Gorkha Issue: केंद्र सरकार ने दार्जिलिंग पहाड़ियों के गोरखा समुदाय की दशकों पुरानी पहचान और राजनीतिक मांगों के स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए पंकज कुमार सिंह के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है. गृह मंत्रालय ने यह कदम केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, गोरखा नेताओं और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच हुई त्रिपक्षीय बैठक के बाद उठाया है. इस समिति का मुख्य उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्र के लोगों की चिंताओं को दूर करना और अंतिम समझौते का मसौदा तैयार करना है.
कौन हैं पंकज कुमार सिंह?
अक्टूबर 2025 में गृह मंत्रालय ने पंकज कुमार सिंह को दार्जिलिंग हिल्स, डुआर्स और तराई से जुड़े मुद्दों के लिए आधिकारिक सरकारी वार्ताकार नियुक्त किया था. वे एक रिटायर्ड IPS अधिकारी और BSF के पूर्व DG हैं. वह 2023-25 के दौरान डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर भी रहे थे. उनकी भूमिका राजनीतिक बातचीत का नेतृत्व करने और गोरखा समुदाय की लंबे समय से चली आ रही मांगों को पूरा करने पर केंद्रित है. BJP के दार्जिलिंग सांसद राजू बिस्टा ने कहा कि शनिवार की बैठक एक ऐतिहासिक दिन पर हुई, क्योंकि यह 1988 में हुए गोरखा समझौते पर हस्ताक्षर की तारीख के साथ मेल खाती थी.
संवैधानिक ढांचे के भीतर होगा समाधान
भारतीय जनता पार्टी (BJP) चुनावी वादों के तहत इस मुद्दे के त्वरित समाधान के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. बीजेपी का स्पष्ट रुख है कि इस जटिल समस्या का अंतिम और स्थायी समाधान संवैधानिक ढांचे के भीतर ही निकाला जाएगा. केंद्र सरकार ने गोरखा मुद्दे के स्थायी राजनीतिक समाधान की दिशा में पहल शुरू कर दी है. इसके लिए एक समिति का गठन किया गया है.
असम में BJP का ‘मास्टर स्ट्रोक’: स्वदेशी पहचान की सुरक्षा और UCC का वादा, युवाओं को रोजगार का भरोसा
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, गोरखा नेताओं और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच हुई अहम त्रिपक्षीय बैठक के बाद केंद्र सरकार ने शनिवार को एक विशेष समिति का गठन किया. यह समिति दार्जिलिंग की पहाड़ियों और आस-पास के क्षेत्रों में गोरखा पहचान के मुद्दे के लिए ‘स्थायी राजनीतिक समाधान’ का मसौदा तैयार करेगी. इस बैठक का मुख्य उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्र के लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांगों और मुद्दों को सुलझाना है.
अमित शाह ने किया जल्द समाधान का वादा
गृह मंत्रालय के एक बयान में कहा गया कि पश्चिम बंगाल की पहाड़ी आबादी से जुड़े सभी मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई. उनकी अलग पहचान, स्थायी राजनीतिक समाधान और भारत के संविधान के तहत मान्यता की मांगों पर बात हुई. केंद्रीय गृह मंत्री ने संविधान के दायरे में जल्द ही स्थायी राजनीतिक समाधान का वादा किया.

बयान में आगे कहा गया कि तौर-तरीके तय करने के लिए, पूर्व डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर और मौजूदा वार्ताकार पंकज कुमार सिंह की अध्यक्षता में एक समिति बनाने का फैसला किया गया. यह समिति पश्चिम बंगाल के पहाड़ी इलाकों के लोगों के लिए संविधान के तहत स्थायी राजनीतिक समाधान की दिशा में तैयार किए जाने वाले अंतिम समझौते के विवरण को अंतिम रूप देगी. शाह ने समुदाय की बाकी सभी मांगों पर भी सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का वादा किया.
पहाड़ी समुदायों के संघर्ष का इतिहास चार दशक पुराना
केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) के बीच हुए इस समझौते के तहत गोरखालैंड के लिए हुए हिंसक आंदोलन के बाद दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) का गठन किया गया था. दार्जिलिंग सांसद राजू बिस्टा ने कहा कि पहाड़ी समुदायों के संघर्ष का इतिहास चार दशकों से भी ज़्यादा पुराना है, जिसके दौरान पिछली वामपंथी और TMC सरकारों ने पहाड़ी लोगों की उम्मीदों को कुचला.
