेहत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. ये नदी के बहाव को नियंत्रित करते हैं. भूजल को रिचार्ज करते हैं. तलछट और प्रदूषकों को रोककर पानी की गुणवत्ता में सुधार करते हैं. बाढ़ को नियंत्रित करते हैं. जलीय जैव विविधता को सहारा देते हैं और इकोसिस्टम सेवाओं को बेहतर बनाते हैं. इस प्रयास के तहत NMCG ने संबंधित राज्यों के वन विभागों के सहयोग से फ्लडप्लेन वेटलैंड्स की वैज्ञानिक इन्वेंट्री (सूची तैयार करना), GIS मैपिंग और इकोलॉजिकल असेसमेंट (पारिस्थितिक मूल्यांकन) में मदद की है.
यूपी और बिहार को प्राथमिकता
पारिस्थितिक महत्व, हाइड्रोलॉजिकल कनेक्टिविटी, जैव विविधता मूल्यों, बहाली की संभावना और इकोसिस्टम सेवाओं के आधार पर उत्तर प्रदेश में 5,798.49 हेक्टेयर में फैले 282 फ्लडप्लेन वेटलैंड्स और बिहार में 8,029.35 हेक्टेयर में फैले 124 वेटलैंड्स की सूची तैयार की गई है और उन्हें प्राथमिकता दी गई है. लंबे समय तक संरक्षण और बहाली के कामों को सही दिशा देने के लिए ‘इंटीग्रेटेड वेटलैंड मैनेजमेंट प्लान’ (एकीकृत आर्द्रभूमि प्रबंधन योजनाएं) भी तैयार की गई हैं. मिशन का कहना है कि वैज्ञानिक आकलन ने गंगा बेसिन में चरणबद्ध तरीके से बहाली का आधार तैयार किया है. बाढ़ के मैदानों वाली आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) को नदी प्रणाली का अहम हिस्सा माना जाता है.
लुप्तप्राय जीवों को मिलेगा जीवन
ये मानसून के दौरान बाढ़ का पानी जमा करके और कम पानी वाले मौसम में पानी छोड़कर नदी के बहाव को नियंत्रित करती हैं. भूजल को रिचार्ज करती हैं. तलछट और प्रदूषकों को रोककर पानी की गुणवत्ता में सुधार करती हैं. कार्बन को सोखती हैं और जलीय जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करती हैं. NMCG के अनुसार, ये आर्द्रभूमियां गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल, मीठे पानी के कछुए, ऊदबिलाव, स्थानीय मछलियों और प्रवासी पक्षियों जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों को भी सहारा देती हैं. साथ ही, ये मछली पालन, खेती, पशु चराई और इको-टूरिज्म के ज़रिए स्थानीय समुदायों की आजीविका को भी बनाए रखती हैं.
News Source: PTI
