Monsoon Session : मोदी सरकार का बहुप्रतिक्षित कैबीनेट विस्तार मानसून सेशन तक टल सकती है. इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह संसद में सरकार का फ्लोर मैनेजमेंट माना जा रहा है. इस बार सरकार कई अहम और संविधान संशोधन से जुड़े विधेयक लाने की तैयारी में है, जिनके लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी. दूसरी ओर विपक्ष दावा कर रहा है कि वह सरकार को यह आंकड़ा नहीं छूने देगा. ऐसे में फिलहाल सरकार की प्राथमिकता बल्कि संसद का नंबर गेम है!
क्या होगी मंत्रिमंडल का विस्तार?
मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल को दो साल पूरे हो चुके हैं और पिछले साल जून से ही मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें लगातार लग रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई में मंत्रिपरिषद की बैठक कर चुके हैं, जून में सचिवों के साथ समीक्षा बैठक भी हुई और सरकार के दो साल पूरे होने का अभियान भी संपन्न हो गया. इसके बावजूद कैबिनेट विस्तार नहीं हुआ. मंगलवार से प्रधानमंत्री का विदेश दौरा शुरू हो गया है जो 11 जुलाई चलेगा. इन दिनों तक प्रधानमंत्री इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर रहेंगे. 20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू होगा, जो 13 अगस्त तक चलेगा.
नए मंत्रियों को नहीं उतारना चाहती PM मोदी
सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री नहीं चाहते कि विवादित विधेयकों पर चर्चा के दौरान नए मंत्रियों को पहली बार विपक्ष के सामने उतारे. यही वजह है कि पहले संसद का सत्र और उसके बाद कैबिनेट विस्तार की संभावना जताई जा रही है. वैसे, इस बार सरकार संविधान के 130वें और 131वें संशोधन विधेयक समेत कई महत्वपूर्ण बिल लाने की तैयारी में है.
इन मुद्दों पर सरकार को घेरेगा विपक्ष
सरकार एक बार फिर इस सेशन में महिला आरक्षण बिल, परिसीमन बिल को संसद से पास कराने की बड़ी तैयारी कर रही है. इसके लिये सरकार के फ्लोर मैनेजर जरूरी 360 का आंकड़ा लोकसभा में जुटाने की जुगत में है. उधर राम मंदिर चढ़ावा विवाद, पेट्रोल में इथेनॉल, परीक्षा अनियमितता, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और तृणमूल कांग्रेस व उद्धव ठाकरे की शिवसेना में हुई टूट जैसे मुद्दों पर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी में है.
संसद में संख्या बल पर सरकार का फोकस
सरकार की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ विपक्ष के सवाल का जबाव देना नहीं, बल्कि संसद का संख्या बल भी है. अप्रैल में लोकसभा में एनडीए के पास 293 सांसद थे, जबकि विपक्ष के पास 232 सांसद थे. इनमें ‘इंडिया’ गठबंधन के 204 और तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसद शामिल थे. इनके अलावा 17 सांसद किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं थे. लेकिन पिछले ढाई महीने में तस्वीर बदली है. तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 सांसद अलग हो गए और नई पार्टी के साथ सरकार का समर्थन करने लगे. उद्धव ठाकरे की शिवसेना के 6 सांसद भी एकनाथ शिंदे के साथ चले गए यानी विपक्ष की संख्या 232 से घटकर 206 रह गई.
320 तक पहुंच सकता है NDA का आंकड़ा
उधर सरकार को मिजोरम की जेडपीएम के एक सांसद का भी समर्थन मिल गया. इस तरह एनडीए का आंकड़ा बढ़कर करीब 320 तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है. इसके बावजूद संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत अभी भी सरकार के पास नहीं है. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सरकार की नजर डीएमके, समाजवादी पार्टी, शरद पवार की एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस के बचे हुए सांसदों पर है. यदि समर्थन नहीं मिलता तो सरकार को विपक्ष के कई सांसदों की अनुपस्थिति की रणनीति पर भी काम करना पड़ सकता है.
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गौरतलब है कि 18 अप्रैल की वोटिंग में सरकार को 298 वोट मिले थे यानी अपनी घोषित संख्या से भी पांच अधिक है. लेकिन मौजूदा गणित के हिसाब से संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए सरकार को अभी भी अतिरिक्त समर्थन या विपक्ष की बड़ी गैरहाजिरी की जरूरत पड़ सकती है. हालांकि, विपक्ष अपने मुद्दे भी गिना रहा है और दावा भी कर रहा है कि कितना भी तोड़ फोड़ कर लें. दो तिहाई बहुमत तक पहुंचने नहीं देंगे.
असली परीक्षा संसद के फ्लोर पर होगी
फिलहाल सरकार के सामने दो मोर्चे हैं. पहला, संसद में अपने अहम और विवादित विधेयकों को पारित कराना और दूसरा मानसून सत्र के बाद संभावित कैबिनेट विस्तार. इसमें एक बात और आमने आ रही है कि संसद में संविधान संशोधन विधायकों को पास करवाने के दौरान कई सांसद एनडीए के पाले में खुलकर आ सकते हैं. इसका मतलब है कि मंत्रिमंडल विस्तार से पहले संसद में एनडीए का बदला हुआ रूप सामने आएगा और फिर कैबिनेट विस्तार होगा. इसी बीच सत्ता पक्ष का दावा है कि उसके सभी विधेयक पास होंगे और संख्या जुटाने में कोई दिक्कत नहीं आएगी. वहीं, विपक्ष का कहना है कि सरकार को संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत तक नहीं पहुंचने दिया जाएगा. ऐसे में इस बार कैबिनेट विस्तार से पहले असली परीक्षा संसद के फ्लोर पर होगी.
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