कहा कि हमारे लोगों ने जो बलिदान दिया, उसमें लगभग 2,000 लोग शहीद हुए, 5,000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए और महिलाओं को प्रताड़ित किया गया. बिस्टा ने कहा कि बैठक में जहां अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधियों ने अपनी चिंताएं और उम्मीदें रखीं, वहीं अधिकारी ने यह भी बताया कि वह पहाड़ी लोगों के मुद्दों को कैसे हल करना चाहते हैं. सांसद ने कहा कि सभी पक्षों की बात सुनने के बाद शाह ने बैठक का समापन करते हुए बताया कि आने वाले दिनों में इन मुद्दों का स्थायी समाधान कैसे निकाला जा सकता है.
केंद्र के साथ मिलकर काम करेगा GJM
गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) नेता रोशन गिरी ने कहा कि गोरखा नेतृत्व संवैधानिक तरीकों से समाधान खोजने के लिए प्रतिबद्ध है और इस प्रक्रिया में केंद्र के साथ मिलकर काम करेगा. गिरी ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस मुद्दे को हल करने के लिए जो भी समाधान निकाला जाएगा, वह संवैधानिक ढांचे के भीतर ही होगा. मैं संवैधानिक समाधान के पक्ष में हूं और उसी के अनुसार मैंने अपने सुझाव रखे हैं. पिछली राज्य सरकारों ने DGHC और गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) जैसी व्यवस्थाओं के ज़रिए गोरखा पहचान के मुद्दे को सुलझाने की कोशिशें कीं, लेकिन कहा जा सकता है कि ये कोशिशें इलाके में लंबे समय तक शांति, आर्थिक समृद्धि और राजनीतिक स्थिरता लाने में नाकाम रही हैं.
भारत में भारतीय गोरखा एक महत्वपूर्ण जातीय-सांस्कृतिक समुदाय हैं, जो मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग, कालिम्पोंग), सिक्किम, असम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्यों में निवास करते हैं. देश की रक्षा में ‘गोरखा रेजीमेंट’ के माध्यम से अद्वितीय योगदान देने के बावजूद सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर इस समुदाय की स्थिति कई अधिकारों, संघर्षों और पहचान की चुनौतियों से जुड़ी है.
सामाजिक स्थिति
सांस्कृतिक और भाषाई मान्यता: गोरखा समुदाय की साझा भाषा नेपाली है. इसे वर्ष 1992 में एक लंबे संघर्ष के बाद भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, जिससे इसे आधिकारिक राष्ट्रीय दर्जा प्राप्त हुआ.
पहचान का संकट: भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि (1950) के कारण भारतीय मूल के गोरखाओं को अक्सर अनजाने में नेपाल से आए ‘प्रवासी या विदेशी’ के रूप में देख लिया जाता है. इस रूढ़िवादिता और विदेशी के टैग से मुक्ति पाना इस समुदाय की सबसे बड़ी सामाजिक लड़ाई रही है.
नागरिकता और असम में स्थिति: असम में रहने वाले लगभग 25 लाख गोरखाओं को पूर्व में ‘संदेहास्पद मतदाता’ (D-Voters) या एनआरसी (NRC) प्रक्रियाओं में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था. हालांकि, गृह मंत्रालय और असम सरकार ने हाल के वर्षों में यह स्पष्ट किया है कि वैध भारतीय गोरखाओं को नागरिकता कानून के तहत प्रताड़ित नहीं किया जाएगा और न ही उन्हें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल भेजा जाएगा. असम में उन्हें अब जनजातीय बेल्ट में एक ‘संरक्षित वर्ग’ का दर्जा दिया गया है.
अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे की मांग: गोरखा समुदाय के भीतर कई उप-जातियां जैसे राय, लिंबू, गुरुंग, तमांग, मगर आदि हैं. इनमें से 11 प्रमुख गोरखा उप-समुदायों को लंबे समय से अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग चल रही है ताकि उन्हें शिक्षा और नौकरियों में सामाजिक न्याय मिल सके.

राजनीतिक स्थिति
गोरखालैंड राज्य की मांग: गोरखा राजनीति का मुख्य केंद्र ‘गोरखालैंड’ नामक एक अलग राज्य की मांग है, जो पश्चिम बंगाल के पहाड़ी क्षेत्रों (दार्जिलिंग, कालिम्पोंग) को अलग कर बनाने की मांग की जा रही है. इस आंदोलन का उद्देश्य गोरखाओं को अपनी राजनीतिक स्वायत्तता और प्रशासनिक सशक्तिकरण देना है.
स्वायत्त प्रशासनिक निकाय: पूर्ण राज्य का दर्जा न मिलने के विकल्प के रूप में समय-समय पर स्वायत्त परिषदों का गठन किया गया, जैसे पहले ‘दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल’ (DGHC) और वर्तमान में ‘गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन’ (GTA)। हालांकि, गोरखा नेताओं का मानना है कि इन परिषदों के पास सीमित वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां हैं, जिससे वे पूर्ण स्वशासन नहीं दे पातीं.
मुख्यधारा की राजनीति में प्रतिनिधित्व: दार्जिलिंग लोकसभा सीट और आसपास की विधानसभा सीटों पर गोरखा समुदाय का मजबूत राजनीतिक वर्चस्व है. ‘गोरखा जनमुक्ति मोर्चा’ (GJM), ‘गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट’ (GNLF) और ‘भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा’ (BGPM) जैसे दल वहां क्षेत्रीय राजनीति तय करते हैं.
स्थायी राजनीतिक समाधान: केंद्र की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार और गृह मंत्रालय लगातार गोरखा संगठनों और पश्चिम बंगाल सरकार के साथ मिलकर दार्जिलिंग क्षेत्र के लिए एक ‘स्थायी राजनीतिक समाधान’ तलाशने के लिए प्रतिबद्धता जताते रहे हैं, जिसके तहत विभिन्न संवैधानिक विकल्पों पर चर्चा की जा रही है.
गोरखालैंड आंदोलन भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाले स्वायत्तता आंदोलनों में से एक है. पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और उसके आस-पास के पहाड़ी क्षेत्रों को अलग कर एक स्वतंत्र भारतीय राज्य बनाने की यह मांग 115 वर्ष से भी अधिक पुरानी है. इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य गोरखा समुदाय की विशिष्ट भाषाई, सांस्कृतिक और प्रशासनिक पहचान को सुरक्षित करना है.
आंदोलन के प्रमुख कारण
पहचान और नागरिकता: भारत-नेपाल खुली सीमा के कारण भारतीय गोरखाओं को अक्सर विदेशी मान लिया जाता है. अलग राज्य बनने से उन्हें एक स्पष्ट ‘भारतीय गोरखा’ की राष्ट्रीय पहचान मिलेगी.
आर्थिक उपेक्षा: दार्जिलिंग क्षेत्र चाय, पर्यटन और लकड़ी के माध्यम से भारी राजस्व कमाता है, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस कमाई का बड़ा हिस्सा कोलकाता चला जाता है और पहाड़ों का विकास नहीं होता.
सांस्कृतिक भिन्नता: पहाड़ी गोरखाओं की भाषा, वेशभूषा, खान-पान और सामाजिक ताना-बाना मैदानी बंगाल से पूरी तरह भिन्न है.
वर्ष 2017 का आंदोलन (हालिया बड़ा संघर्ष)
बंगाली भाषा विवाद: पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा पहाड़ों के स्कूलों में बंगाली भाषा को अनिवार्य करने के फैसले के विरोध में आंदोलन फिर से सुलग उठा.
104 दिनों का ऐतिहासिक बंद: दार्जिलिंग के इतिहास में सबसे लंबा 104 दिनों का पूर्ण बंद रहा. इस दौरान इंटरनेट सेवाएं हफ्तों बंद रहीं और व्यापक हिंसा हुई. बाद में केंद्रीय गृह मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद बंद वापस लिया गया.
बैठक में ये रहे मौजूद
शाह ने कहा कि केंद्र से मिलने वाली पर्याप्त धनराशि से सभी लंबित मुद्दों का समाधान सुनिश्चित किया जाएगा. राज्य के दौरे के तीसरे और आखिरी दिन शनिवार को दार्जिलिंग की तलहटी में सुकना के एक होटल में हुई इस बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री ने की. इसमें मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी, पहाड़ी इलाकों की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेता और क्षेत्र के अन्य संबंधित लोग शामिल हुए.

बैठक में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) के प्रमुख बिमल गुरुंग और पार्टी के वरिष्ठ नेता रोशन गिरी, गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) के प्रमुख मान घिसिंग, राज्य के कई मंत्री, पहाड़ी इलाकों के BJP विधायक और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे. इस बैठक में BJP सांसद राजू बिस्टा और हर्षवर्धन सिंगला, हिल अफेयर्स के राज्य मंत्री विशाल लामा, विधायक भरत छेत्री, सोनम लामा और नोमन राय समेत कई अन्य लोग भी मौजूद थे.
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